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अब्दुल्ला परिवार से क्यों नाराज़ हैं जम्मू-कश्मीर के लोग?

क्या फ़ारूक़ अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला ने भी स्वर्गीय शेख के नक्शेकदम पर चलने का मन बना लिया है? क्या इन दोनों ने भी शेख की तरह नई दिल्ली के साथ करार करने का मन बना लिया है? यही वह सवाल है जिस पर इन दिनों कश्मीर में बहस चल रही है। उमर अब्दुल्ला के बयान पर आम कश्मीरियों में रोष है।
हारून रेशी

नैशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला एक नए विवाद में घिर गए हैं। बीजेपी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करने के एकतरफ़ा कदम के एक वर्ष बाद जब हाल ही में उमर ने पहली बार अपना मुँह खोला, तो वह अपने ही शब्दों में उलझ कर रह गए। 
उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख में दावा किया कि वह तब तक चुनाव नहीं लड़ेंगे, जब तक राज्य के दर्जे को बहाल नहीं कर दिया जाता। घाटी में इसका मतलब यह निकाला गया कि वह नई दिल्ली से केवल राज्य का दर्जा वापस-भर करने के लिए कह रहे हैं। यानी बाकी सब उनकी निगाह में ठीक है। 
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बुरे फँसे अब्दुल्ला

उमर के बयान को लेकर सोशल मीडिया पर लोगों ने उन्हें ट्रोल किया। नैशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता आगा रूहुल्लाह  ने विरोध में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। कश्मीरी युवाओं ने भी सोशल मीडिया पर उमर अब्दुल्ला को आड़े हाथों लिया।
उमर अब्दुल्ला को 'मोदी सरकार का एजेंट' तक कहा गया। घबरा कर उमर को बार-बार सफ़ाई देनी पड़ी। उन्होंने यहाँ तक कहा कि जब तक वह ज़िंदा हैं, 5 अगस्त वाले दिल्ली के फ़ैसले को स्वीकार नहीं करेंगे।

क्या हुआ था 5 अगस्त को?

पिछले साल 4-5 अगस्त के बीच जम्मू-कश्मीर में कर्फ्यू लगा कर सभी टेलीफोन संचार, यहाँ तक कि लैंडलाइन फोन कनेक्शन भी काट दिए गए थे। इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई थी। अगले दिन संसद में एक विधेयक पारित कर भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 में संशोधन किया गया, अनुच्छेद 35 'ए' को समाप्त कर दिया गया। साथ ही जम्मू-कश्मीर को मिला हुआ पूर्ण राज्य का दर्जा भी ख़त्म करके इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बदल दिया गया। इस तरह एक झटके में जम्मू-कश्मीर राज्य से विशेष दर्जा छिन गया। 
सरकार ने इस एकतरफा फ़ैसले के विरोध में कश्मीर में लोगों की आवाज़ को दबाने के लिए हज़ारों लोगों को गिरफ़्तार किया। उनमें वे राजनेता भी शामिल थे जो पिछले 70 साल से कश्मीर में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों, फ़ारूक़ अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती को सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम यानी पीएसए के तहत जेल में डाल दिया गया था।

बदल गया जम्मू-कश्मीर

इस तरह, बीजेपी सरकार ने केवल जम्मू-कश्मीर के इतिहास को नहीं, बल्कि उसके भूगोल को भी बदल दिया। पिछले साल 4 अगस्त तक जम्मू-कश्मीर भारत का एकमात्र मुसलिम बहुल राज्य था, जिसके पास अर्ध-स्वायत्तता थी। इस राज्य का अपना संविधान और अपना झंडा था। यहाँ कोई भी बाहर का व्यक्ति भूमि और संपत्ति नहीं खरीद सकता था। किसी बाहरी को जम्मू-कश्मीर में सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती थी। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में किसी भी बाहरी को प्रवेश नहीं मिल सकता था। 
जम्मू-कश्मीर को यह विशेष दर्जा इसलिए हासिल था कि 1947 में महाराजा हरि सिंह ने भारत में कुछ शर्तों के साथ राज्य का विलय किया था। ये शर्तें थीं कि नई दिल्ली के पास केवल विदेशी मामले, रक्षा और मुद्रा के मामले रहेंगे। अन्य सभी मामलों में जम्मू-कश्मीर की संप्रभुता को बनाए रखा जाएगा।

छिन गई संप्रभुता?

हालांकि पिछले 70 वर्षों में जम्मू-कश्मीर की संप्रभुता का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे नई दिल्ली ने छीन लिया। उदाहरण के लिए, आजादी के बाद 18 साल यानी 1964 तक इस राज्य का अपना सदर-ए-रियासत और प्रधानमंत्री था। संसद और उच्चतम न्यायालय के निर्णय जम्मू-कश्मीर में सीधे लागू नहीं किए जा सकते थे। लेकिन पिछले सात दशकों में इन सभी कानूनों को निरस्त कर दिया गया और बाकी को पिछले साल 5 अगस्त को एक झटके में समाप्त कर दिया गया। 
अब कश्मीरियों को डर है कि अगले कुछ वर्षों में बाहरी लोगों को जम्मू-कश्मीर की नागरिकता मिल जाएगी। यहाँ के मूल निवासी अल्पसंख्यक बन जाएँगे।

अब्दुल्ला पर उठे सवाल

यही वज़ह है कि उमर अब्दुल्ला के ताज़ा बयान से घाटी में विवाद पैदा हुआ है। लोगों ने पूछना शुरू कर दिया कि उमर ने चुनाव लड़ने के लिए राज्य के दर्जे  को बहाल करने की शर्त क्या इसलिए रखी है ताकि जब वह मुख्यमंत्री बनें तो उनके पास अधिक शक्तियाँ हों। 
जम्मू-कश्मीर के लोग पूछने लगे हैं कि क्या उमर अब्दुल्ला को विशेष दर्जा और स्थायी निवास के क़ानून की कोई चिंता नहीं है, जो जम्मू-कश्मीर के लोगों से छीन लिया गया है?
जब से फ़ारूक़ अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला को जेल से रिहा किया गया है, कश्मीर में लोग उन्हें संदेह की नज़र से देखने लगे हैं। फ़ारूक़ अब्दुल्ला को इस साल 13 मार्च को रिहा किया गया था। डेढ़ हफ्ते बाद 24 मार्च को उनके बेटे उमर अब्दुल्ला को रिहा कर दिया गया।

चुप्पी से संदेह

अपनी रिहाई के बाद दोनों ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा छीनने और उसकी भौगोलिक स्थिति को बदलने के लिए नई दिल्ली द्वारा उठाए गए एकतरफ़ा कदम पर कोई चर्चा नहीं की। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि वह महामारी (कोरोना वायरस) की समाप्ति के बाद ही बोलेंगे। फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने अपनी रिहाई के बाद कोई भी राजनीतिक बयान देने से इनकार कर दिया।
कुछ न बोलने का उनका बहाना यह था कि जब तक अन्य राजनीतिक क़ैदियों को रिहा नहीं किया जाता, तब तक वह कोई राजनीतिक बयान नहीं देंगे। पिता-पुत्र की इस अजीब और रहस्यमय चुप्पी पर कश्मीर के आम लोग चकित रह गए। 

80 साल का रिश्ता

कश्मीर में एक सामान्य धारणा है कि राजनीतिक और भौगोलिक स्थिति के बारे में चर्चा करने की नैतिक ज़िम्मेदारी अब्दुल्ला परिवार की है, क्योंकि उसका कश्मीर के इतिहास के साथ पिछले 80-90 वर्षों से गहरा संबंध है। इस महत्त्वपूर्ण मोड़ पर कुछ पर्यवेक्षक उनकी चुप्पी को 'आपराधिक' चुप्पी कह रहे हैं।
पिता और पुत्र एक ऐसी पार्टी के नेता हैं जो न केवल ज़मीनी स्तर की है, बल्कि राज्य की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी भी है।  इसके अलावा फ़ारूक़ और उमर दिवंगत शेख मुहम्मद अब्दुल्ला के राजनीतिक उत्तराधिकारी हैं।

शेख के साथ क्या गुज़री थी?

शेख अब्दुल्ला ने ही 1947 में धर्म के नाम पर स्थापित पाकिस्तान के ऊपर 'धर्मनिरपेक्ष' भारत को प्राथमिकता दी थी। शेख ने उपमहाद्वीप के विभाजन से बहुत पहले दिवंगत जवाहरलाल नेहरू से अपनी दोस्ती को आगे बढ़ाया था। कश्मीर और भारत के बीच संबंधों की स्थापना के कुछ वर्षों बाद शेख को उनकी वफादारी के लिए 'पुरस्कृत' किया गया था। ये नेहरू थे, जिन्हें शेख ने अपना दोस्त माना, लेकिन जिन्होंने 1953 में उनसे सत्ता छीन कर उन्हें एक लंबी जेल यात्रा पर भेज दिया।

शेख जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री थे जब एक जूनियर पुलिस अधिकारी ने उनका दरवाजा खटखटा कर सूचित किया कि वह अब प्रधान मंत्री नहीं रहे, उन्हें स्वयं को अब एक क़ैदी समझना चाहिए।

11 साल की जेल, 11 साल की चुप्प

शेख 11 साल तक जेल में रहे और 11 साल तक भटकते रहे। इस अवधि के दौरान राज्य के विशेष दर्जे को क्रमिक संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से कम किया गया। शेख मुहम्मद अब्दुल्ला के अनुयायी उन्हें 'कश्मीर का शेर' कहते थे, क्योंकि 1930 के दशक में तानाशाह डोगरा शासकों के ख़िलाफ़ विद्रोह का झंडा उठा वह एक शेर की तरह दहाड़े थे। लेकिन 11 साल जेल में रहने के बाद शेख अब टूट से गये थे।

रिहा होने के बाद, उन्होंने 11 साल तक मौन धारण किये रखा, और फिर 1975 में प्रधान मंत्री इंदिरा गाँधी के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। कश्मीर में साधारण लोग इस समझौते को 'शेख अब्दुल्ला विश्वासघात' कहते हैं। 
इस समझौते में शेख अब्दुल्ला ने जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को कमज़ोर करने के लिए 22 साल की इस अवधि के दौरान नई दिल्ली द्वारा किए गए सभी संवैधानिक संशोधनों को स्वीकार कर लिया था।
यानी शेख अब्दुल्ला के समझौते का मतलब यह था कि उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में गिरफ्तार किया गया, लेकिन उनकी वापसी मुख्यमंत्री के तौर पर हुई। इस समझौते के बाद शेख अब्दुल्ला को 'नई दिल्ली का एजेंट' करार दिया गया।

शेख के नक्शेकदम पर फ़ारूक़, उमर?

क्या फ़ारूक़ अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला ने भी स्वर्गीय शेख के नक्शेकदम पर चलने का मन बना लिया है? क्या इन दोनों ने भी शेख की तरह नई दिल्ली के साथ करार करने का मन बना लिया है? यही वह सवाल है जिस पर इन दिनों कश्मीर में बहस चल रही है।
उमर अब्दुल्ला के बयान पर आम कश्मीरियों में रोष है। उमर के मुताबिक़, अगर नई दिल्ली ने राज्य का दर्जा बहाल किया तो वह चुनाव लड़ेंगे। लेकिन, लोगों का मानना है कि यह उमर अब्दुल्ला के लिए चुनाव लड़ने का समय नहीं है, बल्कि उन्हें जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा फिर से हासिल करने के लिए संघर्ष करना चाहिए ।

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