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विपक्षी दलों को एकजुट करने में जुटी कांग्रेस

लोकसभा चुनाव के नतीजे आने में बस कुछ दिन शेष हैं। चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी, कांग्रेस और अलग-अलग राज्यों में चुनाव लड़ रहे राजनीतिक दलों ने सत्ता पाने के लिए पूरा जोर लगा दिया। कयास लगाए जा रहे हैं कि बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन बहुमत के जादुई आँकड़े (272) से दूर रह सकता है। इसे देखते हुए कांग्रेस ने सरकार बनाने के लिए अपनी तैयारियाँ तेज़ कर दी हैं। इसकी कमान यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गाँधी ने अपने हाथ में ले ली है।
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सोनिया गाँधी विपक्षी दलों को एकजुट करने में जुट गईं हैं। बताया जा रहा है कि सोनिया गाँधी ने विपक्ष के तमाम दलों के प्रमुख नेताओं को फ़ोन करके पूछा है कि क्या वे 22, 23 और 24 मई को दिल्ली में हैं। सोनिया के अलावा पार्टी के महासचिव ग़ुलाम नबी आज़ाद ने भी अहम संकेत दिए हैं। आज़ाद ने कहा है कि चुनाव नतीजे के बाद अगर उनकी पार्टी को प्रधानमंत्री पद की पेशकश नहीं की गई तो कांग्रेस इसे मुद्दा नहीं बनाएगी। आज़ाद ने यह भी कहा कि कांग्रेस का एकमात्र लक्ष्य बीजेपी सरकार को सत्ता से हटाना है। हालाँकि अगले ही दिन आज़ाद अपनी बात से पलट गए और उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है। अगर 5 साल तक सरकार चलानी है तो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी को ही इसका मौक़ा मिलना चाहिए।’ आज़ाद के बयान से साफ़ तौर पर समझा जा सकता है कि कांग्रेस विपक्षी दलों के साथ मिलकर मोदी को रोकने की पुरजोर कोशिश करेगी। 
पिछले दिनों आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी से मुलाक़ात की थी। इस दौरान ही दिल्ली में विपक्षी दलों की बैठक करने की योजना बनाई गई थी।

बता दें कि विपक्ष की पूरी कोशिश है कि बीजेपी को किसी भी हालत में सत्ता में न आने दिया जाए। संभावना जताई जा रही है कि अगर कांग्रेस 100-110 सीटों पर जीत हासिल करती है और यूपीए में शामिल दूसरे सहयोगी दलों को 30-40 सीटें मिलती हैं तो इस स्थिति में यूपीए के पास 130-150 सीटें होंगी। इन परिस्थितियों में कांग्रेस बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए तीसरे मोर्चे के नेताओं को समर्थन दे सकती है। 

यहाँ याद दिला दें कि 2004 में कांग्रेस को सिर्फ़ 145 सीटें मिली थीं लेकिन तब भी कांग्रेस ने सहयोगी दलों के साथ मिलकर सफ़लतापूर्वक 5 साल तक सरकार चलाई थी। इसे आधार बनाते हुए कांग्रेस को उम्मीद है कि इस बार भी सभी विपक्षी दल बीजेपी को सरकार में आने से रोकने के लिए एकजुट होंगे।

खब़रों के मुताबिक़, बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए कांग्रेस कर्नाटक की अपनी रणनीति पर काम कर सकती है। बता दें कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बीजेपी को सबसे ज़्यादा सीटें मिली थीं, कांग्रेस दूसरे और जेडीएस तीसरे नंबर पर थी। बीजेपी के पास भी स्पष्ट बहुमत नहीं था। तब बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए जेडीएस की सीटें कम होने के बावजूद कांग्रेस ने जेडीएस को मुख्यमंत्री पद सौंप दिया था। इसी तर्ज पर कांग्रेस विपक्षी दलों से ज़्यादा सीटें जीतने के बावजूद बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए तीसरे मोर्चे के नेताओं को सरकार बनाने के लिए समर्थन दे सकती है। और तीसरा मोर्चा बनाने में जुटे तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर) ने भी कहा है कि वे सरकार बनाने के लिए कांग्रेस से समर्थन ले सकते हैं लेकिन उसे ड्राइविंग सीट नहीं देंगे।
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कांग्रेस के अलावा कुछ नेता ऐसे भी हैं जो ग़ैर कांग्रेस, ग़ैर बीजेपी नेतृत्व वाली सरकार बनाने की तैयारियों में जुटे हुए हैं। इनमें केसीआर का नाम प्रमुख है। केसीआर इस सिलसिले में केरल के मुख्यमंत्री और माकपा नेता पिनाराई विजयन से मुलाकात कर चुके हैं। उन्होंने डीएमके प्रमुख स्टालिन से भी मुलाक़ात की थी लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी।
कुल मिलाकर, कांग्रेस चुनाव नतीजे आने से पहले अपनी तैयारी चाक-चौबंद कर लेना चाहती है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी भी कह चुके हैं कि वह किसी भी हाल में मोदी-शाह की जोड़ी को सत्ता से हटाना चाहते हैं। ग़ुलाम नबी आज़ाद का बयान भी इसी ओर इशारा करता है। देखना होगा कि अगर एनडीए और यूपीए को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो कांग्रेस, बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए तीसरे मोर्चे को समर्थन देने के लिए तैयारी होती है या नहीं। इसके लिए 23 मई का इंतजार करना होगा।  
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