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वाजपेयी-मोदी के समय कश्मीरी हिन्दुओं की घर वापसी नहीं, बीजेपी करती है ध्रुवीकरण

कश्मीर घाटी से हिन्दुओं के पलायन को राजनीतिक मुद्दा बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी ने इन लोगों की घर वापसी के लिए क्या किया और कितने लोगों को वापस कर सकी है, यह सवाल उठना स्वाभाविक है। यह सवाल अहम इसलिए भी है कि पाकिस्तानी आतंकवादी गुट हिज़बुल मुजाहिदीन की खुली धमकियों और कई जगहों पर उनके हमलों की वजह से पंडितों के पलायन को बीजेपी ने मुद्दा बनाया और इस पर राजनीतिक ध्रुवीकरण की कोशिशें कई बार कीं।
लेकिन यह महत्वपूर्ण है कि पहले अटल बिहारी वाजपेयी और अब नरेंद्र मोदी की सरकारों ने अपने कार्यकाल पूरे किए, लेकिन कश्मीरी हिन्दू अपने घर नही लौट सके।

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बीजेपी इस मुद्दे पर आक्रामक होती है, इसे हिन्दू बहुमत वाले देश में हिन्दुओं के ही धार्मिक उत्पीड़न के रूप में पेश करती है, कश्मीरी मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत का माहौल बनाने की कोशिश करती है।
बीजेपी इस बात का जवाब नहीं दे पाती है कि उसने ही क्या किया है और यदि बहुत कुछ किया है तो दिल्ली समेत देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले कश्मीरी हिन्दू अपने घर क्यों नही लौटे हैं।

क्या हुआ था कश्मीर में?

श्रीनगर से छपने वाले उर्दू अख़बार ‘आफ़ताब’ ने 4 जनवरी, 1990 को आतंकवादी गुट हिज़बुल मुजाहिदीन का एक प्रेस बयान छापा है। इसमें घाटी के सभी हिन्दुओं से कश्मीर छोड़ कर चले जाने को कहा गया था। इसी दिन एक दूसरे अख़बार ‘अल सफ़ा’ ने भी आतंकवादियों की धमकियों से जुड़ी ख़बर छापी।

एके-47 से लैस आतंकवादियों ने सेना के मार्च-पास्ट की तरह कई इलाकों का दौरा किया। कई जगहों पर उन्होंने हमले किए और कुछ हिन्दू मारे गए। ऑडियो कैसेट पर जारी धमकियों, खुली नारेबाजी, हमले और आतंक के बीच हज़ारों कश्मीरी हिन्दुओं ने 19 जनवरी की रात अपने-अपने घर छोड़ दिए और किसी तरह जम्मू पहुँचे जहाँ से वे दिल्ली और दूसरी जगह चले गए। 

केंद्र में थी बीजेपी-समर्थित सरकार

उस समय केंद्र में वी. पी. सिंह की सरकार थी, जिसे बीजेपी ने बाहर से समर्थन दे रखा था। फ़ारूक़ अब्दुल्ला की राज्य सरकार को भंग कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था जगमोहन राज्यपाल बनाए गए थे।
जिस समय हज़ारों कश्मीरी पंडितों को घर-बार छोड़ कर भागना पड़ा था, जगमोहन के हाथों में प्रशासन था, केंद्र में बीजेपी-समर्थित सरकार थी। लेकिन प्रशासन ने घाटी में ऐसा कोई कदम नहीं उठाया, जिससे कश्मीरी पंडितों को भरोसा होता और वे घर-बार छोड़ कर नहीं भागते।

वाजपेयी ने क्या कहा था?

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 25 मार्च, 2003 को कहा कि कश्मीरी हिन्दुओं की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था की जाएगी, एक आर्थिक पैकेज का एलान किया जाएगा और यह इंतजाम किया जाएगा कि सभी विस्थापित पंडित अपने-अपने घर लौट जाएँ। 

तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 25 मार्च, 2003 को कहा कि कश्मीरी हिन्दुओं की सुरक्षा की पूरी व्यवस्था की जाएगी, एक आर्थिक पैकेज का एलान किया जाएगा और यह इंतजाम किया जाएगा कि सभी विस्थापित पंडित अपने-अपने घर लौट जाएँ। 

हर कश्मीरी के लिए 3,000 रुपये!

वाजपेयी ने विस्थापित कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के लिए 6,000 करोड़ रुपए के आर्थिक पैकेज का एलान किया। पर कश्मीरी हिन्दुओं ने इसे ‘नाकाफ़ी’ कह कर खारिज कर दिया। उनका कहना था कि आतंकवादी गतिविधियों की वजह से कुल मिला कर 3.50 लाख हिन्दुओं का पलायन कश्मीर घाटी से हुआ। उनके लिए यह रकम बहुत छोटी है। 

उस समय टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए कश्मीरी समिति के तत्कालीन अध्यक्ष सुनील शकधर ने कहा कि यह तो ‘कुछ भी नहीं’ है। इसी तरह ऑल इंडिया कश्मीरी पंडित कॉन्फ्रेंस के प्रमुख एच. एन. जट्टू ने इसे ‘निराशाजनक’ क़रार दिया। उन्होंने कहा कि ‘इससे हर कश्मीरी को 2,400 रुपये से लेकर 3,000 रुपए मिलेंगे।’ इस पैकेज को स्वीकार कर कितने लोग घर वापस लौटे, पता नहीं। 

मोदी का कश्मीर पैकेज

नरेंद्र मोदी ने 7 नवंबर, 2015 को पूरे कश्मीर के लिए 80,000 करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की। लेकिन यह पैकेज विस्थापित कश्मीरियों के पुनर्वास के लिए नहीं था। यह पूरे राज्य की आर्थिक प्रगति के लिए था और कश्मीर को चरमपंथ से बाहर निकालने की कोशिश के तहत था।
मोदी ने इसके साथ ही वाजपेयी के पुराने ‘कश्मीरियत, जम्हूरियत, इन्सानियत’ का नारा दिया था और कहा था कि जम्मू-कश्मीर के विकास में पैसे की कोई कमी नहीं होने दी जाएगी।

कश्मीरी हिन्दुओं का दड़बाईकरण?

एक बार केंद्र सरकार ने यह प्रस्ताव किया था कि विस्थापितों को एक ख़ास जगह बसाया जाए और उनकी अलग कॉलोनी बने। पर इसका व्यापक विरोध इस आधार पर हुआ कि यह हिन्दुओं का ‘दड़बाईकरण’ होगा। विस्थापितों का भी कहना था कि वे अपने गाँव-शहर-कस्बा जाना चाहते हैं, अपने घर में अपने पुराने पड़ोसियों के बीच रहचना चाहते हैं। तब यह माना जाएगा कि वे अपने घर लौटे हैं। 
सवाल यह है कि वाजपेयी और नरेंद्र मोदी का कुल कार्यकाल लगभग 12 साल का हो गया। लेकिन इस दौरान कितने कश्मीरी हिन्दू अपने घर लौट पाए हैं? यह संख्या न तो राज्य दे सकता है न ही केंद्र सरकार  कुछ कह सकती है। वजह साफ़ है, कश्मीरी पंडित अपने घर गए ही नहीं है, कुछ गिने-चुने लोग गए हों तो अलग बात है।
ऐसी पार्टी क्यों कश्मीरी हिन्दुओं को अपने ही देश में जलावतन होने की बात करती है? इसकी वजह यह है कि वह इस मुद्दे पर भी ध्रुवीकरण चाहती है, वह इसी बहाने कश्मीरी मुसलमानों के ख़िलाफ़ एक माहौल बनाना चाहती है। यह उसके उग्र राष्ट्रवाद के नैरेटिव के भी मुफ़ीद है। सवाल वहीं रुका हुआ है, कश्मीरी अपने घर कब लौटेंगे। 

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प्रमोद मल्लिक
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