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यूपी में आख़िरी चरण में कड़े मुक़ाबले में फंसी बीजेपी

उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों के रण के सबसे मुश्किल सातवें और अंतिम चरण में बीजेपी का मुक़ाबला एसपी-बीएसपी गठबंधन के साथ ही छोटी जातियों के गठजोड़ से है। सातवें चरण की इन 13 सीटों पर यह कॉकटेल ख़ासा कड़क है और बीजेपी को कई सीटों पर मुसीबत में डाल रहा है।
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आख़िरी चरण में वाराणसी को छोड़ दें तो बाक़ी सभी सीटों पर बीजेपी कठिन लड़ाई में फंसी है। वाराणसी के आसपास की चंदौली, ग़ाज़ीपुर, मिर्ज़ापुर, सोनभद्र, घोसी में हर जगह गठबंधन प्रत्याशी कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं तो गोरखपुर मंडल की सीटों पर भी हाल कुछ अलग नहीं है। दरअसल, इन सभी सीटों पर कमंडल से ज़्यादा मंडल ही भारी है और प्रत्याशियों के चयन में गठबंधन ने चतुराई से काम लेते हुए अपने आधार वोटों के साथ अन्य पिछड़ी जातियों का असरदार गठजोड़ तैयार किया है।
बीजेपी इस चरण में राष्ट्रवाद को भूलकर जातिवाद को हवा देने में लगी है और वाराणसी सीट पर मोदी की मौजूदगी को भुना रही है। पूर्वांचल का विकास, काम, तमाम योजनाएँ पीछे छोड़ बीजेपी आख़िरी चरण में जातियों का पेच ही सुलझाने में लगी है।
प्रधानमंत्री की सीट वाराणसी से सटी हुई सीट मिर्ज़ापुर में बीजेपी के सहयोगी दल अपना दल की अनुप्रिया पटेल मैदान में हैं और उनके सामने गठबंधन के रामचरित्र निषाद हैं। केवट, अहीर, दलित और मुसलमान (जो इस सीट पर काफ़ी कम हैं) के साथ के चलते गठबंधन ने अनुप्रिया के सामने कड़ी चुनौती पेश की है तो कांग्रेस के ललितेश पति त्रिपाठी सजातीय वोटों के साथ कोल वोटों पर दावेदारी कर लड़ाई को मुश्किल बना रहे हैं। मिर्ज़ापुर जाने पर पता चलता है कि ललितेश का बीजेपी के आधार वोट ब्राह्मणों का बड़ा हिस्सा समर्थन कर रहा है जो अनुप्रिया के लिए मुसीबत का सबब है। 
चंदौली सीट पर बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्रनाथ पांडे तो बस मोदी नाम के सहारे ही दिखते हैं। यहाँ गठबंधन कागजों पर तो मजबूत है पर ज़मीन पर काफ़ी बग़ावत, भितरघात नज़र आ रहा है।
एसपी के नेता ओमप्रकाश सिंह का चंदौली में ठाकुर मतों पर ख़ासा प्रभाव है पर ख़ुद टिकट न पाने के चलते वह निष्क्रिय से दिखते हैं। यहाँ से गठबंधन के उम्मीदवार संजय चौहान लोनिया जाति से हैं और सजातीय मतों के साथ ही गठबंधन के आधार वोटों के भरोसे हैं। कांग्रेस की सहयोगी पार्टी जनअधिकार दल से शिवकन्या कुशवाहा बीजेपी की समर्थक कोईरी जाति के मतों में सेंधमारी कर रही हैं। 
ग़ाज़ीपुर में केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा के सामने गठबंधन के अफ़ज़ाल अंसारी बड़ी चुनौती हैं। यहाँ कभी बीजेपी के साथी रहे ओमप्रकाश राजभर अब बाग़ी होकर अपनी जाति के वोटों में सेंध लगा रहे हैं और अफ़ज़ाल का साथ दे रहे हैं। घोसी सीट पर भी हाल जुदा नहीं है।

गोरखपुर में मोदी के सहारे बीजेपी

प्रचंड बहुमत के साथ राज्य की सत्ता में आई बीजेपी सरकार के प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के अपने इलाक़े में बीजेपी केवल और केवल मोदी नाम के सहारे ही दिखती है। यहाँ बीजेपी के प्रत्याशी भी अपने प्रचार अभियान में योगी का नाम लेते नहीं दिखते हैं। योगी ख़ुद अपनी गोरखपुर सीट पर इज्जत बचाने की लड़ाई करते दिख रहे हैं तो आस-पड़ोस की सीटों का हाल जुदा नहीं है।गोरखपुर में बीजेपी संगठन में ही खींचतान है तो केवट मतों में सजातीय सांसद प्रवीण निषाद को हटा देने से नाराज़गी है। बलिया में बीजेपी प्रत्याशी वीरेंद्र सिंह मस्त के सामने गठबंधन के सनातन पांडे हैं। इस सीट पर ब्राह्मण और ठाकुर मतों में तलवारें खिंच चुकी हैं और गठबंधन कड़ी चुनौती पेश कर रहा है। सलेमपुर, महराजगंज, देवरिया सहित पूरे मंडल की हर सीट पर गठबंधन ने अतिपिछड़ों के साथ जुगलबंदी कर पेच फंसा दिया है।
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बीजेपी के लिए 2014 में और फिर 2017 के विधानसभा चुनावों में भी ठेठ पूरब की ये सीटें मुश्किल नज़र आ रही थीं। हाईटेक प्रचार और मोदी-अमित शाह की रैलियों, सभाओं के साथ बीजेपी ने इस मुश्किल को पार किया था। विधानसभा चुनावों में तो आखिरी के तीन दिन ख़ुद मोदी मैदान में उतर पड़े थे। इस बार भी बीजेपी इसी रणनीति पर काम कर रही है।
सातवें चरण को मुश्किल जानकर और ज़मीनी हालात को भांपते हुए बीजेपी ने न केवल मोदी की रैलियों की संख्या बढ़ाई बल्कि अपने ज़्यादातर नेताओं को यहीं कैंप करने का फरमान जारी किया।
सातवें चरण की हर सीट पर ख़ुद मोदी या अमित शाह ने सभाएँ की और प्रदेश के मंत्रियों को वहीं रुका दिया गया। जातीय गुणा-गणित सही करने के लिए बीजेपी ने ताबड़तोड़ दूसरे दलों के असंतुष्ट नेताओं को इन सीटों पर साधते हुए अपनी पार्टी में शामिल किया। बीजेपी के साथ ही संघ के सभी संगठन मंत्रियों व प्रचारकों को अलग से इन सीटों पर जुटा दिया गया है।  
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