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प्रतीकात्मक तसवीर।

झारखंड के खूंटी में गो हत्या से जुड़े मामलों में सभी 53 अभियुक्त दोषमुक्त 

पिछले कुछ सालों में झारखंड और देश के कई इलाक़ों में गो हत्या के नाम पर लोगों को पीटे जाने की घटना सामने आई है। अंग्रेजी अख़बार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने झारखंड के ऐसे ही एक जिले खुंटी में हुए मामलों को लेकर ख़बर प्रकाशित की है। अख़बार ने खुंटी के जिला अदालत के रिकॉर्ड की समीक्षा की है और इससे यह जानकारी सामने आई है कि 2018 के बाद से गो हत्या या गो हत्या के इरादे से जुड़े 16 मामलों में 53 अभियुक्तों को अदालत ने दोषमुक्त क़रार दिया है। इन 53 अभियुक्तों के ख़िलाफ़ पिछले 6 साल में ये केस दर्ज हुए थे।
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63 साल के बाली मुंडा को इस साल जनवरी में सबूतों के अभाव में अदालत ने दोषमुक्त साबित कर दिया था। अख़बार ने बाली मुंडा से बातचीत की है। बाली मुंडा उन लोगों में शामिल हैं जिन्हें गो हत्या के मामले में ‘झूठा’ फंसाया गया। बाली को 89 दिन जेल में बिताने पड़े। बाली कहते हैं कि उन्हें केस के सिलसिले में 21 बार अपने गाँव से खुंटी जिले की अदालत जाना पड़ा और वह इस परेशानी को नहीं भूल सकते। मुंडा कहते हैं कि इसके लिए उन्हें अपने रिश्तेदारों से 14 हज़ार रुपये तक उधार लेने पड़े। 

मुंडा कहते हैं कि वह क़िस्मत वाले थे कि वह बच गये। मुंडा पर गो रक्षकों ने खुंटी जिले के जलटांडा बाज़ार इलाक़े में अगस्त 2017 में हमला किया था और इसके बाद उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था। इसके दो साल बाद बीती 22 सितंबर को गो हत्या के शक में भीड़ ने सुआरी गाँव में कालांतुस बाड़ला नाम के व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी और दो लोगों को घायल कर दिया था। यह हमला उस जगह से सिर्फ़ 8 किमी. दूर था जहाँ पर मुंडा पर हमला हुआ था। 

अख़बार के मुताबिक़, मुंडा कहते हैं, ‘मैं समझ सकता हूँ कि उस समय क्या होता है जब आप पर भीड़ हमला करती है। बजरंग दल के लोगों ने मुझे थप्पड़ मारे थे और मुझे पुलिस के हवाले कर दिया था। मेरी क़िस्मत अच्छी थी कि मैं बच गया।’

मुंडा ने अख़बार से बातचीत में कहा कि दोषमुक्त साबित होने के बाद भी उन्हें बहुत ज़्यादा राहत नहीं मिली है। मुंडा ने कहा, ‘जेल में मेरी सेहत ख़राब हो गई और मैं अभी भी इससे उबर नहीं पाया हूँ। डॉक्टर ने मुझसे जल्द से जल्द इलाज कराने के लिए कहा है। इसके अलावा पैसे की भी दिक़्क़त है। हमारी अब गाँव में भी इज्जत नहीं रही और अब सब कुछ भगवान के ही भरोसे है।’

अख़बार के मुताबिक़, ‘दोष मुक्त किए गये कुछ लोगों के मामलों में अदालत ने पाया कि गाय के मांस का सैंपल जाँच के लिए फ़ॉरेंसिक साइंस लैब (एफ़एसएल) को नहीं भेजा गया और कुछ मामलों में जो गवाह थे, वे अदालत के सामने पेश ही नहीं हुए। ऐसे दो मामलों में बजरंग दल से जुड़े लोग गवाह थे।’ 

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने ऐसे ही कुछ मामलों के बारे में अपनी ख़बर में बताया है। पहला मामला 23 अगस्त, 2013 में खुंटी पुलिस स्टेशन का है। इस मामले में चार लोगों के ख़िलाफ़ गो तस्करी के आरोप में मुक़दमा दर्ज हुआ था। 27 सितंबर 2018 को इस केस में फ़ैसला आया था। कोर्ट ने फ़ैसले में कहा कि केस में कोई भी गवाह सामने नहीं आया, एसपी खुंटी को समन और वारंट भी जारी किये गये लेकिन अभियोजन पक्ष की ओर से न तो किसी गवाह को सामने लाया गया और न ही कोई दस्तावेज दिये गये। जज तरूण कुमार ने अपने फ़ैसले में कहा कि इस मामले में अभियुक्तों के ख़िलाफ़ कोई भी सबूत नहीं मिला। 

दूसरा मामला 26 सितंबर, 2013 में तोड़पा पुलिस स्टेशन का है। इस मामले में पशुओं को ले जाने के मामले में दो लोगों के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया गया था। 30 जनवरी, 2019 को इस मामले में फ़ैसला आया और अदालत ने कहा कि गवाहों के बयान अफ़वाहों पर आधारित थे और इन्हें सबूत नहीं माना जा सकता। जज रवि प्रकाश तिवारी ने पाया कि कोई भी गवाह अभियुक्त की पहचान नहीं कर सका और उन्होंने फ़ैसला दिया कि अभियोजन पक्ष अपनी बात को साबित नहीं कर सका। 

अख़बार ने जब इस बारे में डीआईजी (चोटानगर रेंज) अमोल होमकर वेणुकांत से बात की तो उन्होंने कहा, ‘मेरे पास न तो अदालत के फ़ैसले हैं और न ही अदालत का कोई रिकॉर्ड, जिस वजह से मैं यह नहीं कह सकता कि लोगों को दोषमुक्त क्यों किया जा रहा है। एक बार हम रिकॉर्ड की जाँच करेंगे और उसके बाद ही हम आगे की कार्रवाई के बारे में फ़ैसला करेंगे।’ 

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ऐसे ही मामलों में ख़ुटी जिले की अदालत में एक अभियुक्त का केस लड़ रहे वकील रमेश जायसवाल ने अख़बार से बातचीत में कहा, ‘मैंने पिछले कुछ सालों में एक भी मामले में दोष साबित होते नहीं देखा क्योंकि अदालत के सामने कोई भी सबूत पेश नहीं किया जाता। गवाह सामने नहीं आते, मांस को जाँच के लिए एफ़एसएल लैब नहीं भेजा जाता और इस वजह से ही केस कमजोर हो जाता है।’ 

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इससे पता चलता है कि गो हत्या से जुड़े कुछ मामलों में निर्दोष लोगों को फंसाया जा रहा है। ऐसे निर्दोष लोग लंबे समय तक अदालती कार्यवाही के चलते परेशान होते हैं और उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को भी इससे नुक़सान होता है। और जो लोग गो हत्या से जुड़े मामलों में वास्तव में दोषी हैं, उनके ख़िलाफ़ अदालतों में गवाही देने के लिए कोई सामने नहीं आता और उनके ख़िलाफ़ सबूत जुटाने बेहद मुश्किल हैं। 

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