नारीवादी हिंदी कविता साहित्य में अनामिका अनु की कविताएँ स्त्रीत्व, घरेलू जीवन, विज्ञान और भाषा के नए रूपकों के माध्यम से जीवन के रहस्यों को उजागर करती हैं। त्रिभुवन समालोचना में लिखते हैं- ये कविताएँ स्त्री होकर संसार को पढ़ती हैं।
कविता सचमुच कविता है तो वह भावनाओं की डायरी नहीं होती; मन की वह प्रयोगशाला होती है, जहाँ अनुभूति, स्मृति, देह, भाषा और विचार पाँच अलग-अलग रासायनिक तत्वों की तरह एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं और अंततः कोई ऐसा पदार्थ बनाते हैं, जिसका नाम पहले से किसी शब्दकोश में नहीं होता। अनामिका अनु की कविताएँ इसी अप्रस्तुत पदार्थ की कविताएँ हैं। वे जीवन को सीधे बयान नहीं करतीं; वे जीवन की उस भाप को पकड़ती हैं जो घटना के बाद उठती है, देर तक अदृश्य रहती है, फिर किसी शब्द की ठंडी सतह पर ओस बनकर जमा हो जाती है।
उनकी कविता में स्त्री कोई विषय नहीं है; वह देखने की विधि है। यह बात बहुत निर्णायक है। बहुत-सी कविताएँ स्त्री के बारे में लिखी जाती हैं; लेकिन अनामिका अनु की कविताएँ स्त्री होकर संसार को पढ़ती हैं। यहाँ स्त्रीत्व किसी नारे का वस्त्र नहीं पहनता, न करुणा की प्रदर्शनी बनता है। वह भाषा के भीतर अपने लिए जगह बनाता है। धीरे, संयत, कभी काँपते हुए, कभी असाधारण स्पष्टता के साथ। वह यह नहीं कहता कि मुझे देखो; वह कहता है कि संसार को मेरे देखने के ढंग से देखो। यही वह क्षण है, जहाँ कविता सामाजिक वक्तव्य से आगे बढ़कर चेतना की घटना बन जाती है।
कविता ऐसी बौद्धिक, आत्मिक और आधिभौतिक क्रिया है, जिसमें भाव अपने आप पर्याप्त नहीं होता; उसे रूप चाहिए, अनुशासन चाहिए, लय चाहिए और सबसे बढ़कर वह रहस्यमय संयम चाहिए, जो शब्द को उसके अर्थ से अधिक चमकने देता है। अनामिका अनु की कविताओं में यह प्रक्रिया अनेक बार दिखाई देती है। वे सीधे दु:ख नहीं लिखतीं; दु:ख के आसपास रखी वस्तुएँ लिखती हैं। वे सीधे प्रेम नहीं लिखतीं; प्रेम के कारण बदलती हुई हवा, बदलती हुई त्वचा, बदलती हुई चुप्पी लिखती हैं। वे सीधे प्रतिरोध नहीं लिखतीं; उस क्षण को लिखती हैं, जब एक स्त्री अपनी देह के बारे में बोलने से पहले सदियों की धूल झाड़ती है।
इसलिए इन कविताओं का केंद्रीय रहस्य उनका कथ्य नहीं, उनका रूपांतरण है। रसोई की वस्तु विज्ञान में बदल सकती है, देह भूगोल में, अनुपस्थिति वास्तु में, प्रेम ध्वनि में और स्मृति एक ऐसी सीढ़ी में जिस पर चढ़ते हुए पाठक को पता ही नहीं चलता कि वह अपने भीतर उतर रहा है। यही उनकी काव्यात्मक चाल है। वे चीज़ों को उनके रोज़मर्रा के नामों से मुक्त करती हैं। वस्तु वही रहती है, पर उसकी आत्मा बदल जाती है। यही कविता का असली कार्य है वस्तु की नागरिकता बदल देना।
अनामिका अनु की भाषा में घरेलूपन है; लेकिन वह घरेलूपन सीमित नहीं करता; वह ब्रह्मांड की ओर खुलता है। यह विशेष बात है। हिन्दी कविता में घर को अक्सर या तो स्मृति का सुरक्षित कोना बनाया गया है या पितृसत्ता का अँधेरा कमरा। अनामिका अनु के यहाँ घर एक तीसरी चीज़ है। वह एक अधूरा नक्शा है। उसके भीतर रसोई है, पर रसोई के धुएँ से आकाश की रेखाएँ बनती हैं। वहाँ माँ है, पर माँ केवल भावुकता का चित्र नहीं, श्रम और मौन की सभ्यता है। वहाँ दालान है, पर दालान सिर्फ वास्तु नहीं, स्त्री की सार्वजनिक उपस्थिति की माँग है। वहाँ देह है, पर देह कोई शर्म से ढँकी वस्तु नहीं; वह सृष्टि, भय, उल्लास, रक्त, गर्व और आत्मस्वीकृति की खुली हुई पुस्तक है।
यहाँ भाषा कई स्तरों पर काम करती है। ऊपर से वह लिरिकल दिखती है। मुलायम, उजली, कभी-कभी धुंध से ढकी हुई। लेकिन भीतर उसकी बनावट अधिक कठोर है। उसके भीतर प्रश्न हैं। वह पूछती है कि प्रेम में स्त्री कितनी उपस्थित होती है और कितनी अनुपस्थित रखी जाती है। वह पूछती है कि देह पर अधिकार किसका है? धर्म का, परिवार का, प्रेमी का, समाज का या उस जीवित चेतना का जो उस देह में साँस ले रही है। वह पूछती है कि घर माँगना क्या सचमुच इतना असंभव है कि स्त्री को बार-बार प्रतीकों से काम चलाना पड़े। वह पूछती है कि स्मृति क्या केवल निजी चीज़ है, या उसमें इतिहास का नमक भी मिला रहता है।
अनामिका अनु का काव्य-प्रदेश अनेक भूगोलों से बना है। बिहार की मिट्टी, केरल की नमी, स्त्री-जीवन की छाया, विज्ञान की चमक, श्रमिक जीवन की खुरदरी सतह, प्रेम की अनकही पराजय और दुनिया भर की हिंसाओं का काला धुआँ। लेकिन इन सबको जोड़ने वाली चीज़ सूचना नहीं, संवेदना की बुद्धि है। यह उनकी ताकत है।
वे संदर्भों को इसलिए नहीं लातीं कि कविता पढ़ी-लिखी लगे; वे उन्हें इसलिए लाती हैं कि मनुष्य की पीड़ा किसी एक भाषा, एक प्रदेश, एक शरीर में बंद नहीं रहती। एक लड़की की कब्र दूसरे महाद्वीप में भी हमारे कमरे का ताप बदल सकती है। एक मजदूर की हथेली किसी प्रेम-कविता को सामाजिक बना सकती है। एक वैज्ञानिक अवधारणा स्त्री की आंतरिक बेचैनी को नया प्रकाश दे सकती है।
लेकिन इसी बहुलता में उनकी कविता का जोखिम भी छिपा है। अनेक बार उनकी भाषा अपने ही वैभव से प्रेम करने लगती है। बिंब इतने शीघ्र आते हैं कि पाठक एक दृश्य को पूरी तरह देखे, उससे पहले दूसरा दृश्य उसकी आँखों पर रख दिया जाता है। यह समृद्धि सुंदर है, पर कभी-कभी कविता को एकांत से वंचित कर देती है। दरअसल, सबसे बड़ी कविता वह नहीं जो सबसे अधिक कहती है। वह है जो अपने कहे और न कहे के बीच एक विद्युत्तनाव पैदा करती है। अनामिका अनु की श्रेष्ठ पंक्तियाँ वही हैं, जहाँ वे रुकती हैं; जहाँ वे अर्थ को पूरा खोलती नहीं, केवल उसकी कुंडी छूकर हट जाती हैं। भविष्य में उनकी कविता का अधिक गंभीर विकास शायद इसी विराम की दिशा में होगा। कम बोलकर अधिक देर तक सुनाई देना।
उनके यहाँ रूपक केवल सजावट नहीं है; वह अस्तित्व की रणनीति है। जब संसार किसी स्त्री को निर्धारित नामों में बंद कर देता है। देवी, पत्नी, माँ, वधू, कुलवधू, त्यागमूर्ति। तो कविता उसे नया नाम देती है। यह नामकरण विद्रोह का सूक्ष्म रूप है। एक खिड़की लिखना, एक अनुपस्थिति को वस्तु की तरह रख देना, देह को वृक्ष की तरह सोचना, प्रेम को कोशिका या ध्वनि में बदल देना। ये सब भाषा के भीतर स्वतंत्रता की छोटी-छोटी कार्रवाइयाँ हैं। कविता यहाँ अदालत नहीं लगाती; वह शब्दों की नागरिकता बदल देती है। यही उसकी राजनीति है। मद्धिम, किन्तु टिकाऊ।
अनामिका अनु की प्रेम-कविताएँ
अनामिका अनु की प्रेम-कविताएँ भी विशेष ध्यान चाहती हैं। उनमें प्रेम कोई समतल भाव नहीं है। वह संशय से भरा है, लज्जा से, देरी से, दूरी से और उस अजीब असंभाव्यता से, जिसमें मनुष्य किसी को चाहता भी है और उसके सामने पूर्णतः खुल जाने से डरता भी है। यह डर ऐसा भी है कि प्रेम आकर आंदोलित कर देगा। यहाँ प्रेम की एक ध्वनि भी है और प्रतिध्वनि भी। प्रेम यहाँ स्वप्न का रेशमी पर्दा नहीं; वह आत्म-बोध की कठिन जगह है। वह स्त्री को कोमल नहीं बनाता, उसे अधिक सजग बनाता है। वह जानती है कि स्पर्श के भीतर इतिहास है, इच्छा के भीतर भय है और चुप्पी के भीतर वे सारे वाक्य हैं, जिन्हें समाज ने बोलने नहीं दिया। इसीलिए उनकी प्रेम-कविता केवल प्रेमी से संवाद नहीं करती; वह भाषा, देह और सामाजिक स्मृति से भी संवाद करती है।
उनकी कविताओं में विज्ञान का प्रवेश भी उल्लेखनीय है। हिन्दी कविता में विज्ञान अक्सर या तो सूचना की तरह आता है या आधुनिकता की सजावट की तरह। अनामिका अनु उसे भावात्मक संरचना में बदल देती हैं। परमाणु, ऊर्जा, ब्रह्मांड, कोशिका, प्रकाश, ध्वनि आदि। ये सब उनके यहाँ पाठ्य-पुस्तक से नहीं आते; ये जीवन के रूपक बनते हैं। जैसे मनुष्य का भीतर भी कोई अनदेखा आकाश है, जिसमें टूटे हुए तारों की राख, प्रेम की सूक्ष्म किरणें और स्मृति की धूल तैरती रहती है। यह विज्ञान को काव्य में पिघलाने की कला है, और वह भी बिना उसे ठंडे ज्ञान में बदलने के।फिर भी, उनकी कविता को सबसे दीर्घजीवी बनाने वाली चीज़ शायद उनकी स्त्री-संवेदना ही है। पर वह संवेदना आँसू की राजनीति नहीं करती। वह दया माँगती नहीं; वह दृष्टि माँगती है। वह कहती है कि स्त्री को केवल पीड़ा में मत पढ़ो; उसे इच्छा में पढ़ो, श्रम में पढ़ो, क्रोध में पढ़ो, ज्ञान में पढ़ो, घर माँगने की उसकी व्यावहारिक माँग में पढ़ो और उस क्षण में पढ़ो जब वह अपने रक्त को अपवित्र कहे जाने से इंकार करती है। यह इंकार ही कविता की रीढ़ है। इसके बिना सारी लिरिकल चमक केवल फूलों की सजावट रह जाती।
कविताओं में कमियाँ भी हैं?
अनामिका अनु का महत्व इस बात में है कि वे हिन्दी कविता में एक ऐसे स्वर की संभावना खोलती हैं, जो एक साथ घरेलू और वैश्विक, स्त्रीगत और दार्शनिक, ऐंद्रिक और वैचारिक, भावुक और विश्लेषक हो सकता है। उनकी कविता में अभी भी अधिक कसाव की गुंजाइश है; कहीं-कहीं उन्हें अपने रूपकों की भीड़ से कविता को बचाना होगा, कहीं संदर्भों की चमक को आंतरिक लय के अधीन करना होगा, कहीं वाक्य को उसके अपने मौन में छोड़ना होगा। लेकिन यह सब उन कवियों के लिए कहा जाता है, जिनसे अपेक्षा होती है। साधारण कविता से कोई यह नहीं कहता कि तुम और कठोर हो जाओ; वह तो जैसे है, वैसे ही भुला दी जाती है। अनामिका अनु की कविता को भुलाना कठिन है, क्योंकि वह पाठक के भीतर वस्तुओं के अर्थ बदल देती है।
अंततः उनकी कविता का सबसे सुंदर पक्ष यही है कि वह जीवन को एक तैयार अर्थ में नहीं स्वीकारती। वह मिट्टी को छूती है और उसमें भूगोल सुनती है। वह देह को देखती है और उसमें इतिहास पढ़ती है। वह प्रेम को सुनती है और उसमें एक ऐसी ध्वनि पहचानती है जो कही नहीं गई। वह घर को देखती है और पूछती है कि किसके लिए दरवाज़ा है, किसके लिए दीवार। वह संसार के हिंसक शोर में एक ऐसी धीमी, सावधान, चमकदार भाषा रखती है, जो कहती है कि मनुष्य होना अभी समाप्त नहीं हुआ है; कविता अभी भी वस्तुओं को दूसरा जन्म दे सकती है।