उद्धव और राज ठाकरे के नेतृत्व वाले शिवसेना यूबीटी-एमएनएस गठबंधन को बीएमसी चुनावों में बड़ा झटका लगा है क्योंकि 'मराठी मानुष बचाओ' का नारा मुंबई में शहरव्यापी समर्थन हासिल करने में नाकाम रहा। उन्हें सिर्फ पारंपरिक गढ़ों में समर्थन मिला।
शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के संयुक्त नारे ‘मराठी मानुष बचाओ’ को केवल उनके पारंपरिक गढ़ों में ही समर्थन मिल सका। मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनाव के नतीजों में ठाकरे बंधुओं के इस साझा प्रयास को बड़ा झटका लगा है और वे बीएमसी पर नियंत्रण हासिल करने में नाकाम रहे।
उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) और राज ठाकरे की मनसे 20 साल बाद एक साथ आई थीं और उन्होंने मुंबई व मराठी मानुष के संरक्षण के नाम पर यह चुनाव लड़ा। खुद उद्धव ठाकरे ने सितंबर में कहा था कि यह चुनाव ठाकरे ब्रांड की असली परीक्षा होगा। लेकिन ‘मराठी मानुष बचाओ’ मुद्दे का असर सीमित ही रहा। कई मराठी मतदाताओं ने ठाकरों का साथ दिया, बावजूद इसके यह ब्रांड इतना प्रभावी साबित नहीं हो सका कि बीएमसी दोबारा जीती जा सके।
ठाकरे परिवार को दक्षिण और मध्य मुंबई के साथ-साथ पश्चिमी और पूर्वी उपनगरों के कुछ पारंपरिक गढ़ों में सफलता मिली। दादर–माहिम, वरली, दिंडोशी, भांडुप, विक्रोली और बांद्रा पूर्व जैसे इलाकों में उन्होंने अपनी पकड़ बनाए रखी। हालांकि, कोलाबा, बांद्रा पश्चिम, अंधेरी पश्चिम, बोरीवली और दहिसर जैसे क्षेत्रों में वे भाजपा की बढ़त को रोकने में असफल रहे। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, पश्चिमी उपनगरों के कई उच्चवर्गीय मराठी मतदाताओं ने भाजपा को प्राथमिकता दी।
शिवसेना (यूबीटी) ने मुंबई में 163 सीटों पर और मनसे ने 53 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। वहीं भाजपा ने 137 और शिंदे गुट की शिवसेना ने 90 सीटों पर चुनाव लड़ा। नतीजों में शिवसेना (यूबीटी) का प्रदर्शन उम्मीद से कमजोर रहा, जबकि मनसे पूरी तरह धराशायी हो गई। उसे 6 सीटें मिलीं। जिससे ठाकरे गुट की कुल संख्या और घट गई।
मुस्लिम मतदाताओं ने शिवसेना (यूबीटी) को समर्थन दिया और पार्टी के दो उम्मीदवार जीतने में सफल रहे। हालांकि, यह समर्थन 2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों जितना नहीं था, क्योंकि इस बार कांग्रेस अलग से चुनाव मैदान में थी।
एक राजनीतिक विश्लेषक के अनुसार, “लोकसभा और विधानसभा चुनावों से मुंबई में किस शिवसेना की ताकत है, यह साफ हो चुका था। लेकिन बीएमसी चुनाव कहीं ज्यादा कठिन थे। ठाकरे बंधुओं के साथ आने से ठाकरे ब्रांड की असली परीक्षा हुई। मराठी मानुष के मुद्दे पर लोगों ने ध्यान दिया, लेकिन वह पर्याप्त नहीं रहा। यह दोनों सेनाओं की निर्णायक लड़ाई थी, जिसने मुंबई की राजनीति की दिशा और उद्धव–राज के भविष्य का फैसला किया। राज ठाकरे का राजनीतिक करियर समाप्ति की ओर जा सकता है, जबकि उद्धव ठाकरे मुंबई में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका निभा सकते हैं।”
कुल मिलाकर, ठाकरे परिवार की संयुक्त गठबंधन को सीमित सफलता ही मिली और ‘मराठी मानुष’ का नारा शहर के व्यापक मतदाता वर्ग में कोई खास प्रभाव नहीं छोड़ सका। भाजपा–शिंदे गुट ने 118 से अधिक सीटें जीतीं (भाजपा 89, शिंदे गुट की शिवसेना 29), जिससे मुंबई में 25 से अधिक वर्षों से चले आ रहे ठाकरे परिवार के वर्चस्व का अंत हो गया।
क्या उद्धव-राज ठाकरे का गठबंधन टिकेगा
यह गठबंधन 30 वर्षों बाद बना था और मुख्य रूप से बीएमसी चुनाव के लिए था। नतीजों के बाद कई विश्लेषकों का मानना है कि यह एक तरह की ‘अंतिम लड़ाई’ थी और आगे दोनों दलों का साथ रहना मुश्किल हो सकता है। महाविकास आघाड़ी (MVA) में कांग्रेस के साथ वापसी की संभावना तो है, लेकिन कांग्रेस राज ठाकरे को स्वीकार करने के मूड में नहीं दिखती, खासकर उनकी उत्तर भारतीय विरोधी छवि के कारण। उद्धव ठाकरे और कांग्रेस का गठबंधन ही मुंबई में कामयाब हो सकता है।
कुल मिलाकर, ठाकरे गठबंधन को सीमित सफलता ही मिली है और इसके लंबे समय तक टिके रहने की संभावना कम दिखती है। मुंबई की राजनीति में अब ‘ठाकरे ब्रांड’ की जगह महायुति ने ले ली है। ऐसे में दोनों दलों को अपनी-अपनी संगठनात्मक मजबूती पर नए सिरे से काम करना होगा। भविष्य पूरी तरह अनिश्चित है और मौजूदा तस्वीर निराशाजनक दिखाई देती है।