बीएमसी चुनाव 2026 के नतीजों को पहली नज़र में देखें तो तस्वीर साफ लगती है। बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन गई, सत्ता का संतुलन बदल गया और मुंबई की राजनीति में नया दौर शुरू हो गया। लेकिन आंकड़ों की परतें खोलते ही इस जीत के भीतर छिपा एक अहम राजनीतिक संकेत उभरकर सामने आता है।
बीजेपी ने इस बार बीएमसी में 89 सीटें जीती हैं। पिछली बार, जब शिवसेना एकजुट थी और बीजेपी उसके साथ सत्ता संघर्ष में थी, तब पार्टी के खाते में 82 सीटें आई थीं। यानी नौ साल बाद भी बीजेपी की बढ़त महज 7 सीटों की है। इसी आंकड़े में बीएमसी चुनाव की असली कहानी छिपी है। शिवसेना यूबीटी ने 66 सीटें जीतीं, जबकि उसकी सहयोगी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को 6 सीटें मिलीं।
बीजेपी की जीत को अक्सर ‘ऐतिहासिक’ कहा जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पार्टी मुंबई में अपने वोट और सीट आधार का नाटकीय विस्तार नहीं कर पाई। सत्ता के अनुकूल माहौल, केंद्र और राज्य में सरकार, विशाल संसाधन और पूरी चुनावी मशीनरी के बावजूद बीजेपी की सीटों में बढ़ोतरी सीमित रही। यह संकेत देता है कि मुंबई का मतदाता अब भी पूरी तरह बीजेपी के साथ शिफ्ट नहीं हुआ है। शहर पर शिवसेना यूबीटी और उसके प्रमुख उद्धव ठाकरे की पकड़ बरकरार है।
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सबसे अहम बात यह है कि यह चुनाव टूटी हुई शिवसेना के दौर में हुआ। इससे पहले पार्टी दो हिस्सों में बंटी हुई थी। एक तरफ एकनाथ शिंदे का गुट सत्ता में, दूसरी तरफ उद्धव ठाकरे की शिवसेना (UBT) विपक्ष में। इसके बावजूद उद्धव ठाकरे का प्रभाव खास तौर पर मराठी बहुल इलाकों, मध्य मुंबई और दक्षिण मुंबई के हिस्सों में साफ दिखा। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, अगर शिवसेना विभाजित न होती, तो तस्वीर कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकती थी। अब बीजेपी के बाद सीटों के मामले में शिवसेना यूबीटी है। शिंदे की सेना तीसरे नंबर पर है। इस तरह शिवसेना पार्टी टूटी, संगठन कमजोर पड़ा, संसाधन सीमित रहे, फिर भी बीजेपी की बढ़त सिर्फ 7 सीटों तक सिमट गई। इस बात को बीजेपी नेता समझ रहे हैं लेकिन स्वीकार करने से बच रहे हैं। मीडिया में बीजेपी के ऐतिहासिक जीत की चर्चा है।
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि अगर विपक्षी दल रणनीतिक रूप से एकजुट होते, तो परिणाम काफी अलग हो सकते थे। जानकारों के अनुसार: कांग्रेस और शिवसेना (UBT) के अलग-अलग चुनाव लड़ने से विपक्षी वोटों का बंटवारा हुआ। अगर ये दोनों दल एकजुट होकर मैदान में उतरते, तो कई वार्डों में जहां हार-जीत का अंतर बेहद कम रहा है, वहां बाजी पलट सकती थी। संयुक्त रूप से चुनाव लड़ने की स्थिति में महाविकास अघाड़ी (MVA) न केवल बीजेपी को कड़ी टक्कर देती, बल्कि बीएमसी की सत्ता पर काबिज होने के करीब भी पहुंच सकती थी।

बीजेपी जयचंदों के सहारे चुनाव जीतती हैः संजय राउत

शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने कहा, "भाजपा 'जयचंद' बनाकर चुनाव जीतती है। वरना भाजपा की ताकत क्या है? हर राज्य में, हर शहर में, वे हर पार्टी को तोड़कर 'जयचंद' खड़ा करते हैं और चुनाव जीतते हैं। उनकी ताकत शून्य है। उपमुख्यमंत्री (एकनाथ शिंदे) की ताकत क्या है? जब तक वे सत्ता में हैं, लोग उन्हें सलाम करेंगे; वरना लोग उनकी गाड़ियों पर जूते फेंकेंगे।"

हमारे पास एक ऐसा फॉर्मूला है जिससे हम बीजेपी को बीएमसी में सत्ता में आने से रोक सकते हैं, लेकिन हम अभी ऐसा नहीं कर रहे हैं।
शिवसेना यूबीटी सांसद संजय राउत
बीएमसी चुनाव में शिवसेना यूबीटी प्रमुख विपक्षी पार्टी बनकर उभरी है
बीएमसी के नतीजों पर राउत ने कहा, "मुख्यमंत्री के तौर पर उनके पास असीमित शक्ति है; उनके पास पुलिस है, कई अन्य लोग और संसाधन हैं, पैसा है, सब कुछ है। अगर कोई और मुख्यमंत्री होता, तो भी नतीजे वही होते। सबसे बड़ी लड़ाई मुंबई में थी। हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि मुंबई में भाजपा जीत गई। मुकाबला बराबरी का है। एमएनएस को कम सीटें मिलीं; मेरे हिसाब से उन्हें करीब 15 सीटें मिलनी चाहिए थीं। हम बहुत कम अंतर से 10 से 15 सीटें हार गए। लेकिन बीएमसी में विपक्ष की ताकत सत्ताधारी दल के बराबर है। हमारे 105 लोग अंदर हैं। ये लोग क्या करेंगे? ये मुंबई को बेच नहीं सकते। हम वहां डटे हुए हैं। चाहे हमें अपनी जान ही क्यों न देनी पड़े, हम इन ठेकेदारों के शासन को खत्म कर देंगे।"

शिवसेना यूबीटी की प्रतिक्रिया

बीएमसी पर अपनी पकड़ खोने के एक दिन बाद, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनाव परिणामों पर अपनी पहली प्रतिक्रिया जारी की है। X पर एक तीखी पोस्ट में, शिवसेना यूबीटी ने दृढ़ रुख अपनाते हुए कहा कि महाराष्ट्र में राजनीतिक लड़ाई तब तक जारी रहेगी "जब तक मराठी व्यक्ति को वह सम्मान नहीं मिल जाता जिसका वह हकदार है।" पार्टी ने सोशल मीडिया पर कहा, "यह लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है... यह तब तक जारी रहेगी जब तक मराठी व्यक्ति को वह सम्मान नहीं मिल जाता जिसका वह हकदार है!" यह संकेत देते हुए कि नगर निगम चुनाव में मिली हार के बावजूद मराठी पहचान का मुद्दा उसके राजनीतिक संदेश का केंद्र बना रहेगा। पोस्ट से यह भी संकेत मिलता है कि यूबीटी महाराष्ट्र में राजनीतिक माहौल को गर्म रखने की योजना बना रही है, और बीएमसी परिणाम को अंत नहीं, बल्कि मुंबई की नगर निगम राजनीति में प्रासंगिकता और प्रभाव के लिए एक लंबी लड़ाई का एक और अध्याय मान रही है।

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बहरहाल, बीएमसी के 118 वार्डों में भाजपा-शिव सेना (शिंदे) गठबंधन विजयी रहा है। भाजपा ने 89 वार्डों में जीत हासिल की, जबकि एकनाथ शिंदे की शिव सेना ने 29 वार्डों में जीत दर्ज की। बहुमत का आंकड़ा 114 है। शिवसेना यूबीटी और मनसे 72 वार्डों में ही जीत हासिल कर पाए। उद्धव ठाकरे की शिव सेना ने 66 वार्डों में जीत दर्ज की, जबकि राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) ने छह वार्डों में जीत हासिल की। बीएमसी, जिसका वार्षिक बजट 74,400 करोड़ रुपये से अधिक है, में कई वर्षों के अंतराल के बाद हुए चुनावों में 227 सीटों के लिए 1,700 उम्मीदवार मैदान में थे।