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क्या मोदी सरकार को कश्मीर के मुख्य राजनीतिक दलों का मौन समर्थन हासिल है?

यह देखा जाना बाक़ी है कि जम्मू-कश्मीर को लेकर नई दिल्ली द्वारा उठाए गए कदम पर क्या मुख्यधारा के राजनीतिक दल वास्तव में इसके ख़िलाफ़ एक व्यावहारिक प्रयास करेंगे या नई दिल्ली के फ़ैसलों के पूर्ण कार्यान्वयन में जाने-अनजाने में अपना योगदान देंगे। इन राजनीतिक दलों की रहस्यमय चुप्पी को कुछ लोगों द्वारा केंद्र की मोदी सरकार को उनके गुप्त समर्थन के रूप में भी देखा जा रहा है।
हारून रेशी

जम्मू और कश्मीर से छीन लिए गए विशेष संवैधानिक दर्जे (स्टेटहुड) को बहाल करने के लिए कश्मीर के मुख्यधारा के नेताओं की प्रतिबद्धता केवल ज़बानी जमा खर्च साबित हो रही है। पिछले साल 4 अगस्त को, जब भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 और 35 ए पर खतरे के बादल मंडरा रहे थे, तब नेशनल कॉन्फ्रेन्स के नेता फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने श्रीनगर के गुप्कर रोड स्थित अपने आवास पर सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। बैठक में इन संवैधानिक प्रावधानों को बनाए रखने का संकल्प लिया गया था। 

बैठक में गुप्कर घोषणा के नाम से पारित प्रस्ताव पर फ़ारूक़ अब्दुल्ला, पीडीपी की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, कांग्रेस नेता ताज मोहिउद्दीन, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (एम) के नेता मुहम्मद यूसुफ तारिगामी, जम्मू एंड कश्मीर पॉलिटिकल मोमेंट के शाह फैसल और अवामी नेशनल कॉन्फ्रेन्स के नेता मुजफ्फर शाह ने हस्ताक्षर किए थे। 

लेकिन इसके ठीक एक दिन बाद, नई दिल्ली ने संसद में एक विधेयक पारित किया जिसे जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम कहा गया, जिसमें दोनों संवैधानिक प्रावधानों को रद्द कर दिया गया और एक झटके में राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बदल दिया गया।

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राजनीतिक सक्रियता से दूरी क्यों?

इसके ठीक एक साल बाद, यानी 4 अगस्त, 2020 को फ़ारूक़ अब्दुल्ला के घर पर इन्हीं राजनीतिक दलों की एक और बैठक हुई। जिसमें अनुच्छेद 370 और 35 ए की वापसी और राज्य के दर्जे की बहाली लिए लड़ने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गयी थी, लेकिन अब तक यह बयान केवल कागजी साबित हुआ है। किसी भी दल ने अब तक व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से किसी भी राजनीतिक गतिविधि को अंजाम नहीं दिया जिसे  कि 'संघर्ष' कहा जा सके।

देखिए, कश्मीर के हालात पर वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष का वीडियो- 

दिलचस्प बात यह है कि जब से जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त किया गया है, नेशनल कॉन्फ्रेन्स के तीन सदस्यों, फ़ारूक़ अब्दुल्ला, न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) हसनैन मसूदी और अकबर लोन को पहली बार संसद के सत्र में भाग लेने का मौक़ा मिला है। लेकिन पर्यवेक्षक यह देख कर स्तब्ध रह गए कि नेशनल कॉन्फ्रेन्स के सदस्यों ने धारा 370 और 35 ए की वापसी और राज्य के दर्जे की बहाली की सीधे मांग की बजाय लोकसभा में बहस की मांग की। सरकार ने इस मांग पर ध्यान नहीं दिया और बात आई गई हो गई।

पत्रकार और विश्लेषक तारिक़ अली मीर कहते हैं, “नेशनल कॉन्फ्रेन्स गुप्कर घोषणा की वास्तविक निर्माता है। यह आशा थी कि वह घोषणा पत्र में  किये गए वादे के अनुसार कश्मीर और उसके राज्य के विशेष दर्जे को बहाल करने के लिए ठोस क़दम उठाएगी। लेकिन नेशनल कॉन्फ्रेन्स के नेताओं ने संसद में बहस करने का आह्वान किया है।”

मीर ने कहा, “जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम को पारित करने के लिए बहुमत का समर्थन मिला था। अब, अगर कोई बहस होती है, तो भी यह बहुमत यथास्थिति की बहाली का विरोध करेगा और नेशनल कॉन्फ्रेन्स को अपना सा मुंह लेकर जाना होगा।”

कई दलों ने दिया था समर्थन

उल्लेखनीय है कि कश्मीर की विशेष स्थिति और उसके राज्य के दर्जे को खत्म करने के कानून को  सत्तारूढ़ बीजेपी सांसदों द्वारा ही नहीं, बल्कि विपक्षी दलों- आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तेलुगु देशम पार्टी, बीजू जनता दल, वाईएसआर कांग्रेस, ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम और यहां तक कि कांग्रेस पार्टी के कुछ सदस्यों ने भी अपना समर्थन दिया था।

ऐसी स्थिति में, नेशनल कॉन्फ्रेन्स के सदस्यों द्वारा फिर से चर्चा के लिए मांग करना हास्यास्पद है। हालांकि, नेशनल कॉन्फ्रेन्स के सदस्य, न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) हसनैन मसूदी ने जोर देकर कहा कि यह एक लंबी लड़ाई है। 

हमने कभी नहीं कहा कि हम एक दिन में कश्मीर के विशेष दर्जे को बहाल कराएंगे, इसमें समय लगेगा। यह एक लंबी लड़ाई है। हमने नई दिल्ली के क़दम को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दी है और हम देश के बाकी राजनीतिक दलों को इस के नुकसान के बारे में बताने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन जल्दी कुछ नहीं हो सकता है।


न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) हसनैन मसूदी ने सत्य हिन्दी से कहा

अब तक नज़रबंद हैं महबूबा 

आख़िर, गुप्कर घोषणा में प्रतिबद्धता केवल प्रेस बयानों तक ही सीमित क्यों रही और राजनीतिक दल इसके लिए कोई व्यावहारिक प्रयास क्यों नहीं कर पाए हैं? इस सवाल के जवाब में, पीडीपी नेता ताहिर मुहम्मद सईद कहते हैं, “देखिए, पिछले साल गुप्कर में जो प्रस्ताव पारित किया गया था, उस पर हमारी पार्टी की नेता महबूबा मुफ्ती ने भी हस्ताक्षर किए हैं। लेकिन उस दिन से अभी तक हमारी नेता अभी भी जेल में हैं, पार्टी के बाकी नेताओं को उनसे मिलने नहीं दिया जा रहा है। ऐसी स्थिति में कोई भी पार्टी क्या संघर्ष कर सकती है?”

सईद कहते हैं, “राजनीतिक अभियान चलाने के लिए सबसे पहले एक अनुकूल वातावरण होना चाहिए, लेकिन कदम-कदम पर प्रतिबंध लगे हैं। मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि हमने केंद्र के इस फ़ैसले को कभी स्वीकार नहीं किया और न ही करेंगे। अब हमारा एकमात्र लक्ष्य अपने अधिकारों के लिए लड़ना है।”

राजनीतिक पर्यवेक्षकों को डर है कि प्रत्येक गुजरते दिन के साथ, जम्मू और कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति और एक राज्य के रूप में दर्जे को बहाल करने की संभावनाएं लुप्त होती जा रही हैं।

जनसांख्यिकी बदलने का खतरा 

पत्रकार खुर्शीद आलम कहते हैं, “जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के लागू होने के बाद, यहां लगातार नए कानून लागू किए जा रहे हैं। लोगों को यह भी डर है कि इन कानूनों से जम्मू और कश्मीर की जनसांख्यिकी बदल जाएगी। ऐसे में, यह बात पूरे भरोसे के साथ कही जा सकती है कि जितना अधिक समय बीतता जाएगा, जम्मू और कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति की बहाली की सम्भावना लुप्त होती जाएगी।”

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खुर्शीद आलम ने आगे कहा, “अब जहां तक सुप्रीम कोर्ट में नेशनल कॉन्फ्रेन्स द्वारा दायर अपील का सवाल है। पहली बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट अपनी इच्छा का मालिक है, वह इस मामले का निर्णय करने में वर्षों का समय भी ले सकता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि सर्वोच्च न्यायालय 5 अगस्त के संसद के निर्णय को रद्द कर देता है, तो 'गुप्कर घोषणा' भी निरस्त हो जाएगी।”

गुप्त समर्थन? 

यह देखा जाना बाक़ी है कि जम्मू-कश्मीर को लेकर नई दिल्ली द्वारा उठाए गए इस एकतरफा कदम पर क्या मुख्यधारा के राजनीतिक दल वास्तव में इसके ख़िलाफ़ एक व्यावहारिक प्रयास करेंगे या नई दिल्ली के फ़ैसलों के पूर्ण कार्यान्वयन में जाने-अनजाने में अपना योगदान देंगे। इन राजनीतिक दलों की रहस्यमय चुप्पी को कुछ लोगों द्वारा केंद्र की मोदी सरकार को उनके गुप्त समर्थन के रूप में भी देखा जा रहा है।

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