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चुनाव आयोग ने मोदी को क्यों दी क्लीन चिट?

चुनाव आयोग एक बार फिर कटघरे में खड़ा है। इसके कामकाज और इसकी निष्पक्षता पर सवालिया निशान लग रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि चुनाव आयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति ज़्यादा मेहरबान क्यों है और क्यों उनके ख़िलाफ़ की गई शिकायतों पर ऐसे फ़ैसले ले रहा है, जिन्हें पक्षपातपूर्ण कहा जा सकता है। ताज़ा मामले में तो आयोग ने अपने बहुत वरिष्ठ अफ़सरों की रिपोर्टों की अनदेखी करते हुए मोदी को क्लीन चिट दी है। 
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अपने ताज़ा फ़ैसले में चुनाव आयोग ने पुलवामा आतंकवादी हमले और बालाकोट हवाई हमले का उल्लेख करते हुए पहली बार वोट डालने वालों से इस मुद्दे पर मतदान करने की अपील करने के मामले में नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दे दी है। महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी और उस्मानाबाद के ज़िला निर्वाचन अधिकारी ने प्रधानमंत्री के भाषण को आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुकूल नहीं माना था। पर, चुनाव आयोग ने इन दोनों अफ़सरों की रिपोर्टों को दरकिनार करते हुए मोदी को दोषमुक्त क़रार दिया। 

पुलवामा के शहीदों के नाम पर वोट

प्रधानमंत्री मोदी ने महाराष्ट्र के लातूर में शहीदों के नाम पर लोगों से सीधे वोट नहीं माँगा था। मोदी ने अपने भाषण में कहा था, 'मैं फ़र्स्ट टाइम वोटर्स से कहना चाहता हूँ, क्या आपका पहला वोट पाकिस्तान के बालाकोट में एयर स्ट्राइक करने वाले वीर जवानों के नाम समर्पित हो सकता है क्या? आपका पहला वोट पुलवामा में जो वीर शहीद हुए उन वीर शहीदों के नाम आपका वोट समर्पित हो सकता है क्या? ग़रीब को पक्का घर मिले उसके लिए आपका वोट समर्पित हो सकता है क्या?'पुलवामा के शहीदों के परिवार तो चुनाव लड़ नहीं रहे हैं लेकिन यह आसानी से समझा जा सकता है कि शहीदों के नाम पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसके लिए वोट माँग रहे हैं।

अंग्रेज़ी अख़बार 'इंडियन एक्सप्रेस' ने अपनी ख़बर में कहा है कि इस शिकायत पर चुनाव आयोग में चर्चा तो हुई, पर तकनीकी आधार पर मोदी को निर्दोष क़रार दिया गया। यह कहा गया कि मोदी ने अपने लिए या अपनी पार्टी के लिए सीधे वोट नहीं माँगे थे। यह भी कहा गया कि महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी और उस्मानाबाद के ज़िला चुनाव अधिकारी की रपटें मोदी के भाषण की कुछ पंक्तियों के आधार पर ही तैयार की गई थीं, पूरे भाषण पर विचार नहीं किया गया था। 
चुनाव आयोग ने कांग्रेस के रणदीप सिंह सुरजेवाला को लिखी चिट्ठी में कहा, 'चुनाव आयोग ने अपने दिशा-निर्देशों के परिप्रेक्ष्य में मुद्दे की समीक्षा की है, उस्मानाबाद संसदीय क्षेत्र के रिटर्निंग अफ़सर की रिपोर्टो को देखा है, पूरे भाषण की ट्रांसक्रिप्ट पढ़ने के बाद आयोग इस नतीजे पर पहुँचा है कि किसी तरह का उल्लंघन नहीं हुआ है।'
यह दिलचस्प बात है कि चुनाव आयोग ने अपने ही आला अफ़सरों की रिपोर्टों की अनदेखी कर मोदी को क्लीन चिट दी है। कहा जा सकता है कि इस मामले में आयोग ने अफ़सरों की एक नहीं सुनी। 

क्या कहा था चुनाव आयोग ने?

चुनाव आयोग ने 19 मार्च को सभी राजनीतिक दलों को लिखी चिट्ठी में कहा था कि वे सैन्य बलोें के कामकाज पर किसी तरह के राजनीतिक प्रोपगैंडा से बचें। इसके पहले आयोग ने 9 मार्च को सभी राजनीतिक दलों को ख़त लिख कर कहा था कि सैनिकों की तसवीर या सेना की किसी कार्रवाई या प्रतीक या चिह्न का प्रयोग अपने चुनाव प्रचार में न करें, अपने पोस्टर या मंच या प्रचार सामग्री में उसका इस्तेमाल न करें। 
नरेंद्र मोदी ने 6 अप्रैल को नांदेड़ की सभा में कहा था कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने वायनाड से चुनाव लड़ने का फ़ैसला इसलिए किया कि 'जो समुदाय पूरे देश में अल्पसंख्यक है, वह वहाँ बहुसंख्यक है और जो समुदाय पूरे देश में बहुसंख्यक है, वह वहाँ अल्पसंख्यक है।' कांग्रेस ने इसकी भी शिकायत आयोग से की थी, लेकिन आयोग ने इस मामले में भी मोदी को क्लीन चिट दे दी थी। 

मोदी पर मेहरबान

प्रधानमंत्री ने गुजरात के पाटण में 21 अप्रैल को भाषण देते हुए कहा था कि यदि पाकिस्तान ने विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान को रिहा नहीं किया होता तो वह 'क़त्ल की रात' होती क्योंकि उन्होंने पाकिस्तान पर हमला करने के लिए '12 मिसाइलें तैनात कर रखी थीं।' 
उसी दिन राजस्थान के बाड़मेर में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए मोदी ने कहा था कि हमने परमाणु बम दीवाली के लिए नहीं रखे हैं। उनका इशारा साफ़ तौर पर पाकिस्तान की ओर था और वह एक तरह से पाकिस्तान पर परमाणु हमले की बात कर रहे थे। 
एक के बाद एक कई मौक़े आए, जब प्रधानमंत्री ने सैन्य बलों, सैनिकों, सेना के प्रतीकोें, इसके ऑपरेशन्स का इस्तेमाल प्रचार में किया। उनका मक़सद यह दिखाना था कि उनके प्रधानमंत्री रहते सेना ने यह सब कर लिया जो पहले कभी नहीं हुआ था।
प्रधानमंत्री यह कहना चाहते थे कि उनकी वजह से यह सब मुमकिन हुआ है। पुुलवामा हमले के ठीक दो दिन बाद हुई एक रैली में मंच पर इस हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ़ के जवानों के चित्र लगाए गए थे। 
एक तो चुनाव आयोग जानबूझ कर सारी बातों से आँखें मूंदे रहा। विपक्षी दलों ने जब शिकायतें कीं तो आयोग ने मोदी को क्लीन चिट दे दी और उसमें अपने ही अफ़सरों की रिपोर्टों को ग़लत बताया। इससे आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। 

राहुल को नोटिस

लेकिन चुनाव आयोग मोदी के राजनीतिक विरोधी राहुल गाँधी पर इतना मेहरबान नहीं है। राहुल गाँधी के 23 अप्रैल को मध्य प्रदेश के शहडोल में दिए भाषण पर आयोग ने मंगलवार को उन्हें नोटिस थमा दिया है। राहुल ने इस रैली में कहा था कि मोदी सरकार ने ऐसा क़ानून बनाया है, जिससे अफ़सरों को यह अधिकार मिलता है कि वे आदिवासियों को गोली मार दें। 
चुनाव आयोग ने कांग्रेस अध्यक्ष को नोटिस जारी करते हुए उनसे कहा है कि वे 48 घंटे के अंदर इस पर जवाब दें, जिसके बाद उन्हें बताए बिना इस पर फ़ैसला ले लिया जाएगा।

प्रज्ञा पर प्रतिबंध

चुनाव आयोग ने भोपाल से बीजेपी उम्मीदवार साध्वी प्रज्ञा पर चुनाव प्रचार पर 72 घंटे का प्रतिबंध लगा दिया है। आयोग ने उन्हें सांप्रदायिक भावनाएँ भड़काने का दोषी पाया है। आयोग ने माना है कि हेमंत करकरे और अयोध्या में मसजिद ढहाए जाने से जुड़े उनके बयान आचार संहिता का उल्लंघन हैं। उन्होंने करकरे के बारे में अपमानजनक बातें कही थीं। इसी तरह उन्होंने अयोध्या में बाबरी मसजिद विध्वंस में अपनी भूमिका होने और उस पर गर्व करने की बात कही थी। 
पर्यवेक्षक यह सवाल उठा रहे हैं कि चुनाव आयोग आचार संहिता उल्लंघन के मामले में दोहरे मानदंड क्यों अपना रहा है। वह क्यों मोदी के ख़िलाफ़ की गई शिकायतों पर नरम रुख अपनाता है और उन्हें क्लीन चिट दे देता है, जबकि दूसरों के प्रति वह क़ानून और दिशा-निर्देशों का पूरा पालन करता है। यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या इस संस्थान को भी कमज़ोर कर दिया गया है और वह पूरी तरह सरकार के सामने झुका हुआ है? 
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