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क्यों सीबीआई के निशाने पर हैं विपक्षी दल?

लोकसभा चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के ख़िलाफ़ सीबीआई छापे पर सवाल खड़े हो रहे हैं। विपक्षी दलों ने इस छापे को आने वाले लोकसभा चुनाव से जोड़ा है। यह सवाल इसलिए भी खड़ा हो रहा है कि लंबे समय से लंबित पड़े मामलों में एक के बाद एक विपक्षी दलों के नेताओं पर सीबीआई कार्रवाइयाँ हुई हैं। हालाँकि यह सब मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही शुरू गया है, लेकिन हाल के दिनों में इसमें तेज़ी आई है। इसी महीने अखिलेश के क़रीबियों के ख़िलाफ़ सीबीआई के छापे पड़े। सीबीआई ने इससे पहले मायावती, पी. चिदंबरम और लालू परिवार के सदस्यों पर भी कार्रवाई की है। तृणमूल के कई नेताओं पर भी केस किया। हालाँकि, इन मामलों में विशेष नतीजा नहीं निकला है। कई मामलों में सीबीआई कार्रवाई में देरी भी हुई।

ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या सीबीआई पर विपक्षी दलों और सरकारों को परेशान करने का कोई राजनैतिक दबाव है? कहीं ऐसा तो नहीं कि चुनाव से ऐन पहले विपक्षी दलों को कमज़ोर कर वोटों का फ़ायदा लेने की कोशिश है? जो भी हो, विपक्षी दल तो ऐसे ही आरोप लगा रहे हैं। हालाँकि सरकार इन आरोपों से साफ़ इनकार करती रही है और उन्हें भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एजेंसी की स्वतंत्र कार्रवाई बताती रही है। पढ़िए, एक के बाद एक विपक्षी दलों के नेताओं के ख़िलाफ़ सीबीआई की कैसे चल रही है कार्रवाई।

सपा-बसपा गठबंधन होते ही सीबीआई छापे

एक तरफ़ नई दिल्ली में इस साल पाँच जनवरी को सुबह सपा-बसपा गठबंधन की बैठक चली और उधर दोपहर होते-होते यूपी के कई ठिकानों पर धड़ाधड़ सीबीआई के छापे पड़ गए। सीबीआई ने अवैध खनन के मामले में अखिलेश यादव के विधायक रमेश मिश्रा और उनके भाई दिनेश कुमार को आरोपी बनाया। बताया जाता है कि खनन मामले में अखिलेश यादव की भूमिका की भी जाँच की जाएगी और जाँच एजेंसी उनसे पूछताछ भी कर सकती है। बता दें कि अवैध खनन का मामला उस वक्त का है, जब तत्कालीन सीएम अखिलेश यादव के पास खनन मंत्री की भी ज़िम्मेदारी थी। रेत खनन मामले में पहले आईएएस अधिकारी बी. चंद्रकला पर कार्रवाई की गई और बाद में इसमें कई लोगों को आरोपी बनाया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2016 में सपा सरकार के कार्यकाल में अवैध खनन और मनमाने तौर पर खदानों के पट्टे देने का मामला सीबीआई को सौंप दिया था। अब यह कार्रवाई शुरू हुई है।

मायावती पर भी कसा जा रहा है शिकंजा

बसपा सुप्रीमो मायावती पर भी शिकंजा कसा जा रहा है। पहले आय से अधिक संपत्ति के मामले में कार्रवाई की जा रही थी। लेकिन सीबीआई साक्ष्य नहीं जुटा पाई और इस कारण मामला बंद हो गया। लेकिन अब उनके ख़िलाफ़ सीबीआई ने एक दूसरी जाँच शुरू कर दी है। मामला उनके शासन काल के दौरान 2010-11 में बेची गई 21 चीनी मिलों से जुड़ा है। लेकिन सीबीआई ने 2018 में जाँच शुरू की। इन चीनी मिलों को बेचे जाने से प्रदेश सरकार को 1,179 करोड़ रुपए का घाटा बताया जा रहा है। एक ऐसा ही मामला 14 अरब के स्मारक घोटाले का सामने आया था, जिसमें बसपा सुप्रीमो का नाम उछला था। हालाँकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई या एसआईटी से कराए जाने की अर्जी ख़ारिज कर दी थी।

चिदंबरम परिवार को घेरा

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के पीछे भी सीबीआई काफ़ी लंबे समय से पड़ी है। ईडी के माध्यम से भी उनकी पत्नी नलिनी और बेटे कार्ति पर शिकंजा कसा गया है। पी. चिदंबरम और कार्ति के नाम एयरसेल-मैक्सिस मामले से जुड़ा है। चिदंबरम पर पीएम मनमोहन सिंह के कार्यकाल में अपने पद का ग़लत इस्तेमाल करते हुए विदेशी निवेश में क्लीयरेंस देने का आरोप है। इसके अलावा यह भी आरोप है कि इन डील की वजह से उनके बेटे कार्ति चिदंबरम को फ़ायदा हुआ है। कार्ति की ग़िरफ़्तारी भी हुई थी। दोनों पिता-पुत्र से ईडी भी पूछताछ कर चुकी है।

नलिनी चिदंबरम 

पी. चिदंबरम की पत्नी नलिनी चिदंबरम के ख़िलाफ़ सीबीआई जाँच कर रही है। सीबीआई के मुताबिक़, चिट फंड घोटाले में घिरे शारदा ग्रुप की कंपनियों से उन्हें 1.4 करोड़ रुपये मिले। आरोप है कि उन्होंने शारदा समूह की कंपनियों को गबन और फ़र्ज़ीवाडे़ के मक़सद से शारदा ग्रुप के मालिक सुदीप्त सेन और अन्य लोगों के साथ आपराधिक साज़िश की।

केजरीवाल को फँसाने की कोशिश

उधर सीबीआई और दिल्ली पुलिस के निशाने पर आम आदमी पार्टी की सरकार भी रही। कुल क़रीब 15 विधायकों को जेल की हवा खानी पड़ी जिनमें से ज़्यादातर को अदालत से क्लीन चिट मिल गई। यहाँ तक कि मुख्यमंत्री के दफ़्तर और घर पर भी छापे पड़े। मुख्यमंत्री केजरीवाल के प्रमुख सचिव राजेंद्र कुमार को जेल भी जाना पड़ा। आम आदमी पार्टी ने आरोप लगाया था कि मोदी के इशारे पर उनके विधायकों के ख़िलाफ़ झूठे आरोप लगाए गए थे।

ममता बनर्जी भी निशाने पर

ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के नेता भी सीबीआई के निशाने पर हैं। शारदा, नारद और रोज वैली चिटफंड घोटाले में तृणमूल के कई वरिष्ठ नेताओं और सांसदों के नाम हैं। 

  • पिछले कुछ वर्षों में इन तीनों मामलों में सीबीआई और ईडी की ओर से टीएमसी के कद्दावर नेताओं मदन मित्रा और सुदीप बंधोपाध्याय को ग़िरफ़्तार करने, 10 अन्य तृणमूल नेताओं को समन भेजने और छह सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल करने के अलावा कोई ख़ास प्रगति नहीं हुई है।

दो राज्यों ने सीबीआई पर लगा दी ‘पाबंदी’

बीजेपी से अलग होते ही टीडीपी पर सीबीआई की कार्रवाई की ख़बरें आने लगीं तो टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू ने एक बड़ा कदम उठाया। आंध प्रदेश सरकार ने सीबीआई को अपने-अपने राज्य में छापे मारने व जाँच करने के लिए दी गई सामान्य रज़ामंदी वापस ले ली है। ऐसा ही पश्चिम बंगाल ने भी किया। आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की तेलुगूदेशम पार्टी की सरकार है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी का शासन है।

दोनों नेताओं ने आरोप लगाया कि केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग के कारण राज्यों का उन पर से विश्वास कम हो रहा है। हालाँकि बीजेपी ने इसे भ्रष्ट दलों द्वारा अपने हितों के बचाव के लिए अधिकारों की स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण कवायद करार दिया।

लालू परिवार पर सीबीआई कार्रवाई

सीबीआई ने जुलाई, 2017 में पूर्व रेल मंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के प्रमुख लालू यादव के घर पर छापे मारे थे। इससे पहले भी सीबीआई ने कई बार छापेमारी की थी। आरोप हैं कि उन्होंने रेल मंत्री रहते हुए 2006 में दो सरकारी होटलों के रख-रखाव का टेंडर अपनी क़रीबी दो निजी कंपनियों को दिए। तत्कालीन सीबीआई के अतिरिक्त निदेशक राकेश अस्थाना ने कार्रवाई की थी। लालू प्रसाद के अलावा इस मामले में उनकी पत्नी राबड़ी देवी और उनके बेटे तेजस्वी यादव का नाम भी दर्ज़ है।

सीबीआई का कहना है कि यह मामला 2006 का है, तब लालू प्रसाद रेल मंत्री थे। उस वक्त रेलवे के राँची और पुरी स्थित दो होटलों के रख-रखाव का टेंडर एक निजी कंपनी सुजाता होटल्स को दे दिया गया था। दोनों होटलों का टेंडर दिए जाने के एवज में प्रेमचंद गुप्ता की कंपनी को दो एकड़ जमीन मिली और बाद में यह कंपनी लालू परिवार को हस्तांतरित कर दी गयी थी।

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