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लोकसभा में जीत के बाद निकाय चुनाव में क्यों पिटी बीजेपी?

लोकसभा चुनाव 2019 में कर्नाटक में बंपर जीत के बाद राज्य में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) बुरी तरह से पिट गई है। सामान्यतया यह माना जाता है कि निकाय के चुनाव परिणाम विधानसभा या लोकसभा चुनाव के परिणामों की झलक देते हैं। लेकिन महज एक हफ़्ते पहले आए कर्नाटक लोकसभा चुनाव के नतीजों में लगभग क्लीन स्वीप करने वाली बीजेपी स्थानीय निकाय के चुनावों में बुरी तरह पिट गई है।
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कर्नाटक की कहानी अलग ही राग गा रही है। 23 मई को आए चुनाव परिणाम में बीजेपी को राज्य की 28 में से 25 लोकसभा सीटों पर जीत मिली और राज्य में सत्तासीन कांग्रेस और जेडीएस की दुर्गति हो गई। कांग्रेस और जेडीएस को 1-1 सीट मिली, जबकि एक सीट निर्दलीय प्रत्याशी के खाते में गई।

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस-जेडीएस ने गठजोड़ बनाकर बीजेपी का मुक़ाबला किया था। बीजेपी को 51.4 प्रतिशत मत के साथ कुल 18,053,454 वोट मिले। वहीं कांग्रेस को 31.88 प्रतिशत मत के साथ कुल 11,203,016 और जेडीएस को 9.7 प्रतिशत मत के साथ कुल 3,397,229 वोट मिले।

इस चुनाव परिणाम के महज 8 दिन बाद कर्नाटक के स्थानीय निकाय चुनाव के परिणाम आए हैं। राज्य की 7 सिटी म्युनिसिपल काउंसिल के परिणामों के मुताबिक़, कुल 217 सीटों में से बीजेपी को 56, कांग्रेस को 90, जेडीएस को 38, बीएसपी को 2, एनसीपी को 0, सीपीआई को 0, सीपीआईएम को 0, निर्दलीय को 25, अन्य को 6 सीटें मिली हैं।
30 टाउन म्युनिसिपल काउंसिल के चुनाव में कुल 714 सीटों में से बीजेपी को 184, कांग्रेस को 322, जेडीएस को 102, बीएसपी को 1, एनसीपी को 0, सीपीआई को 0, सीपीआईएम को 2, निर्दल को 102, अन्य को 2 सीटें मिली हैं।
राज्य के 19 टाउन पंचायतों के चुनाव में कुल 290 सीटों में से बीजेपी को 126, कांग्रेस को 97, जेडीएस को 34, बीएसपी को 0, एनसीपी को 0, सीपीआई को 0, सीपीआईएम को 0, निर्दल को 33, अन्य को 0 सीटें मिली हैं। इस तरह स्थानीय निकाय चुनाव की कुल 1221 सीटों में कांग्रेस को 509, बीजेपी को 366, और जेडीएस को 174 सीटें मिली हैं।

स्थानीय निकाय चुनाव के परिणाम से संदेह पैदा होता है। महज 8 दिन पहले राज्य में बीजेपी की आंधी थी। लेकिन निकाय चुनाव में ऐसा क्या हुआ कि वह कांग्रेस से बहुत पीछे हो गई।
इसे सामान्य पैटर्न नहीं कहा जा सकता है। 23 मई को लोकसभा चुनाव के साथ ही अरुणाचल प्रदेश और ओडिशा में विधानसभा चुनाव भी हुए थे। ओडिशा में लोकसभा व विधानसभा चुनाव के लिए अगल-बगल रखी ईवीएम में लाखों लोगों ने, नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने और नवीन पटनायक को मुख्यमंत्री बनाने के लिए वोट डाला है। जबकि सामान्यतया लोग विधानसभा और लोकसभा चुनाव में एक ही दल के प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करते हैं। 
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भारत में दलीय निष्ठा इतनी जबरदस्त है कि किसी दल का टिकट पाने के बाद प्रत्याशी चाहे जेल में बंद हो, चाहे भगोड़ा हो, वह चुनाव जीत जाता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब जेल में बंद प्रत्याशियों ने बग़ैर किसी ख़ास प्रचार के अच्छे अंतर से जीत हासिल की है। इसकी वजह यह है कि प्रत्याशी के व्यक्तिगत समर्थक और दल के निष्ठावान मतदाताओं के वोट उन्हें मिल ही जाते हैं।लेकिन कर्नाटक चुनाव के परिणाम अलग कहानी बयां कर रहे हैं। अगर चुनाव आयोग के आंकड़ों को देखें तो मतदाता दलीय निष्ठा भुला चुके हैं। जिन मतदाताओं ने 8 दिन पहले बीजेपी को प्रचंड बहुमत दिया था, उन्हीं मतदाताओं ने निकाय चुनाव में बीजेपी को पटक दिया है।

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