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क्या पश्चिम बंगाल में वाम फ्रंट की जड़ें बिल्कुल कट गई हैं?

ममता बनर्जी ने लोकसभा चुनाव नतीजों पर जीतने वालों को बधाई देते हुए हुए बेहद दार्शनिक ढंग से प्रतिक्रिया जताई और कहा, ‘हर हारा हुआ व्यक्ति पराजित नहीं होता है।’ उन्होंने यह भी कहा कि वह इन नतीजों की समीक्षा करेंगी।

अपने स्वभाव के उलट उनकी यह सधी हुई और गंभीर प्रतिक्रिया थी। यह ख़बर लिखी जाने तक पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस 23 और बीजेपी 19 सीटों पर आगे चल रही थीं। यह पिछले चुनाव के नतीजों से बहुत ही अलग और चौंकाने वाला नतीजा है। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में बीजेपी के 2 उम्मीदवारों की जीत हुई थी और तृणमूल कांग्रेस ने 34 सीटों पर कब्जा कर लिया था। कांग्रेस को 4 सीटों पर कामयाबी मिली थी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) 2 सीटों पर सिमट गई थी। बीजेपी ने 2 सीटों से 19 सीटों पर छलांग लगाई, पर इसके कारण भी साफ़ हैं।

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उत्तर से दक्षिण तक बीजेपी

जिन सीटों पर बीजेपी अभी आगे चल रही है, उन पर एक बार नज़र डालने से कई बातें साफ़ होती हैं। बीजेपी उत्तर बंगाल के रायगंज और मालदह उत्तर के सीमावर्ती इलाक़ों ही नहीं, मेदिनीपुर और पुरुलिया जैसे वाम किलों में भी सेंध लगाने में कामयाब रही है। मालदह उत्तर में खगेन मुर्मू तो रायगंज में देबश्री चौधरी भी आगे चल रही हैं, इसी तरह तमुलक में बीजेपी के सिद्धार्थ शंकर नस्कर भी आगे चल रहे हैं। मालदह उत्तर और रायगंज के सीमाई इलाक़ों में बांग्लादेश से आए लोगों की तादाद अधिक होने और मुसलिम आबादी की वजह से ध्रुवीकरण हुआ, जिसका फ़ायदा भगवा पार्टी को मिला, यह बात समझ में आती है। लेकिन मेदिनीपुर, पुरुलिया और तमलुक में बीजेपी की बढ़त नए समीकरण की ओर इशारा करता है। ये तीनों ही जगह सीपीएम का गढ़ रहे हैं, जहाँ उस पार्टी ने 1977 के बाद से लगातार जीत हासिल की है। इन इलाक़ों में सीपीएम एक बेहद मजबूत संगठन के रूप में जानी जाती रही है और उसकी गज़ब की पकड़ रही है।
कोलकाता के नज़दीक उलबेड़िया और बशीरहाट में बीजेपी उम्मीदवारों की बढ़त से यह तो साफ़ है कि यह वोट सिर्फ़ ध्रुवीकरण का नतीजा नहीं है। ये वे इलाक़े हैं, जहाँ मजदूरों की सघन आबादी है, जहाँ तृणमूल कांग्रेस का कोई आधार हाल फिलहाल तक नहीं रहा है।

सिमट गई सीपीएम

एक अनुमान के मुताबिक़, पश्चिम बंगाल में सीपीएम को इस बार सिर्फ़ 8 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि पिछले लोकसभा चुनाव में इसे लगभग 30 प्रतिशत मतदाताओं ने उसे वोट दिया था। इन इलाकों के अब तक के वोटिंग पैटर्न से यह साफ़ है कि बीजेपी ने सीपीएम के इलाक़ों में अंदर तक सेंधमारी की है।
मुख्य लड़ाई तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच रही है, सीपीएम तीसरे नंबर पर आई है। यह सिर्फ़ ध्रुवीकरण का नतीजा नहीं है। साफ़ है कि सीपीएम समर्थकों ने बीजेपी का दामन थामा है। ऐसा लगता है कि जो लोग सरकार से नाराज़ हैं, उन्होंने बीजेपी को वोट दिया है।
उन्हें ऐसा लगा है कि उनका प्रतिनिधित्व सत्ताधारी दल नहीं कर सकता, यह काम बीजेपी के लोगों को दिया गया है। सीपीएम से बीजेपी तक वोटों का यह ट्रांसफ़र एक नए समीकरण की ओर इशारा करता है, जिसके तहत बीजेपी मुख्य विपक्षी दल की भूमिका लेने को तैयार है। सीपीएम अब इस लायक भी नहीं रही।

किसी समय श्रमिक आंदोलन का केंद्र रहे हुगली और श्रीरामपुर में भी सीपीएम का नामलेवा नहीं बचा है, वहाँ भी लोगों ने बीजेपी को उस पर तरजीह दी है। तो क्या मजदूरों ने भी सीपीएम का साथ छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया है, यह सवाल उठा लाज़िमी है।

दरअसल, यह हार टीएमसी की कम और सीपीएम की अधिक है। टीएमसी ने लगभग सभी जगहों पर बीजेपी को टक्कर दी है, जिन जगहों पर वह हारी है, वहाँ भी उसे सम्मानजनक वोट मिले हैं। उसकी सीटें कम हुई हैं, पर उसके वोट शेयर में 3 प्रतिशत का इजाफ़ा हुआ है।

'हर हारा हुआ आदमी पराजित नहीं होता'

वह कई जगहों पर पीछे हट रही है, पर कहीं भी सिमट नहीं रही है। उसके उलट उसका आधार बढ़ रहा है। शायद इसी वजह से ममता बनर्जी ने कहा कि हर हारा हुआ आदमी पराजित नहीं होता है।

वाम मोर्चा को इस पर भी संतोष करने को कुछ नहीं है। वह कहीं भी लड़ाई में नहीं है। ज़्यादातर जगहों पर वह नंबर तीन पर ही है। नतीजे आने के बाद ही यह मालूम हो सकेगा कि उसे कहाँ कितने वोट मिले, पर रुझानों से यह साफ़ हो चुका है कि उसका आधार लगभग ख़त्म हो चुका है, वह एकदम सिमट चुकी है, वह अब पश्चिम बंगाल की मुख्य विपक्षी पार्टी नहीं रही। बीजेपी ने यह जगह उससे छीन ली है। अब तक के रुझानों में सीपीएम कहीं भी आगे नहीं है, पर वह कहीं भी दूसरे नंबर पर भी नहीं है। यह उसके लिए ज़्यादा चिंता की बात है। वामपंथी दलों के लिए मर्सिया पढ़ने का समय आ गया।

यह कहना जल्दबाजी होगी कि पश्चिम बंगाल में बहुमत हिन्दुओं ने ममता बनर्जी के अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की वजह से ही बीजेपी को वोट दिया है। बाँकुड़ा, पुरुलिया, मेदिनीपुर, हुगली, बैरकपुर, आसनसोल, दुर्गापुर जैसे क्षेत्रों में ध्रुवीकरण की बात नहीं कही जा सकती।

आधार से उखड़ी सीपीएम

इन इलाक़ों में अल्पसंख्यक समुदाय निर्णायक भूमिका में नहीं है, न ही यहाँ बांग्लादेश से आए लोगों की तादाद अधिक है, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे बीजेपी से आकर्षित हुए हैं। ये वे इलाक़े हैं, जहां मजदूर हैं, आदिवासी है्ं, पिछड़े समुदाय के लोग हैं, जो सीपीएम के पारपंरिक वोटर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि इन इलाक़ों में जहाँ बीजेपी नहीं जीतेगी, वहाँ दूसरे नंबर पर आएगी, यह साफ़ है।
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत राज्य में एक नए युग की शुरुआत है, जहाँ खाते-पीते मध्यवर्ग ही नहीं, ग़रीब, मजदूर, पिछड़ों ने भी उसे वोट दिया है। भद्रलोक बंगाली ही नहीं, आदिवासियों ने भी उसे चुना है। यह तृणमूल और सीपीएम दोनों के लिए अधिक चिंता की बात है।
बीजेपी के साथ समझौता कर चुनाव लड़ने वाली और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में रेल मंत्री बनने वाली ममता बनर्जी ने उस समय भले ही कहा था, ‘चुपचाप, फूल छाप’। पर अब यह मामला चुपचाप नहीं रहा। उस समय उन्होंने भले ही कहा हो, ‘पश्चिम बांग्लाय दू टी फूल, बीजेपी-तृणमूल’, लेकिन अब उस फूल ने उनके तृणमूल की जड़ों को काटना शुरू कर दिया है। लेकिन मामला सिर्फ़ तृणमूल का नहीं है। रवींद्रनाथ टैगोर और काज़ी नज़रल इसलाम के मूल्यों पर गर्व करने वाले यह सोचें कि अब ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा भी तोड़ी जा रही है। यह बंगाल में नए युग की शुरुआत है। 
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