वीडी सतीशन के नाम का ऐलान होते ही केरल में खुशी का माहौल दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो वायरल हैं, जिनमें लोग समूहों में सड़कों पर आकर खुशी का इज़हार कर रहे हैं। सतीशन केरल हाईकोर्ट में वकील थे, जब 2001 में वे एर्नाकुलम जिले के उत्तर परवूर से केरल विधानसभा के लिए चुने गए। वे स्कूल के दिनों से ही छात्र राजनीति में सक्रिय थे। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की युवा शाखा, केरल छात्र संघ (एमएसयू) के अध्यक्ष बने। वे बाद में एनएसयूआई के सचिव बने। उनकी ख्याति एक सक्रिय ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता के रूप में ज्यादा है। वे कोचीन के औद्योगिक क्षेत्र में फैले एक दर्जन ट्रेड यूनियनों के अध्यक्ष हैं। ट्रेड यूनियन की सक्रियता ने उन्हें केरल में कांग्रेस का संगठन खड़ा करने में मदद की।
कांग्रेस ने जब दो पर्यवेक्षकों मुकुल वासनिक और अजय माकन को विधायकों की राय जानने केरल भेजा तो यह माना गया कि पलड़ा कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल के पक्ष में झुकेगा, क्योंकि वो नेता विपक्ष राहुल गांधी के करीबी लोगों में हैं। लेकिन दोनों पर्यवेक्षकों से केरल के सीनियर कांग्रेस नेताओं ने मिलकर कहा कि वीडी सतीशन को सीएम बनाना उचित होगा। पर्यवेक्षकों ने क्या रिपोर्ट दी, यह मालूम नहीं। लेकिन मीडिया में ये खबरें जोरशोर से आईं कि वेणुगोपाल संभावित सीएम हैं। लेकिन पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के बाद सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी ने केरल के पूर्व प्रदेश अध्यक्षों, सीनियर नेताओं को दिल्ली बुलाकर उनकी राय जानी। इसके बाद राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की बैठक हुई, जिसमें तमाम तरफ से मिले संकेतों के आधार पर वीडी सतीशन के नाम पर मुहर लगा दी गई। 
वी.डी. सतीशन का जन्म मई 1964 में एर्नाकुलम जिले के नेट्टूर में हुआ। वे इस महीने 62 साल के हो जाएंगे। छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे। पनंगड़ हाई स्कूल और फिर थेवारा के सैक्रेड हार्ट कॉलेज में छात्र राजनीति के जरिए उभरे। एमजी यूनिवर्सिटी यूनियन के चेयरमैन भी बने।
कानून की डिग्री लेने के बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कानून की प्रैक्टिस का सपना देखा, लेकिन राजनीति ने उन्हें वापस खींच लिया। केरल एनएसयूआई और यूथ कांग्रेस की राजनीति में उन्हें समय के साथ महत्वपूर्ण पद तो नहीं मिले लेकिन वो यूथ राजनीति में आगे बढ़ते रहे।
1996 में उन्हें वामपंथियों के गढ़ पारावूर (Paravur) में में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में उतारा। सतीशन महज 1,116 वोटों से हार गए। लेकिन हार के बाद पांच साल तक लगातार क्षेत्र में काम किया। स्थानीय कार्यक्रम उनसे छूटते नहीं थे। यूडीएफ कार्यकर्ताओं व स्थानीय लोगों से गहरे संबंध बनाए। अगले ही चुनाव में उन्हें सफलता मिली। 2001 में उन्होंने पारावूर से जीत हासिल की और तब से लगातार इस सीट पर कब्जा बनाए हुए हैं। 2006 में वी.एस. अच्युतानंदन के लेफ्ट वेव के बावजूद उन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी और मार्जिन बढ़ाया।

विपक्षी नेता के रूप में उभरे

सतीशन विधानसभा के सबसे तेजतर्रार डिबेटर के रूप में जाने जाते हैं। नीति संबंधी मुद्दों पर पकड़ और मंत्रियों को चुनौती देने की क्षमता ने उन्हें विपक्ष का मजबूत चेहरा बनाया। थॉमस इसहाक जैसे सीपीएम नेता और मंत्रियों के साथ लॉटरी विवाद जैसे मुद्दों पर उनकी बहस ने उनकी छवि को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत किया।
2011 में ओम्मन चांडी सरकार में उन्हें मंत्री पद मिलने की उम्मीद थी, लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया। उन्होंने स्वीकार किया कि यह उनके लिए बहुत दर्द भरा था। इसके बावजूद पर्यावरण, आदिवासी भूमि संघर्ष और शासन की खामियों पर उन्होंने स्वतंत्र रुख अपनाया, भले ही उनकी अपनी पार्टी सत्ता में थी। वो अपने ही मंत्रियों की आलोचना से पीछे नहीं हटे।
2016 में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ की जबरदस्त हार के बाद भी उन्होंने पारावूर से 20,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत दर्ज की। 2021 में उन्हें विपक्ष का नेता बनाया गया, जब यूडीएफ लगातार हार का सामना कर रहा था। सतीशन ने यूडीएफ को जिन्दा किया- उपचुनावों, लोकसभा और स्थानीय निकाय चुनावों में कांग्रेस को जीत दिलाई।
2026 के केरल विधानसभा चुनाव में उन्होंने अकेले कांग्रेस नेता के रूप में यूडीएफ के लिए 100+ सीटें और वाम मोर्चा के लगभग एक दर्जन मंत्रियों की हार की भविष्यवाणी की थी, जो सही साबित हुई।

चुनाव में सतीशन की रणनीति क्या थी

डेटा, संगठन और नैरेटिव के बल पर सतीशन ने चुनाव प्रबंधन का एक अनोखा मॉडल अपनाया। जिसमें डेटा अनुशासन, संगठनात्मक ताकत और नैरेटिव क्राफ्ट का मिश्रण था। 
बूथ स्तर पर मजबूती: बूथ कमेटियों को मजबूत किया, पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए वोटर लिस्टिंग आसान बनाई और आंतरिक विवादों को समय रहते सुलझाया।
गठबंधन राजनीति: ‘टीम यूडीएफ’ बनाकर कांग्रेस, IUML और अन्य सहयोगियों को एकजुट किया। सहयोगियों का समर्थन उनके CM पद तक पहुंचने में अहम रहा।
नई कांग्रेस छवि: खुद को सुनने वाले नेता के रूप में पेश किया, कांग्रेस को ‘नेहरूवियन लेफ्ट’ बताया। युवा नेताओं को जगह दी, जिनमें कई एनफ्लुएंसर भी हैं। Gen Z और Gen Alpha की भाषा अपनाकर युवा मतदाताओं को आकर्षित किया।
साहसिक फैसले: सतीशन ने चुनाव के दौरान कहा था कि अगर यूडीएफ इस बार निर्णायक बहुमत नहीं ला पाया तो वे सक्रिय राजनीति से दूर हो जाएंगे। उन्होंने राज्य में आरएसएस-बीजेपी की सांप्रदायिक विभाजनकारी नैरेटिव का खुलकर विरोध किया और वोट-बैंक पॉलिटिक्स की आलोचना की।
अतीत में जिस शख्स को कांग्रेस पार्टी के संगठन में पदों से वंचित रखा गया। उसी शख्स को अब केरल का मुख्यमंत्री चुना गया है। कांग्रेस की यह पहल हर तरह से केरल में प्रशंसनीय मानी जा रही है। अगर यह प्रयोग कांग्रेस अन्य राज्यों में करती हैं तो इसके अच्छे नतीजे आ सकते हैं। कांग्रेस पार्टी में कार्यकर्ताओं का दौर लौट सकता है। जब जिला कांग्रेस कमेटियां टिकट तय करने की हैसियत रखती थीं। आलाकमान जिला कमेटियों के सुझावों को ही महत्व देता था।