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जम्मू-कश्मीर में शुरू हो रही है राजनीतिक प्रक्रिया, पर क्या सबकुछ ठीक हो गया है?

केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति, लोकतांत्रिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था को बहाल करने में सफल हो सकती है या नहीं, इसका उचित समय पर जवाब दिया जाएगा, लेकिन यह निश्चित है कि कश्मीर में 'सब कुछ ठीक' कहना ग़लतबयानी है।
हारून रेशी

19 वीं शताब्दी की विश्व प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखिका पॉलिन डायना का एक कथन है, 'आप जिस पर चाहें  विश्वास करें, लेकिन जो कुछ भी आप पढ़ें उस पर प्रशन उठाए बिना विश्वाश न करें।'
पिछले कई दिनों से कुछ टीवी चैनलों पर सुर्खियाँ पढ़ कर और कुछ बीजेपी नेताओं के बयानों से यह आभास मिलता है कि कश्मीर में सबकुछ ठीक हो गया है। यही वजह है कि केंद्र सरकार ने यहाँ से 10,000 अर्धसैनिक बलों को हटाने का निर्णय लिया है। साथ ही यह धारणा बनाई जा रही है कि एक राजनीतिक प्रक्रिया जम्मू-कश्मीर में शुरू होने वाली है।
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ज़ाहिर है, ऐसे समय में जब कश्मीर से जुड़ी हर चीज को 'राष्ट्रीय सुरक्षा ’के चश्मे के नज़रिए देखा जा रहा है, इस धारणा के ख़िलाफ़ कुछ भी कहना उचित नहीं होगा।
लेकिन कश्मीर के मौजूदा हालात और पिछले एक साल की स्थिति के बारे में कुछ निर्विवाद तथ्यों के बारे में कहा जा सकता है। साथ ही, ऐसे सवाल पूछे जाने चाहिए, जिनका जवाब फ़िलहाल किसी के पास नहीं है। कश्मीर के बारे में मूल तथ्य क्या हैं?

अतिरिक्त बलों को वापस भेजना

पहले 10 हज़ार सुरक्षा कर्मियों को वापस भेजने के मुद्दे पर बुनियादी तथ्यों को बताया जा सकता है। पिछले साल 5 अगस्त को, मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर के विशेष संवैधानिक दर्जे को समाप्त कर और राज्य का दर्जा छीन कर इसे दो केंद्र शासित क्षेत्रों में विभाजित करने के एकतरफा कदम से घाटी में संभावित सार्वजनिक प्रतिरोध को रोकने के लिए सीआरपीएफ, बीएसएफ, एसएसबी और सीआईएसएफ की 4 सौ अतिरिक्त कंपनियों को घाटी में भेजा था। 

बल में प्रति कंपनी 100 जवान शामिल हैं। अर्थात, 5 अगस्त के फ़ैसले से पहले, अतिरिक्त 40,000 अर्द्धसैनिक बल के जवानों को यहाँ तैनात किया गया था। ये वही अतिरिक्त अर्द्धसैनिक हैं, जिनके बलबूते पर 5 अगस्त से लगातार कई हफ़्तों तक कश्मीर के इतिहास में सबसे ख़राब लॉकडाउन किया गया था। 
उसी अतिरिक्त बल के 10 हज़ार एक साल बाद वापस भेजे जा रहे हैं। यहां कई बातें ध्यान देने योग्य हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात, लाखों सेना और अर्द्धसैनिक बल स्थायी रूप से जम्मू-कश्मीर में तैनात हैं। सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम के तहत, यहाँ तैनात सेना के पास असाधारण शक्तियाँ भी हैं। सुरक्षा एजेंसियों और ख़ुफ़िया एजेंसियों की घाटी में भरमार है।
पिछले 30 वर्षों के दौरान प्रत्येक असाधारण स्थिति, यहाँ तक कि अमरनाथ यात्रा और चुनावों की पूर्व संध्या पर, अतिरिक्त बलों को कश्मीर में तैनात करने के लिए बाहर से लाया जाता है और तब वापस भेजा जाता है जब उनका काम ख़त्म हो जाता है।
इन परिस्थितियों में, मीडिया का केवल अतिरिक्त 10,000 कर्मियों को वापस भेजने और कश्मीर में 'सब कुछ ठीक हो गया'  के आलाप पर कूदना समझ से बाहर है।

क्या राजनीतिक प्रक्रिया शुरू हो रही है?

यह निर्विवाद है कि पिछले साल 5 अगस्त के बाद से अब तक बीजेपी और अपनी पार्टी को छोड़कर सभी राजनीतिक दलों की गतिविधियों पर कश्मीर में प्रतिबंध लगा दिया गया है। सैयद अल्ताफ़ बुख़ारी के नेतृत्व में गठित 'आपनी पार्टी' मूल रूप से पीडीपी के 31 भगोड़ों या निष्कासित लोगों का एक संगठन है, जो इस वर्ष मार्च में स्थापित किया गया है। आम धारणा है कि उसे बीजेपी का आशीर्वाद हासिल है। पिछले एक साल के दौरान केवल बीजेपी और अपनी पार्टी को राजनीतिक गतिविधियों को जारी रखने की अनुमति दी गई है।

इस साल 5 अगस्त को, बीजेपी को कश्मीर की विशेष स्थिति के अंत का जश्न मनाने के लिए खुली छूट मिली। लेकिन उसी दिन, फ़ारूक़ अब्दुल्ला, जो न केवल तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं, बल्कि अब एक सांसद हैं, को घर पर अपनी पार्टी के नेताओं की बैठक बुलाने की अनुमति नहीं दी गयी। फ़ारूक़ अब्दुल्ला को दो दिन पहले 20 अगस्त को अपने सहयोगियों के साथ पहली बैठक करने की अनुमति दी गई थी।
इस बैठक में नैशनल कॉन्फ्रेंस के कई वरिष्ठ नेताओं, अब्दुल रहीम राथर, अली मोहम्मद सागर, नासिर असलम वानी और मोहम्मद शफ़ी ओरी के साथ-साथ नेशनल कॉन्फ़्रेंस के दो सदस्यों ने भाग लिया। संसद सदस्य अकबर लोन और हसनैन मसूदी भी उपस्थित थे।

चुनाव की तैयारी

पीडीपी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती अभी भी सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के तहत क़ैद हैं। कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य छोटे राष्ट्रीय मुख्यधारा के दलों ने अभी तक यह संकेत नहीं दिया है कि वे अपनी राजनीतिक गतिविधियों को फिर से शुरू करेंगे। उनमें से कुछ अभी भी अपने घरों में बंद हैं। बीजेपी को छोड़कर सभी दलों ने पिछले साल अक्टूबर में जम्मू-कश्मीर में हुए ब्लॉक विकास परिषद चुनावों का बहिष्कार किया था।
सरकार विधानसभा चुनावों से पहले खाली पड़े पंचों और सरपंचों की 12,000 सीटों के लिए चुनाव कराना चाहती है। बीजेपी महासचिव और कश्मीर मामलों के प्रभारी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि जो लोग धारा 370 को वापस लाने की बात कर रहे हैं, 'उन्हें हुर्रियत में शामिल हो जाना चाहिए'।

क्या करेंगे राजनीतिक दल?

इन परिस्थितियों में यह सवाल है कि क्या ये सभी मुख्यधारा की पार्टियाँ अब पिछले साल 5 अगस्त को हुई घटना को भूलकर राजनीतिक क्षेत्र में कूदेंगीं? यदि हाँ, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि आम जनता, यहाँ तक कि उनके अपने कार्यकर्ता, इस पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं। 
ये दल इस बार मतदाताओं को लुभाने के लिए क्या कहेंगे और अब उनका चुनावी घोषणापत्र क्या होगा? जनता से क्या वादे करेंगे?
उदाहरण के लिए, नेशनल कॉन्फ्रेंस, कश्मीर का सबसे पुराना राजनीतिक दल, हर चुनाव में स्वायत्तता बहाल करने का वादा करता रहा है, लेकिन पिछले साल रही सही स्वायत्तता चली गई। पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र क्या होगा?
तथ्य यह है कि घाटी में इन राष्ट्रीय मुख्यधारा के संगठनों के लिए राजनीतिक गतिविधियों में विशेष रूप से चुनावी क्षेत्र में कूदना आसान नहीं है। ऐसी स्थिति में लोगों का भरोसा हासिल करना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। हालांकि, बीजेपी और अपनी पार्टी को इस तरह की समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ेगा। यह संभव है कि नई दिल्ली आने वाले दिनों में इन दोनों पार्टियों के बल पर एक राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने का इरादा रखती हो।

हिंसा जारी है

घाटी के किसी न किसी हिस्से में सेना और आतंकवादियों के बीच झड़पें हर कुछ दिन बाद होती रहती हैं। ताज़ा संघर्ष 4 अगस्त को उत्तरी कश्मीर के केरी इलाक़े में हुआ, जिसमें 3 सुरक्षाकर्मी और 2 उग्रवादी मारे गए। कश्मीर में जारी हिंसा को लेकर स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस साल झड़पों में 40 से अधिक सुरक्षाकर्मी और 160 आतंकवादी मारे गए हैं।

पुलिस प्रमुख ने हाल ही में कहा कि आतंकवाद का सफाया किया जा रहा है। यह भी सच है कि पिछले 30 वर्षों में अधिकारियों द्वारा इस तरह के दावे किए जाते रहे हैं। पर्यवेक्षकों का कहना है कि वास्तव में, आतंकवाद  मूल रूप से एक चरमपंथी विचारधारा का उत्पाद है। यही कारण है कि यह कभी भी संख्या कम नहीं होती। 
आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, इस साल के पहले 5 महीनों में 35 स्थानीय युवा उग्रवादियों के साथ शामिल हो गए हैं, जबकि सैन्य अधिकारियों का कहना है कि आतंकवादी फिर से एलओसी पर घुसपैठ करने के लिए तैयार हैं।

घुसपैठ जारी है

पिछले महीने, सेना के दूसरे इन्फैंट्री डिविज़न के जनरल ऑफिसर कमांडिंग (जीओसी) मेजर जनरल वरिंदर वत्स ने उत्तरी कश्मीर के बारामूला में संवाददाताओं से कहा, 'सीमा पार से कम से कम 250  आतंकवादी  घुसपैठ की तैयारी में बैठे हैं।' उन्होंने कहा कि पाकिस्तान सेना घुसपैठ की प्रतीक्षा कर रहे इन आतंकवादियों की सहायता और सुविधा दे रही है।

नियंत्रण रेखा पर गोलीबारी  

नियंत्रण रेखा पर हिंसा की घटनाएँ भी अक्सर होती हैं। पाकिस्तानी रेंजर्स आए दिन भारतीय चौकियों को निशाना बनाते रहते हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय के आँकड़ों के मुताबिक़, पिछले साल पाकिस्तानी सेना ने पिछले साल 3,086 बार और इस साल मई तक 1,547 बार बिना किसी उकसावे के संघर्षविराम का उल्लंघन किया है। इन आंकड़ों को देख कर सीमा पर स्थिति का अच्छी तरह से आकलन किया जा सकता है। 

मुख्यधारा के नेताओं को ख़तरा 

हाल के हफ़्तों में उग्रवादियों ने आधे दर्जन से अधिक बीजेपी कार्यकर्ताओं पर हमला किया और मार डाला। अभी सरकार ने ज़मीनी स्तर के 1,000 नेताओं और कार्यकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान करने का निर्णय लिया है, जो ख़तरे में हैं। इनमें से ज़्यादातर पंच और सरपंच हैं। उल्लेखनीय है कि जम्मू-कश्मीर में 3,650 सरपंच और 23,660 पंच हैं।

कई राजनीतिक कार्यकर्ता वर्तमान में सरकारी आवासों, होटलों और गेस्ट हाउसों में रखे जा रहे हैं। अगर सभी मुख्यधारा के संगठन चुनावी प्रक्रिया में कूद जाते हैं और सक्रिय हो जाते हैं, तो उनकी सुरक्षा सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।

खाई को पाटना कितना आसान? 

यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि बीजेपी की केंद्र सरकार घाटी और नई दिल्ली में लोगों के बीच विश्वास को कैसे बहाल करेगी, जिसे पिछले साल 5 अगस्त को ठेस लगी थी। यह उल्लेखनीय है कि घाटी में ही नहीं लद्दाख और करगिल में भी आक्रोश की आवाजें सुनाई दे रही हैं। यहाँ तक कि कुछ कश्मीरी पंडित नेताओं ने भी इसके ख़िलाफ़ अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है। 

इसमें कोई संदेह नहीं है कि पिछले साल नई दिल्ली के 5 अगस्त के फैसले से आम जनता ना खुश है। पर्यवेक्षकों का मानना है कि कश्मीरी लोगों और नई दिल्ली के बीच 5 अगस्त को अविश्वास की गहरी खाई पैदा हो गई है। यह देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा सरकार  इस खाई को पाटने के लिए क्या रणनीति अपनाती है।

कुछ कहना जल्दबाजी  

15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस समारोह को संबोधित करते हुए उप राज्यपाल मनोज सिन्हा ने घोषणा की थी कि जम्मू-कश्मीर में बातचीत की प्रक्रिया जल्द ही शुरू होगी। उन्होंने कहा था कि 'हम जम्मू-कश्मीर के बारे में नैरेटिव को बदलना चाहते हैं और शांति, विकास और सामाजिक समानता पर आधारित नैरेटिव बनाना चाहते हैं।'

ज़ाहिर है, सरकार कश्मीर में एक राजनीतिक प्रक्रिया शुरू करने जा रही है, लेकिन उप राज्यपाल प्रशासन को इस संबंध में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। केंद्र सरकार जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति, लोकतांत्रिक अधिकारों और सार्वजनिक व्यवस्था को बहाल करने में सफल हो सकती है या नहीं, इसका उचित समय पर जवाब दिया जाएगा, लेकिन यह निश्चित है कि कश्मीर में 'सब कुछ ठीक' कहना ग़लतबयानी है।

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