कर्नाटक में सिद्धारमैया के इस्तीफे के बाद डीके शिवकुमार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, लेकिन कांग्रेस में आंतरिक कलह थमी नहीं है। सिद्धारमैया अभी से राज्य विधानसभा और लोकसभा चुनाव की बातें इशारों में कर रहे हैं।
सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने दिल्ली के निर्देश पर इस्तीफ़ा देकर डी के शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ़ कर दिया. लेकिन पार्टी के अंदर का विवाद अभी अंतिम रूप से सुलझता दिखाई नहीं दे रहा है। दिल्ली नेतृत्व चाहता था कि सिद्धरमैया राज्य सभा में आ जाएं ताकि राज्य की राजनीति से उनकी थोड़ी दूरी बन जाय। लेकिन इस्तीफ़ा देने के बाद सिद्धारमैया ने साफ़ कहा “कांग्रेस हाईकमान ने मुझे राज्यसभा जाने को कहा था। लेकिन मैंने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया। मैं राष्ट्रीय राजनीति में नहीं जाना चाहता। मैं राज्य राजनीति में ही सक्रिय रहना चाहता हूँ और अगले दो साल एमएलए के रूप में काम करूँगा”।यह बयान शिवकुमार के लिए चुनौती माना जा रहा है।
- कर्नाटक में कांग्रेस विधायक दल (सीएलपी) ने शनिवार को डीके शिवकुमार को अपना नेता चुना, जो कर्नाटक के अगले मुख्यमंत्री के रूप में उनकी नियुक्ति से पहले की संवैधानिक औपचारिकता है। पूर्व सीएम सिद्धारमैया ने डीके शिवकुमार के नाम का प्रस्ताव किया, जिसे आमराय से पास कर दिया गया।
सिद्धारमैया पिछड़े वर्ग के कुरबा जाति से हैं और कर्नाटक की राजनीति में वो “अहिंदा” गठबंधन के नेता माने जाते हैं।यहाँ अ- अल्पसंख्यक, हिं- हिंदू लीदवरू (पिछड़ी जातियां ) और द- दलित जातियों के लिए प्रयोग किया जाता है। 2023 में कांग्रेस की जीत में इस गठबंधन की अहम भूमिका थी। दूसरी तरफ़ शिवकुमार वोक्कालिंगा समुदाय से हैं जो एक समृद्ध जाति मानी जाती है।इस फेरबदल का असर 2028 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनावों पर पड़ सकता है। अब ये बात खुलती जा रही है कि सिद्धारमैया राज्य में पार्टी का अध्यक्ष बनना चाहते हैं ताकि पार्टी में उनका वर्चस्व बना रहे। सिद्धारमैया को दर किनार करना कांग्रेस के लिए आसान नहीं है।
लोकसभा में कांग्रेस के नेता राहुल गांधी और पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए सिद्धारमैया को मनाना एक बड़ी चुनौती है। खड़गे कर्नाटक से हैं। दलित जातियों पर उनका असर है लेकिन पिछड़ी जातीयों के सर्वमान्य नेता सिद्धारमैया ही हैं। कांग्रेस पिछड़ों के वोट बैंक में बी जे पी को घुसने का मौका नहीं दे सकती है। बीच में चर्चा थी कि सिद्धारमैया और शिवकुमार के विवाद को खत्म करने के लिए खड़गे को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता है। लेकिन खड़गे ने राज्य की राजनीति में वापस जाने से इनकार कर दिया। फिलहाल वो राज्य की राजनीति में अपने बेटे प्रियांक खड़गे को जमाना चाहते हैं। सिद्धारमैया सरकार में प्रियांक मंत्री थे।
जातियों का गणित
कर्नाटक की राजनीति मुख्यतः तीन जाति समूहों के इर्द गिर्द घूमती है। लिंगायत (वीरशैव ) और वोक्कालिगा राजनीतिक रूप से सबसे प्रभावशाली हैं, हालांकि उनकी आबादी राज्य की कुल आबादी का लगभग 20 से 25 % के बीच ही है।लिंगायत उत्तर और मध्य कर्नाटक में मजबूत हैं । इन्हें बीजेपी का मुख्य वोट बैंक माना जाता है। इनकी आबादी 11 % के आसपास मानी जाती है लेकिन इनके नेता 17 % होने का दावा करते है।वोक्कालिगा दक्षिण कर्नाटक , पुराना मैसूर क्षेत्र में मजबूत हैं। इन पर जेडी एस और कांग्रेस दोनों का प्रभाव है। अनुमानित आबादी करीब 14% है।
तीसरा समूह पिछड़ी यानी ओबीसी जातियों की है जिसके नेता सिद्धारमैया हैं। उन्होंने एससी , एसटी और मुस्लिम को मिलकर अहिन्दा गठबंधन को मजबूत किया। कांग्रेस की मुख्य ताक़त अहिन्दा ही माने जाते हैं। लेकिन साधन संपन्न होने के कारण विधान सभा में ज्यादा विधायक लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय से चुनें जाते हैं। इसलिए इन समुदायों को आसानी से मुख्यमंत्री बनने का मौक़ा मिल जाता हैं। दोनों समुदाय जाति जनगणना का विरोध करते हैं।इसके बावजूद सिद्धारमैया ने दो बार जाति जनगणना करवाने की हिम्मत दिखायी। पहली बार 2015 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान। उसकी रिपोर्ट 2024 में आयी लेकिन लिंगायत और वोक्कालिगा नेताओं के विरोध के चलते इसे लागू नहीं किया गया।
सिद्धारमैया ने 2025 में दोबारा सर्वे कराया। नयी रिपोर्ट अभी पूरी तरह से सार्वजनिक नहीं की गयी है। लेकिन समाचार पत्रों के अनुसार इस सर्वे के हिसाब से ओबीसी लगभग 50%, इनमे सिद्धारमैया की जाति कुरुबा करीब 7 % ही है लेकिन उन्होंने जो अहिंदा गठबंधन बनाया है उसमे अनुसूचित जाति (एससी), 18%, मुस्लिम 13, और एसटी 7% है।सिद्धारमैया सरकार ने ओबीसी आरक्षण 32% से बढ़ाकर 51% करने की सिफारिश की है। यह उसकी एक बड़ी चाल है जिसका असर आने वाले चुनावों पर पड़ सकता है।
सुलह सफ़ाई
दक्षिण में कर्नाटक अकेला राज्य है जहां कांग्रेस का सीधा मुकाबला बी जे पी से है। कर्नाटक में बी जे पी के चार मुख्यमंत्री रह चुके है। 2018 से 2023 तक बी जे पी के लिंगायत नेता बी एस यदुरप्पा और बाद में बसवराज बोम्मई मुख्यमंत्री थे। यदुरप्पा को हटाने के बाद बी जे पी कमजोर पड़ गयी है।लेकिन लिंगायत अभी भी बी जे पी की तरफ़ झुके हुए हैं। कांग्रेस छोड़कर बी जे पी में शामिल हुए बसवराज बोम्मई भी लिंगायत हैं। सिद्धारमैया 2013 से 2018 तक मुख्यमंत्री थे। यदुरप्पा के नेतृत्व में बी जे पी ने 2018 में कांग्रेस को हरा दिया। लेकिन यदुरप्पा को हटा कर बसवराज बोम्मई के नेतृत्व में बी जे पी 2023 का चुनाव नहीं जीत पायी।
2023 के चुनाव में शिवकुमार भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में उभरे। उन्हें कांग्रेस हाई कमान खासकर राहुल गांधी का सबसे प्रिय माना जाता था। सिद्धारमैया मुख्यमंत्री पद के लिए अड़ गए तब एक फार्मुला निकाला गया कि दोनों ढाई ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री बनेंगे। नवंबर 2025 में सिद्धारमैया का ढाई साल पूरा हो गया। लेकिन वो मुख्य मंत्री बने रहने पर अड़े रहे। केरल के चुनावों के कारण कांग्रेस हाई कमान ने कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन को टाल दिया। सिद्धारमैया ने नेतृत्व परिवर्तन को अब भी मन से स्वीकार नहीं किया है।
ताक में बी जे पी
कर्नाटक में बीजेपी पहली बार सत्ता में नवंबर 2007 में आई, और मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा बने। पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा के बेटे कुमारस्वामी की पार्टी जे डी एस से गठबंधन करके बीजेपी ने सरकार तो बना ली लेकिन ये सरकार सिर्फ 7 दिनों में गिर गयी। 2008 के चुनाव मे में बीजेपी ने अकेले बहुमत हासिल किया और येदियुरप्पा फिर मुख्यमंत्री बने। यह दक्षिण भारत में बीजेपी की पहली सरकार थी।येदियुरप्पा बाद में भी कई बार मुख्यमंत्री का पद संभाला। यदियुरप्पा के बाद बी जे पी हाशिए पर पहुंच गयी। उसका एक बड़ा कारण ये है कि बी जे पी वोक्कालिंगा, पिछड़ा और दलित वर्ग में पैठ नहीं बना सकी। इसलिए कई बार चर्चा चली कि बी जे पी शिवकुमार को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है।
अब चर्चा है कि बी जे पी सिद्धारमैया पर डोरे डाल सकती है। सिद्धारमैया ख़ुद 79 वर्ष के हो चुके हैं। लेकिन अब अपने बेटे यतीन्द्र को मजबूत करना चाहते हैं। उनके कई समर्थक उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे थे। बी जे पी का जे डी एस के साथ गठबंधन है। और इसके नेता कुमारस्वामी केंद्र में मंत्री हैं। ख़ुद पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा राज्यसभा के सदस्य है। उनका कार्यकाल जून में खत्म हो रहा है। जे डी एस से गठबंधन का बी जे पी को कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ। वी वोक्कालिंगा वोट बी जे पी को ट्रांफ़स्फ़र नहीं कर पाए। उनके परिवार के कई सदस्यों का नाम सेक्स स्कैंडल में आने के बाद उनकी लोकप्रियता भी कम हो गयी है।
बहरहाल सिद्धरमैया को संतुष्ट करने के लिए कांग्रेस के पास कई विकल्प हैं। वो राज्यसभा में आ जायें तो उन्हें राज्यसभा में पार्टी के नेता का पद दिया जा सकता है। उनके बेटे यतीन्द्र को राज्य में मंत्री और महत्वपूर्ण विभाग मिल सकता है। आख़िरी विकल्प के रूप में उन्हें राज्य में पार्टी का अध्यक्ष बनाया जा सकता है।