बॉम्बे हाई कोर्ट ने सोहराबुद्दीन शेख फर्जी एनकाउंटर मामले में 22 आरोपियों के बरी होने के फ़ैसले को बरकरार रखा है। इन 22 आरोपियों में से 21 पुलिस वाले हैं। इस मामले में आरोपियों पर सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति की कथित फर्जी मुठभेड़ का आरोप था। सोहराबुद्दीन के दो भाइयों ने 2019 में हाई कोर्ट में अपील की थी, लेकिन सात साल बाद कोर्ट ने उन्हें खारिज कर दिया।

यह फ़ेक एनकाउंटर का मामला 2005-06 का है। सीबीआई के मुताबिक़, 23 नवंबर 2005 को सोहराबुद्दीन शेख, उनकी पत्नी कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति हैदराबाद से महाराष्ट्र के सांगली जा रहे थे। वे एक लग्जरी बस में सवार थे। आरोप है कि गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश के पुलिस अधिकारियों ने उन्हें अगवा कर लिया। सीबीआई का कहना था कि सोहराबुद्दीन और कौसर बी को गुजरात के फार्महाउस में गैरकानूनी तरीके से रखा गया। तीन दिन बाद तुलसीराम को राजस्थान के भीलवाड़ा से गिरफ्तार दिखाया गया।

2005 में सोहराबुद्दीन को मुठभेड़ में मार डाला

26 नवंबर 2005 को अहमदाबाद में सोहराबुद्दीन की कथित फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी गई। उसी महीने उनकी पत्नी कौसर बी को भी मार दिया गया और उनका शव गायब कर दिया गया। एक साल से ज्यादा समय बाद तुलसीराम प्रजापति को भी गुजरात में दूसरी कथित फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया। सीबीआई ने दावा किया कि गुजरात और राजस्थान के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने साज़िश रची और सोहराबुद्दीन को ख़त्म करने के लिए तुलसीराम का इस्तेमाल किया।

सीबीआई स्पेशल कोर्ट का 2018 का फ़ैसला क्या?

दिसंबर 2018 में मुंबई की स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने सभी 22 आरोपियों को बरी कर दिया था। कोर्ट के जज एसजे शर्मा ने 358 पन्नों के फ़ैसले में कहा था, 'सीबीआई कोई ठोस दस्तावेजी या सबूत नहीं पेश कर सकी जो साज़िश साबित कर सके। सोहराबुद्दीन और तुलसीराम की मौत को हत्या साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे।' इसने आगे कहा, 'सीआरपीसी की धारा 197 के तहत जरूरी मंजूरी नहीं ली गई थी। 200 से ज्यादा गवाहों में से 92 गवाह मुकर गए।' 

ट्रायल कोर्ट ने यह भी कहा कि सीबीआई ने सच्चाई ढूंढने की बजाय पहले से तय थ्योरी पर चलकर केस बनाया। राजनीतिक नेताओं को फंसाने के लिए सबूत गढ़े गए। कोर्ट ने सोहराबुद्दीन को खतरनाक अपराधी बताया, जिन पर गुजरात और राजस्थान में हत्या, फिरौती और अपहरण जैसे कई मामले थे।

हाई कोर्ट ने क्यों रखा फ़ैसला बरकरार?

सोहराबुद्दीन के भाई रुबाबुद्दीन और नयाबुद्दीन ने अपील में कहा कि स्पेशल कोर्ट का फ़ैसला सबूतों के ख़िलाफ़ है। उन्होंने दावा किया कि कई गवाहों के बयान कोर्ट में पेश नहीं किए गए और नहीं मुकरने वाले गवाहों को गलत तरीके से खारिज किया गया। लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस चंद्रशेखर की बेंच ने सभी दलीलें सुनने के बाद अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने पाया कि स्पेशल कोर्ट का फ़ैसला सही था।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने फ़ैसले में कहा कि सीबीआई ने भी स्पेशल कोर्ट के फ़ैसले को स्वीकार कर लिया था। इसने कहा कि आरोपियों के खिलाफ कोई सीधा सबूत नहीं था जो साजिश साबित कर सके और गवाहों के बयान विश्वसनीय नहीं पाए गए।

शोहराबुद्दीन केस की जाँच कैसे चली?

सबसे पहले गुजरात एटीएस और सीआईडी ने जांच की। 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने केस सीबीआई को सौंप दिया और ट्रायल को मुंबई शिफ्ट कर दिया। सीबीआई के अनुसार आरोपी पुलिसकर्मियों ने दावा किया था कि सोहराबुद्दीन शेख लश्कर-ए-तैयबा का सदस्य था और 26 नवंबर 2005 को एक मुठभेड़ में मारा गया था। पुलिसकर्मियों ने यह भी दावा किया था कि वह गुजरात में एक 'बड़े राजनीतिक नेता' की हत्या करने के लिए आया हुआ था।

शेख के भाई रुबाबुद्दीन ने 2006 में भारत के मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र लिखकर इस मुठभेड़ की जांच की मांग की थी, जिसका उन्होंने दावा किया था कि वह एक 'फर्जी मुठभेड़' थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जाँच का आदेश दिया था। जाँच के दौरान सीबीआई ने कहा था कि गुजरात के पुलिसकर्मी वीएल सोलंकी ने 18 दिसंबर 2006 को प्रजापति से पूछताछ करने की अनुमति मांगी थी, लेकिन ठीक दस दिन बाद 28 दिसंबर 2006 को प्रजापति भी गुजरात में ही एक कथित फर्जी मुठभेड़ में मारा गया। प्रजापति की मां नर्मदाबाई ने भी सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर जांच की मांग की थी।

इस मामले में इतना होने के बावजूद ट्रायल कोर्ट में मामला टीक नहीं सका। 21 दिसंबर 2018 को सभी आरोपियों के बरी होने के साथ मुकदमा ख़त्म हो गया। मुकदमे के दौरान जिन 210 गवाहों से पूछताछ की गई उनमें से 92 गवाह अपने बयान से पलट गए थे।
2014 से 2018 के बीच 38 आरोपियों में से 16 को डिस्चार्ज कर दिया गया था। इनमें अमित शाह, कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी और राजस्थान के पूर्व गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया भी शामिल थे।

सोहराबुद्दीन फ़ेक केस अहम क्यों है?

यह केस भारत में फर्जी मुठभेड़ की राजनीति का बड़ा उदाहरण बन गया। एक तरफ पुलिस इसे आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई बताती है, तो दूसरा पक्ष इसे राजनीतिक साज़िश कहता है। अब हाई कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद मामले में नया मोड़ आ गया है। सोहराबुद्दीन के परिवार के लिए यह बड़ा झटका है, जबकि आरोप मुक्त हुए पुलिस अधिकारियों के लिए राहत की बात है। हालाँकि, सोहराबुद्दीन के परिवार के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का मौक़ा है।