मोहन यादव परिवार जमीन विवाद पर 'द इंडियन एक्सप्रेस' की पड़ताल और कांग्रेस के हमलों के बावजूद आख़िर क्यों कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और बीजेपी सांसद-विधायक सीएम के समर्थन में नहीं उतरे? पढ़िए भोपाल से संजीव श्रीवास्तव का विशेष विश्लेषण।
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके परिवारजन ‘मुश्किल’ में हैं। इंडियन एक्सप्रेस द्वारा मुख्यमंत्री एवं उनके परिवारजनों के कथित ‘भूमि प्रेम’ (सैकड़ों एकड़ जमीन खरीदी) को लेकर की बड़ी छानबीन के साथ, एक मेगा स्टोरी की गई है। इस मेगा स्टोरी के बाद से कांग्रेस ने हमला बोल रखा है। जमीन खरीदी संबंधी ब्यौरे को लेकर सवाल किए जा रहे हैं। जवाब मांगे जा रहे हैं।
बीते मंगलवार से ये मसला न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि देश भर के मीडिया में सुर्खियों में बना हुआ है। आरोप है कि गोदी मीडिया ने खबर को अंडरप्ले किया है। सोशल मीडिया इस खबर से जुड़ी कहानियां सतत कर रहा है। कांग्रेस के साथ विपक्ष को पूरा स्थान ये मीडिया दे रहा है।
तीन दिन बीत चुके हैं, लेकिन मध्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष हेमंत खंडलेवाल और मोहन यादव काबीना के दो-तीन सदस्यों के अतिरिक्त, पूरी मुखरता एवं ताकत के साथ अब तक भाजपा के नेतागण सामने आते नजर नहीं आए हैं।
विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल जैसे नेता चूप!
मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार में दो डिप्टी सीएम जगदीश देवड़ा एवं राजेन्द्र शुक्ल, सीनियर मिनिस्टर कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल, विजय शाह और ऐसे अन्य वरिष्ठ मंत्रियों की ‘चुप्पी’ पर सवाल उठ रहे हैं।
मुख्यमंत्री एवं उनके परिवार पर लगे जमीन खरीदी के आरोपों में उज्जैन मुख्य केन्द्र है। उज्जैन से ही मोहन यादव विधायक हैं। उज्जैन जिले में कुल 7 विधायक हैं। सभी भाजपा के हैं, खुद मोहन यादव खामोश बने हुए हैं। उज्जैन के 6 अन्य विधायकों में भी किसी का कोई बयान अब तक देखने में नहीं आया है। उज्जैन से भाजपा के सांसद अनिल फिरोजिया और राज्यसभा के सदस्य बाल योगी उमेश नाथ का भी अब तक कोई बयान नहीं आया है।
मध्य प्रदेश राज्य विधानसभा में विधायकों की कुल संख्या 230 है। इनमें 164 भाजपा के हैं। उज्जैन के अलावा अन्य क्षेत्र का कोई विधायक भी मुख्यमंत्री का बचाव करता अब तक नजर नहीं आया है। ऐसे ही राज्य की कुल 29 लोकसभा सीटों (सभी पर भाजपा काबिज है) में अन्य (उज्जैन के अलावा) सांसद भी मुख्यमंत्री के पक्ष में अब तक मैदान में उतरते नजर नहीं आए हैं।उज्जैन भाजपा जिला इकाइयों के प्रमुख चेहरों, संघ से जुड़े नेताओं, भाजपा विभिन्न संगठनों के पदाधिकारियों एवं पार्टी के अन्य अनुषांगिक संगठनों के मुखिया एवं परिचित चेहरों का भी, अपने ही मुख्यमंत्री के पक्ष में, मैदान में नहीं उतरना चर्चा का विषय बना हुआ है।
सीनियर जर्नलिस्ट अरुण दीक्षित ‘सत्य हिन्दी’ के प्रश्न पर, दिलचस्प सवाल उछाल रहे हैं, वे फरमा रहे हैं - ‘मुख्यमंत्री पद पर्ची से मिला है। विधायकों का विश्वास हासिल नहीं है। मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री के फैसलों पर पहले से ऊंगलियां उठने की खबरें आती रही हैं, सांसद हलकान हैं - लिहाजा कोई साथ क्यों देगा?’
भाजपा के एक नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा, ‘उज्जैन के पूर्व सांसद और मौजूदा विधायक चिंतामणि मालवीय के बयानों को सुन लीजिये, सच्चाई सामने आ जायेगी।’
वे ये भी याद दिला रहे हैं, ‘लैंड पुलिंग स्कीम के दरमियान उज्जैन में क्या कुछ हुआ था। कैसे किसानों पर मुकदमे लादे गए। संघ से जुड़े लोगों को भी नहीं बख्शा गया। बड़े पदाधिकारियों के साथ एवं दबाव के कारण दिल्ली को बैकफुट पर लौटना पड़ा था। योजना वापस हुई थी, कोई भूला नहीं है।’
‘इंडियन एक्सप्रेस’ की विस्तृत पड़ताल और स्टोरी के बाद कांग्रेस ने पहले भोपाल और बाद में दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस की है। कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा और मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष जीतू पटवारी ने दिल्ली की साझा प्रेस कांफ्रेंस में तमाम आरोप दोहराते हुए, कई नए आरोप भी लगाए हैं। उज्जैन के एक ट्रस्ट को 500 करोड़ की जमीन कथित तौर पर एक रूपए में दे देने का नया आरोप भी शामिल है।
मोहन यादव तीसरे मुख्यमंत्री!
मोहन यादव, मध्य प्रदेश के ऐसे तीसरे मुख्यमंत्री हो गए हैं, जिन पर पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार के बेहद गंभीर आरोप लगे हैं। परिवारजन भी कठघरे में हैं। मोहन यादव के पहले शिवराज सिंह चौहान और उनके परिवार पर ऐसे आरोप लगे थे।
मुख्यमंत्री रहते शिवराज सिंह चौहान पहले डंपर कांड में घिरे थे और बाद में उनके कार्यकाल में हुए व्यापमं घोटाले कांड में मुख्यमंत्री के साथ उनकी पत्नी साधना सिंह को कठघरे में खड़ा किया गया था। हालाँकि बाद में शिवराज एवं बीजेपी का दावा रहा था कि जांच में सभी आरोप गलत निकले हैं। विपक्ष आज भी दावा करता है कि सही तरीके से जांच हुई होती तो कोई भी मगरमच्छ नहीं बचता।
भाजपा सरकार के इन दो मुख्यमंत्रियों के पहले कांग्रेस सरकार में अर्जुन सिंह और उनका परिवार चुरहट लाटरी कांड में कठघरे में रहा था। चुरहट लाटरी की राशि के भारी दुरूपयोग के आरोप रहे थे। केरवा कोठी (महल) इसी पैसे से बनने के आरोप भी तत्कालीन विपक्षी नेता लगाते रहे थे। चुरहट लाटरी कांड मसला मरते दम तक अर्जुन सिंह पर चस्पा रहा।
अर्जुन सिंह के मुख्यमंत्रित्वकाल में आसवानी कांड भी हुआ था। इस कांड में भी मुख्यमंत्री कठघरे में रहे थे। कोर्ट के आदेश के बाद अर्जुन सिंह को मुख्यमंत्री पद भी छोड़ना पड़ा था।