झारखंड में दो राज्यसभा सीटों के लिए इंडिया गठबंधन के पास पर्याप्त 56 विधायक थे, जबकि एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के पास जीत के लिए ज़रूरी संख्या से चार विधायक कम थे। एक सीट पर निर्दलीय नाथवानी और दूसरी सीट पर जेएमएम के बैद्यनाथ राम विजयी घोषित हुए हैं।
झारखंड में कांग्रेस और इंडिया गठबंधन को गुरुवार को तब बड़ा झटका लगा जब राज्यसभा की दो सीटों के लिए हुए चुनाव में एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी ने जीत हासिल कर ली। खास बात यह है कि एनडीए के पास जीत के लिए ज़रूरी संख्या नहीं थी। इंडिया गठबंधन के पास दो उम्मीदवारों की जीत के लिए ज़रूरी 56 विधायक होने के बावजूद कांग्रेस के उम्मीदवार प्रणव झा हार गए। सत्तारूढ़ JMM के उम्मीदवार बैद्यनाथ राम आसानी से दूसरी सीट जीत गए। क्रॉस वोटिंग की वजह से INDIA गठबंधन को यह बड़ा झटका लगा है। झारखंड विधानसभा में कुल 81 विधायक हैं। राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए किसी उम्मीदवार को कम से कम 28 प्रथम वरीयता वाले वोट चाहिए थे।
जेएमएम के बैद्यनाथ राम को 30 वोट मिले और वह जीत गए। NDA समर्थित परिमल नाथवानी को 28 वोट मिले और वह भी जीत गए। कांग्रेस के प्रणव झा को 21 वोट मिले और वह हार गए। एक वोट अमान्य भी पाया गया।
क्रॉस वोटिंग ने बिगाड़ा कांग्रेस का खेल
एनडीए के पास कुल 24 विधायक हैं, जो 28 वोटों से कम हैं। फिर भी परिमल नाथवानी जीत गए। इससे साफ़ है कि कुछ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि उसके सहयोगी दलों आरजेडी के 4 विधायकों और सीपीआई (ML) लिबरेशन के 2 विधायकों ने उसके उम्मीदवार प्रणव झा को वोट नहीं दिया और एनडीए उम्मीदवार को समर्थन दिया। कांग्रेस ने इसे गठबंधन के साथ धोखा बताया और बीजेपी पर हॉर्स ट्रेडिंग का आरोप लगाया।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार कांग्रेस के झारखंड प्रभारी के. राजू ने कहा कि आरजेडी और सीपीआई (ML) ने गठबंधन को धोखा दिया। सीपीआई (ML) लिबरेशन ने इन आरोपों से इनकार किया। पार्टी के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि उनके दोनों विधायकों ने कांग्रेस उम्मीदवार को ही वोट दिया, जैसा तय हुआ था। आरजेडी ने भी कहा कि बिना आधिकारिक जानकारी के कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है।
आरोप को खारिज करते हुए सीपीआई (ML) लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने एक्स पर पोस्ट किया, 'झारखंड राज्यसभा वोटिंग को लेकर लगाई जा रही अटकलों के बारे में हम पूरी ज़िम्मेदारी के साथ कह सकते हैं कि हमारे दो विधायकों ने योजना के मुताबिक कांग्रेस उम्मीदवार को वोट दिया। हमारे दो वरिष्ठ नेताओं, पीबीएम हलधर महतो और सीसीएम गीता मंडल ने सीपीआई (ML) विधायकों द्वारा डाले गए वोटों की विधिवत पुष्टि की है।'
बाड़ेबंदी काम न आई
झारखंड में राज्यसभा सांसदों के लिए वोटिंग से पहले इंडिया गठबंधन और एनडीए दोनों ने क्रॉस वोटिंग से बचाने के लिए अपने-अपने विधायकों की बाड़ेबंदी की थी। एनडीए ने जहाँ अपने विधायकों ने होटल में शिफ्ट किया था, वहीं इंडिया गठबंधन के भी सभी विधायकों की बैठक झारखंड सीएम हेमंत सोरेन के आवास पर हुई थी। ऐसी तैयारी इसलिए थी क्योंकि हर वोट बहुत कीमती था। यह डर था कि यदि इंडिया गठबंधन के एक भी विधायक ने क्रॉस वोटिंग की तो इसके दूसरे उम्मीदवार का जीतना मुश्किल हो जाएगा। और गुरुवार को वोटिंग में भी वैसा ही कुछ हो भी गया।कौन हैं परिमल नाथवानी?
परिमल नाथवानी रिलायंस इंडस्ट्रीज के कॉर्पोरेट अफेयर्स डायरेक्टर हैं। गुजरात से ताल्लुक रखने वाले नाथवानी पहले दो बार (2008-2020) झारखंड से निर्दलीय सांसद रह चुके हैं। इसके बाद वे आंध्र प्रदेश से वाईएसआरसीपी के टिकट पर राज्यसभा सदस्य बने। अब चौथी बार राज्यसभा पहुंचे हैं।
नाथवानी झारखंड को अपनी कर्मभूमि मानते हैं। जीत के बाद उन्होंने एक्स पर लिखा, 'यह पल बहुत भावुक करने वाला है। यह झारखंड से मेरा तीसरा कार्यकाल होगा, जहां से मेरी संसदीय यात्रा 2008 में शुरू हुई थी। झारखंड की जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पूरी निष्ठा से काम करता रहूंगा। जोहार झारखंड!' उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी नेताओं और सभी विधायकों का धन्यवाद किया जिन्होंने उन्हें समर्थन दिया।
पहले INDIA गठबंधन की स्थिति मजबूत थी
झारखंड में जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन के पास 56 विधायक थे। बिना क्रॉस वोटिंग के दोनों सीटें आसानी से उनके पास आ जातीं। लेकिन क्रॉस वोटिंग ने नतीजे पलट दिए। यह चुनाव इंडिया गठबंधन के लिए झटका माना जा रहा है, क्योंकि छोटे सहयोगी दलों से वोट न मिलने के आरोप लगे हैं।
एनडीए को अपनी ताकत से कम वोटों में भी सीट मिल गई। कांग्रेस को अपने गठबंधन पर सवाल उठाने का मौका मिला है। परिमल नाथवानी जैसे निर्दलीय उम्मीदवार का जीतना दिखाता है कि झारखंड में पार्टियों के बीच क्रॉस वोटिंग और व्यक्तिगत संबंधों की भी बड़ी भूमिका है। यह चुनाव झारखंड की राजनीति में गठबंधन की विश्वसनीयता और भविष्य की रणनीति पर नए सवाल खड़े करता है।