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राजद्रोह के क़ानून का सबसे ज़्यादा दुरुपयोग, जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में कथित रूप से राजद्रोह के नारे लगने से पहले शायद ही किसी ने इस बारे में सुना होगा। लेकिन इस मामले में जेनएयू के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके साथियों के ख़िलाफ़ राजद्रोह का मुक़दमा दर्ज होने के बाद तो ऐसी कई ख़बरें आईं कि किसी राज्य में व्यवस्था या सत्ता के ख़िलाफ़ आवाज उठा रहे व्यक्ति पर राजद्रोह का क़ानून लगा दिया गया या उन्हें इसका डर दिखाया गया। क़ानून का रत्ती भर भी ज्ञान न रखने वालों ने इसे देशद्रोह कहा और हर उस शख़्स को देशद्रोही बताना शुरू कर दिया जो उनकी राय से इत्तेफ़ाक न रखता हो। 
पिछले कुछ सालों से देशद्रोह या राजद्रोह के क़ानून के दुरुपयोग को लेकर सामाजिक चिंतक, लेखक और आम लोग चिंता जताते रहे हैं। लेकिन अब यह बात कही है सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता ने। क़ानून संबंधी ख़बरें देने वाली वेबसाइट लाइव लॉ डॉट इन के मुताबिक़, जस्टिस गुप्ता ने एक कार्यक्रम में कहा, ‘पिछले कुछ सालों में जिस तरह राजद्रोह से संबंधित धारा 124ए का दुरुपयोग हुआ है उससे यह सवाल खड़ा होता है कि क्या हमें इसके बारे में फिर से विचार करने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि सरकार की आलोचना करने से कोई भी व्यक्ति कम देशभक्त नहीं हो जाता। जबकि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, देशविरोधी नारे लगाना राजद्रोह नहीं है। 
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जस्टिस गुप्ता ने कहा, ‘पिछले कुछ सालों में कई ऐसे मामले हुए हैं, जहाँ राजद्रोह या सौहार्द्र बिगाड़ने के क़ानून का पुलिस ने जमकर दुरुपयोग किया है और उन लोगों को गिरफ़्तार करने और अपमानित करने के लिए इनका इस्तेमाल किया है जिन्होंने राजद्रोह के तहत कोई अपराध नहीं किया है।’ 

उन्होंने कहा कि संवैधानिक अधिकार होने के नाते अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की राजद्रोह के क़ानून से ज़्यादा अहमियत होनी चाहिए। जस्टिस गुप्ता अहमदाबाद में प्रेलेन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा आयोजित एक कार्यशाला में ‘लॉ ऑफ़ सेडिशन इन इंडिया एंड फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन’ विषय पर वकीलों को संबोधित कर रहे थे। 

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124 (ए) के तहत उन लोगों को गिरफ़्तार किया जाता है जिन पर देश की एकता और अखंडता को नुक़सान पहुंचाने का आरोप होता है। यह क़ानून ब्रिटिश सरकार ने 1860 में बनाया था और 1870 में इसे आईपीसी में शामिल कर दिया गया था।

न्यायमूर्ति गुप्ता ने अपने भाषण में निराशा के भाव के साथ कहा, ‘बातचीत करने की कला ख़ुद ही ख़त्म हो रही है, अब कोई स्वस्थ चर्चा नहीं होती, कोई भी मुद्दों और सिद्धांतों की वकालत नहीं करता और केवल चिल्लाना और गाली-गलौच ही होती है।’ 

जस्टिस गुप्ता ने भी वही बात कही जिसे सत्ता के ख़िलाफ़ बोलने वाला हर शख़्स महसूस करता है। जस्टिस गुप्ता ने कहा, ‘दुर्भाग्य से यह आम बात है कि अगर आप मुझसे सहमत नहीं हैं तो या तो आप मेरे दुश्मन हैं और या इससे भी बद्तर आप देश के दुश्मन हैं, देशद्रोही हैं।’ 

न्यायमूर्ति ने कहा, ‘असहमति का अधिकार हमारे संविधान के द्वारा हमें दिया गया सबसे अहम अधिकार है। जब तक कोई व्यक्ति क़ानून नहीं तोड़ता है या किसी संघर्ष को बढ़ावा नहीं देता है या नहीं उकसाता है तब तक उसे हर दूसरे नागरिक से अपनी राय अलग रखने का अधिकार है।’ 

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सोशल मीडिया पर ट्रोल होने का डर!

न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा, ‘लोकतंत्र का सबसे अहम पहलू यह है कि लोगों को सरकार का कोई डर नहीं होना चाहिए। उन्हें ऐसे विचार रखने में कोई डर नहीं होना चाहिए जो सत्ता में बैठे लोगों को पसंद नहीं हों। दुनिया रहने के लिए बहुत ख़ूबसूरत होगी अगर लोग बिना डर के अपनी बात रख सकेंगे और उन्हें इस बात का डर नहीं होगा कि उन पर मुक़दमा चलाया जायेगा या उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जायेगा।’ 

न्यायमूर्ति गुप्ता ने बताया कि राजद्रोह का क़ानून भारत में ब्रिटिश शासन में लाया गया था और इसका मक़सद यह था कि बाग़ियों की आवाज़ को चुप करा दिया जाए। 

जेएनयू के बाद एएमयू!

आपको याद दिला दें कि इस साल फ़रवरी में अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के 14 छात्रों पर देशद्रोह का मुक़दमा दर्ज किया गया था। उन पर यह आरोप था कि उन्होंने 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' के नारे  लगाए हैं, हालाँकि आरोप लगाने वालों ने इसका कोई सबूत नहीं पेश किया था। जिन छात्रों पर यह आरोप लगाया गया था, उन्होंने इस तरह के नारे लगाने से पूरी तरह इनकार किया था लेकिन फिर भी उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज कर लिया गया था। 

न्यायमूर्ति गुप्ता ने कहा कि अगर आप हिंसा के लिए नहीं उकसाते हैं और केवल आलोचना करते हैं, तो इससे राजद्रोह नहीं होता। न्यायमूर्ति गुप्ता ने इस मौक़े पर महात्मा गाँधी के भी विचारों को रखा। महात्मा गाँधी ने कहा था, ‘प्रेम या स्नेह क़ानून के द्वारा न पैदा किया जा सकता है और न ही इसे नियंत्रित किया जा सकता है। यदि किसी को किसी व्यक्ति या किसी व्यवस्था से स्नेह नहीं है तो उसे इसे बात को कहने की या प्रकट करने की पूरी आज़ादी होनी चाहिए, तब तक जब तक इससे हिंसा को उकसावा नहीं मिलता है।’

मेरे लिए यह बहुत ही चौंकाने वाली बात है कि आज़ाद भारत में हमें राजद्रोह के संबंध में बने प्रावधानों को और भी सख़्त करना चाहिए और लोगों की आवाज पर अंकुश लगाना चाहिए।


जस्टिस दीपक गुप्ता

जस्टिस गुप्ता की इन बातों को पढ़ने या सुनने के बाद सवाल यह खड़ा होता है कि भारत में अंग्रेज़ी राज के ख़िलाफ़ होने वाले किसी तरह के विद्रोह को कुचलने के लिए बनाया गये इस क़ानून का क्या आज भी अंग्रेजी हूकूमत की तरह दुरुपयोग नहीं किया जा रहा है?

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सर्वोच्च अदालत ने बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य के मामले में कहा था कि सिर्फ़ नारे लगाना देशद्रोह नहीं है क्योंकि समुदाय के दूसरे लोगों ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य के मामले में दिए निर्णय में कहा था, यदि किसी की मंशा हिंसा भड़काना नहीं हो तो चाहे उसके शब्द कितने भी कठोर हों, उस पर देशद्रोह का मामला नहीं बनता है।

लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में वादा किया था कि सत्ता में आने पर वह राजद्रोह से संबंधित धारा 124 ए को समाप्त कर देगी, तब बीजेपी ने इसे देश के लिए बेहद ‘ख़तरनाक’ बताया था।

अब सवाल यही उठता है कि क्या इस बात पर विचार करना चाहिए कि राजद्रोह को फिर से परिभाषित किया जाए। इस पर भी विचार होना चाहिए कि धारा 124ए का दुरुपयोग न हो, इसके लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं? आज के माहौल में जब लोगों को सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने में डर लगता है तो देश के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश की कही ये बातें बेहद अहम हो जाती हैं।

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