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आतिशी बनाम गंभीर: चुनाव जीतने के लिए सस्ते हथकंडे क्यों

चुनाव जीतने के लिए कितनी धूर्त तरक़ीबें अपनाई जा सकती हैं, इसका पता दिल्ली में पूर्वी दिल्ली की सीट पर बीजेपी और आम आदमी पार्टी के बीच चल रहे संग्राम से चलता है। सबसे पहले आम आदमी पार्टी (आप) की उम्मीदवार आतिशी मरलेना के ख़िलाफ़ ‘आपत्तिजनक’ पर्चे बाँटे जाने का मामला सामने आया। आतिशी और दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर बीजेपी उम्मीदवार गौतम गंभीर पर आतिशी के ख़िलाफ़ पर्चे बंटवाने का आरोप लगाया। लेकिन गंभीर ने इन आरोपों पर तीख़ी प्रतिक्रिया दी थी। एक के बाद एक कर किए गए कई ट्वीट में गंभीर ने कहा था कि अगर उनके ख़िलाफ़ आरोप साबित हुए तो वह राजनीति छोड़ देंगे। गंभीर ने ‘आप’ को आरोपों को साबित करने की चुनौती दी थी।
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गंभीर ने इस मामले में सीधे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर हमला बोला था। गंभीर ने ट्वीट कर कहा था, ‘अरविंद केजरीवाल, मैं एक महिला की निजता से खिलवाड़ को लेकर आपके कृत्य की निंदा करता हूँ। वह भी ऐसी महिला जो आपकी साथी है। और वह भी चुनाव जीतने के लिए?' इसके बाद बात मानहानि तक पहुँची और दोनों पक्षों की ओर से एक-दूसरे को मानहानि का नोटिस भेजने की बात सामने आई।
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आतिशी ने महिला आयोग में शिकायत की और कहा कि इस मामले के पीछे गौतम गंभीर हैं और वही नफ़रत भरा दुष्प्रचार कर रहे हैं। इसके बाद गंभीर ने कहा कि अगर केजरीवाल यह साबित कर दें कि पर्चा बँटवाने के मामले से उनका कोई लेना-देना है, तो वह जनता के सामने फाँसी लगा लेंगे और अगर वह यह साबित नहीं कर पाते तो क्या केजरीवाल राजनीति छोड़ देंगे?
गंभीर को इस मामले में क्रिकेटर हरभजन सिंह और वीवीएस लक्ष्मण का समर्थन मिल रहा है। हरभजन ने ट्वीट कर कहा कि गंभीर जीतें या न जीतें, यह अलग बात है लेकिन वह किसी महिला के बारे में ग़लत शब्द नहीं बोल सकते।
ऐसा नहीं है कि दिल्ली में ही इस तरह की घटनाएँ हो रही हैं। देश में कई जगहों पर और कई मौक़ों पर जनप्रतिनिधियों को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ बहुत ख़राब भाषा का इस्तेमाल करते देखा गया। हाल ही में समाजवादी पार्टी के नेता आज़म ख़ान के एक कमेंट पर भी ख़ूब बवाल हुआ था।
आतिशी के ख़िलाफ़ जो पर्चा बँटवाया गया और उसमें जिस तरह की बातें कही गई हैं, वह निश्चित रूप से बेहद आपत्तिजनक हैं। किसी भी प्रत्याशी के ख़िलाफ़ इस तरह की बातें क़तई नहीं होनी चाहिए। लोकतंत्र में सभी उम्मीदवारों से यह उम्मीद की जाती है कि वे जनता के सामने विकास का एजेंडा लेकर जाएँगे और जनप्रतिनिधि के तौर पर व्यवहार करेंगे लेकिन पूर्वी दिल्ली की सीट पर चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह की घटनाएँ हुई हैं, उससे लोकतंत्र को निश्चित रूप से नुक़सान हुआ है।

सोशल मीडिया से फैल रही कटुता

तकनीक के बदलते दौर में सोशल मीडिया भी कटुता फैलाने का एक बड़ा माध्यम बना है। आतिशी और गंभीर वाले मामले में भी यही हुआ। लोगों ने एक गुमनाम चिट्ठी को सोशल मीडिया पर बिना उसकी सत्यता जाने वायरल कर दिया और बीजेपी और आप के कार्यकर्ता आपस में भिड़ गए। इस दौरान बेहद निचले स्तर तक इस्तेमाल की जाने वाली भाषा का भी ख़ूब प्रयोग हुआ। कहा जा सकता है कि सोशल मीडिया के कारण भी कटुता तेज़ी से फैल रही है।

राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उनके इस तरह के बयानों से जनता के बीच उनकी छवि कैसी बन रही है। चुनाव आयोग को इस तरह की घटनाओं की जाँच करवानी चाहिए और दोषी पाये जाने वालों के ख़िलाफ़ कड़ा एक्शन लेना चाहिए जिससे लोकतंत्र की मर्यादा बनी रहे। इसके अलावा मतदाताओं को भी नेताओं के बिगड़े बोल पर आपत्ति दर्ज करानी चाहिए।

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