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प्रियंका के राजनीति में आने से क्यों मच गई खलबली?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपनी बहन प्रियंका गाँधी वाड्रा को पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बनाकर पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभारी नियुक्त कर दिया है। वहीं मध्य प्रदेश में पार्टी को जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी तरक्की देते हुए राष्ट्रीय महासचिव बनाकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की कमान सौंप दी है। राहुल गाँधी के इस फ़ैसले के बाद कांग्रेस में जश्न का माहौल है। वरिष्ठ नेताओं से लेकर आम कार्यकर्ताओं तक का जोश बल्लियों उछल रहा है। प्रियंका को महासचिव बनाए जाने की ख़बर के बाद कांग्रेस दफ़्तर में ढोल-नगाड़े से और आतिशबाजी करके कार्यकर्ताओं ने राहुल गाँधी के इस फ़ैसले पर अपनी ख़ुशी का इज़हार किया।

शीला दीक्षित ने इस फ़ैसले को लोकसभा चुनाव में पासा पलटने वाला फ़ैसला क़रार दिया है। वहीं कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला ने कहा है कि राहुल गाँधी के इस फ़ैसले से कांग्रेस कार्यकर्ताओं में नया जोश भर गया है। इसी तरह कांग्रेस के तमाम नेता इस फ़ैसले पर अपनी ख़ुशी का इज़हार कर रहे हैं। ग़ौरतलब है कि कांग्रेस कार्यकर्ता लंबे अरसे से प्रियंका गाँधी से राजनीति में आने का आग्रह करते रहे हैं। और प्रियंका गाँधी हमेशा कार्यकर्ताओं की माँग पर यही कहती रही थी कि वक्त आने पर वह फ़ैसला करेंगी। 

प्रियंका से कांग्रेस को फ़ायदे की उम्मीद

कांग्रेस के तमाम नेताओं को लगता है कि प्रियंका गाँधी के सक्रिय राजनीति में आने से लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ा फ़ायदा होगा। ख़ासकर प्रियंका गाँधी में इंदिरा गाँधी की छवि देखने वाली गाँव-देहात की महिलाएँ टूटकर कांग्रेस के पक्ष में वोट करेंगी। कांग्रेस के इस कदम को ममता बनर्जी और मायावती की काट के रूप में भी देखा जा रहा है। ग़ौरतलब है कि ममता बनर्जी और मायावती राहुल गाँधी के प्रधानमंत्री बनने में सबसे बड़ा रोड़ा बनी हुई हैं। प्रियंका गाँधी को आज भी गाँव-देहात में उनके असली नाम की बजाय इंदिरा गाँधी की पोती के रूप में जाना जाता है। उनकी यही छवि कांग्रेस के लिए फ़ायदेमंद साबित हो सकती है। 

यूपी की राजनीति पर असर

आज प्रियंका गाँधी की राजनीति में कदम रखने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल मच गई है। सपा और बसपा में टिकट पाने से छूट जाने वाले नेताओं की नज़रें अब कांग्रेस के टिकट पर आकर टिक गई हैं। सपा-बसपा के लोकसभा टिकट के दावेदारों ने कांग्रेसी नेताओं से संपर्क करना शुरू कर दिया है। 

  • कांग्रेस के पास पहले ही उत्तर प्रदेश में उम्मीदवारों की कमी है। ऐसे में अगर इन दोनों पार्टियों से मज़बूत उम्मीदवार कांग्रेस में आते हैं तो कांग्रेस फ़ायदा उठा सकती है। अभी तक उत्तर प्रदेश के प्रभारी महासचिव रहे ग़ुलाम नबी आज़ाद ने कुछ दिन पहले बताया था कि उनके पास उत्तर प्रदेश में अभी तक सिर्फ़ 30 सीटों पर मज़बूती से चुनाव लड़ने लायक उम्मीदवार हैं।

प्रियंका के आने से बीजेपी में बेचैनी बढ़ी 

प्रियंका गाँधी के सक्रिय राजनीति में आने के ऐलान से बीजेपी में बेचैनी बढ़ गई है। बीजेपी में पहले से इस बात को माना जाता रहा है कि प्रियंका गाँधी राहुल गाँधी के मुक़ाबले ज़्यादा लोकप्रिय हैं। अगर वह राजनीति में क़दम रखती हैं तो उसे बीजेपी को नुक़सान हो सकता है। इसीलिए बीजेपी के तमाम बड़े नेता और मोदी सरकार के मंत्री उनके ख़िलाफ़ बयानबाज़ी पर उतर आए हैं। मोदी सरकार के क़रीब क़रीब एक दर्ज़न मंत्रियों ने प्रियंका गाँधी के राजनीति में आने पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। बीजेपी इस वक्त वही ग़लती कर रही है जो ग़लती कभी कांग्रेस करती थी। 

कांग्रेस ने भी 2012 के बाद से नरेंद्र मोदी पर निजी हमले किए थे। इसका फ़ायदा बीजेपी को मिला। कांग्रेसी नेताओं को लगता है कि बीजेपी की तरफ़ से जितने निजी हमले सोनिया, प्रियंका गाँधी और राहुल गाँधी पर होंगे, चुनाव में कांग्रेस को उतना ही फ़ायदा मिलेगा।

राहुल गाँधी ने चुपचाप किया धमाका

राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर बड़ी चर्चा है कि राहुल गाँधी ने इतना बड़ा फ़ैसला बहुत ही खामोशी के साथ किया। हालाँकि राहुल गाँधी ने इस बात के संकेत उसी वक्त दे दिए थे जब उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन का ऐलान हुआ था और कांग्रेस को इस गठबंधन से अलग रखा गया था सपा-बसपा गठबंधन पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्होंने दुबई में कहा था कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन करेगी और चौंकाने वाले नतीजे आएँगे।

बड़े फ़ैसलों का एलान खामोशी से 

कांग्रेस में बड़े फ़ैसले खामोशी से करने की परंपरा रही है। साल 2004 में जब राहुल गाँधी को अमेठी से चुनाव लड़ाने का फ़ैसला किया गया था तो उस फ़ैसले के लिए एक दिन पहले तक किसी को भनक नहीं थी। जिस दिन ऐलान हुआ उस दिन तब कांग्रेस महासचिव रहींं अंबिका सोनी प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आई थीं।
  • पत्रकारों के लिए यह चौंकाने वाली बात थी कि पार्टी की वरिष्ठ नेता उम्मीदवारों की लिस्ट पढ़कर सुनाई जा रही थींं। आमतौर पर कांग्रेस में लिस्ट जारी करने की परंपरा रही है। पत्रकार तब चौंंके जब सोनिया गाँधी का नाम अमेठी के बजाय रायबरेली से लिया गया और सबसे आखिर में अमेठी से राहुल गाँधी का नाम पुकारा गया।

प्रियंका के सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं 

प्रियंका के सामने चुनौतियाँ कम नहीं हैं। कांग्रेस में भले ही प्रियंका गाँधी को महासचिव जैसा बड़ा पद दे दिया गया है लेकिन अभी उनके राजनीतिक कौशल की परीक्षा होना बाक़ी है। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में पर्दे के पीछे से पार्टी की कमान प्रियंका गाँधी ने संभाली थी लेकिन चुनाव में कांग्रेस का बँटाधार हो गया था। कांग्रेस विधानसभा में दहाई का आँकड़ा भी पार नहीं कर पाई थी। उसके बाद से प्रियंका कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय नहीं थींं। पार्टी में भी चर्चा थी कि प्रियंका गाँधी को राजनीति में इसलिए नहीं लाया जा रहा कि इससे कांग्रेस में दो शक्ति केंद्र बन जाएँगे। इससे राहुल गाँधी को नुक़सान होगा। पार्टी कार्यकर्ताओं का एक धड़ा इस बात की माँग करता रहा है कि प्रियंका गाँधी को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे लाया जाए। कांग्रेस के सामने इस दुविधा को ख़त्म करना सबसे बड़ी चुनौती है।

राजनीतिक हलकों में माना जा रहा है कि कांग्रेस ने प्रियंका गाँधी के रूप में अपने तरकश का आख़िरी तीर भी छोड़ दिया है। अगर यह तीर निशाने पर लगा तो कांग्रेस धमाकेदार तरीक़े से केंद्र की सत्ता में लौट सकती है। अगर यह निशाने पर नहीं लगा तो यही कांग्रेस के ताबूत की आख़िरी कील भी साबित हो सकता है।

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यूसुफ़ अंसारी
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