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कश्मीर: डीडीसी चुनाव के बीच रोशनी घोटाले को लेकर सियासत गर्म

जम्मू-कश्मीर में डीडीसी चुनाव के बीच ही रोशनी घोटाले का शोर खड़ा हो गया है। ख़बरों के मुताबिक़, इस घोटाले में नेशनल कॉन्फ्रेन्स, पीडीपी और कांग्रेस के नेताओं का नाम सामने आ रहा है। जितनी शोर-शोर से इस घोटाले को उठाया जा रहा है, क्या वास्तव में इसमें उतना दम है, इसकी पड़ताल करनी ज़रूरी है। लेकिन पहले ये समझना होगा कि ये रोशनी घोटाला क्या है। 

2001 में फ़ारूक़ अब्दुल्ला सरकार ने रोशनी एक्ट बनाया था। एक्ट का उद्देश्य यह बताया गया था कि राज्य सरकार की ज़मीनों पर जिन लोगों का अवैध कब्जा है, उनसे इसे वापस लेकर नियमित किया जाएगा या जिन लोगों के पास ऐसी ज़मीनें हैं, उन्हें इसके वैध अधिकार दिए जाएंगे। 

इसके बाद जिन लोगों का सरकार की ज़मीनों पर अवैध कब्जा था, उन्होंने ज़मीनों के मालिकाना अधिकारों को बेचना शुरू कर दिया। इससे मिलने वाले पैसे से राज्य में बिजली के लिए पावर प्रोजेक्ट लगाने की बात कही गई थी। 

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इस एक्ट के तहत पूरी घाटी में बड़े पैमाने पर ज़मीनों की ख़रीद-फरोख़्त का काम हुआ। यह काम राजस्व विभाग के अफ़सरों की निगरानी में हुआ। ज़मीनों का सही दाख़िल-ख़ारिज हुआ और लोगों को ज़मीनों के वैध दस्तावेज़ भी दिए गए। 

बीते कुछ सालों में इस एक्ट की आड़ में जमकर भ्रष्टाचार भी हुआ। आरोप है कि राज्य सरकारों ने अपनी पसंद के बड़े नौकरशाहों, राजनेताओं और पुलिस अफ़सरों को ज़मीनें दीं। कहा जा रहा है कि इनमें जम्मू-कश्मीर के पूर्व वित्त मंत्री हसीब द्राबू और उनके परिवार के सदस्यों का भी नाम शामिल है।

इसके अलावा बड़े व्यवसायियों में केके अमला, मुश्ताक़ अहमद चाया, पूर्व नौकरशाह मुहम्मद शफ़ी पंडित, तनवीर जहां सहित कई लोगों के नाम शामिल हैं। दक्षिणपंथी संगठनों ने इसे ‘लैंड जिहाद’ भी कहा और रोशनी एक्ट को जम्मू के हिंदु बहुल इलाक़ों में जनसंख्या को बदलने वाला बताया। 

हाई कोर्ट ने बताया अवैध 

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने अक्टूबर महीने में रोशनी एक्ट को अवैध और ग़ैर-क़ानूनी घोषित किया था और इस एक्ट के तहत बेची गई ज़मीनों की जांच सीबीआई को करने के आदेश दिए थे। सीबीआई इस मामले में चार केस भी दर्ज कर चुकी है। 2018 में तत्कालीन राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने इस एक्ट को निरस्त कर दिया था और अब हाई कोर्ट के आदेश के बाद राज्य के वतर्मान प्रशासन ने भी कहा है कि इस एक्ट के कई प्रावधानों का दुरुपयोग हुआ है। 

15 हज़ार नाम!

हाई कोर्ट के आदेश के बाद राजस्व विभाग के अफ़सरों ने रोशनी एक्ट के तहत किए गए सभी दाखिल-खारिज को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही एक्ट के जरिये फ़ायदा हासिल करने वाले 15 हज़ार लोगों के नामों की सूची को तैयार किया जा रहा है और इसे नेशनल इन्फ़ॉर्मेटिक्स सेंटर की वेबसाइट पर अपलोड किया जाएगा। 

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इस मामले में सबसे पहले 2011 में और फिर 2014 में हाई कोर्ट में याचिका दायर कर कहा गया था कि जम्मू-कश्मीर में राज्य सरकार और वन विभाग की ज़मीनों पर अतिक्रमण किया जा रहा है। इन्हीं याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अक्टूबर महीने में अदालत ने अफ़सरों को जमकर फटकार लगाई थी। 

जम्मू-कश्मीर के डिविजनल कमिश्नर रोशनी एक्ट के तहत जम़ीनों के दाख़िल-ख़ारिज की प्रक्रिया की समीक्षा करेंगे और इस बारे में जिला उपायुक्तों को भी सरकार को जानकारी देते रहने के निर्देश दिए गए हैं। 

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने अफ़सरों को निर्देश दिया है कि ऐसे प्रभावशाली लोगों के नामों की अंतिम बार और जांच कर लें, जिन्हें इस एक्ट से फ़ायदा हुआ है ताकि उनके नामों को धीरे-धीरे जनता के बीच में जारी किया जा सके। प्रशासन ने फ़ायदा हासिल करने वाले कुछ लोगों की लिस्ट जारी भी कर दी है।

कैग की रिपोर्ट 

2014 में कैग की रिपोर्ट में कहा गया था कि यह एक्ट अपने लक्ष्यों को पाने में फेल रहा है। इसके जरिये 25,448 करोड़ रुपये जुटाने का टारगेट था जबकि 2007 से 2013 के बीच सिर्फ 76 करोड़ रुपये ही जुटाए गए। रिपोर्ट के मुताबिक़, ये पैसा राज्य की 3,48,160 कैनाल ज़मीन के ट्रांसफ़र के बदले मिला, जो कि वास्तव में 317.54 करोड़ होना चाहिए था।

ग़रीबों के सामने मुश्किल

जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट के इसे ग़ैर-क़ानूनी कहने के बाद और राज्य के प्रशासन द्वारा निरस्त करने के बाद सबसे बड़ी मुश्किल ग़रीबों के सामने आ खड़ी हुई है। एक्ट के लागू होने के बाद ग़रीब लोगों को अमीर लोगों ने ज़मीनों को ख़रीदने का लालच दिया और उन्होंने जैसे-तैसे पैसे जुटाकर ज़मीन ख़रीदी थी। लेकिन अब वे ताज़ा फ़ैसले के बाद परेशान हैं क्योंकि वे अपनी हाड़-तोड़ की कमाई से ज़मीन पर मकान भी बना चुके हैं। 

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‘द वायर’ के मुताबिक़, पुलवामा के रहने वाले एक शख़्स का कहना है कि सरकार के कहने पर उन्होंने ज़मीन ख़रीदने के लिए आवेदन किया और पैसे भी चुकाए। लेकिन अब 20 साल बाद जब उन्होंने मेहनत की कमाई से इस पर घर बना लिया है तो सरकार कैसे उनका घर गिरा सकती है और उन्हें बेघर कर सकती है। बाक़ी कई लोगों की भी यही परेशानी है। 

एडवोकेट शकील अहमद भी कहते हैं कि इस एक्ट के जरिये ऐसे लोग जिनके पास ज़मीन नहीं थी और ग़रीब थे, ऐसे लोगों को ज़मीन का अधिकार मिला है लेकिन कुछ मामलों में भ्रष्टाचार हुआ है न कि सारे केसों में। वे कहते हैं कि हाई कोर्ट के आदेश के बाद से ही जो ग़रीब लोग जिन्हें इससे ज़मीन मिली है, वे परेशान हैं। 

डीडीसी चुनाव के बीच ही राज्य में गुपकार गठबंधन को लेकर ख़ासी गहमा-गहमी रही। अमित शाह के इसे गुपकार गैंग बताए जाने पर उमर अब्दुल्ला, महबूबा और कांग्रेस ने भी पलटवार किया।
हाई कोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई इस मामले की जांच में जुटी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि अगर वास्तव में भ्रष्टाचार हुआ है तो इसकी ईमानदारी से जांच के बाद सच सामने आएगा वरना कहीं ऐसा न हो कि डीडीसी चुनाव के बाद मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए। 
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