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सहकारी बैंक घोटाला: अजित पवार सहित 51 नेताओं पर होगी एफ़आईआर

महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक यानी एमएससी के हज़ारों करोड़ रुपये के घोटाले के मामले में एक साथ 51 नेताओं पर एफ़आईआर दर्ज की जाएगी। बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को पाँच दिन के अंदर केस दर्ज करने का आदेश दिया। अदालत एक याचिका की सुनवाई कर रही थी। कोर्ट के आदेश के बाद अब पूर्व उप-मुख्यमंत्री व राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता अजित पवार, पूर्व सांसद, उप-मुख्यमंत्री तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी छोड़ बीजेपी में शामिल हुए विजयसिंह मोहिते पाटील, पूर्व सांसद और शिवसेना नेता आनंद राव अडसूल, शिवाजी राव नलावडे, राकांपा विधायक दिलीप सोपल, जो अब बीजेपी में हैं, सहित 51 नेताओं के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज होगी।

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इस घोटाले के संबंध में नाबार्ड, सहकारिता व चीनी आयुक्त तथा सीएजी यानी कंपट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल की रिपोर्ट के बाद भी आरोपियों के ख़िलाफ़ कोई मामला दर्ज नहीं किया गया था। उसका कारण यही हो सकता है कि आरोपियों की जो सूची है उसमें सत्ता और विपक्ष दोनों ही तरफ़ के नेताओं के नाम हैं। इस प्रकरण को लेकर लोकसभा चुनाव से पहले और अब विधानसभा चुनाव के पहले कई नेताओं और अजित पवार तक पर दबाव बनाने का खेल हुआ। कई नेता आज सत्ताधारी दल की शरण में भी पहुँच चुके हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में यह बड़ा घोटाला है, लेकिन हमाम में सब नंगे की तरह इसमें भी हर दल का कहीं न कहीं कोई तार जुड़ा है, लिहाज़ा चुनावों में यह मुद्दा कितना उठेगा यह कहा नहीं जा सकता। 

इस मामले की सुनवाई करते हुए इससे पहले 1 अगस्त को भी अदालत ने सवाल उठाया था। अदालत ने राज्य सरकार से पूछा था की महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक के करोड़ों रुपये के घोटाले के मामले में तत्कालीन संचालकों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज क्यों नहीं किया गया? महाराष्ट्र में जब बीजेपी विपक्ष में थी तब इस घोटाले के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद फडणवीस सरकार ने कोई भी कार्रवाई नहीं की। अदालत ने कहा था कि राजनेता और सरकारी अधिकारी भ्रष्टाचार के अपराध के आरोप क्यों नहीं लगाते? अपराध दर्ज करने से कौन पुलिस को रोक रहा है? न्यायमूर्ति सत्यरंजन धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति संदीप शिंदे की खण्डपीठ ने इस मामले में मुंबई पुलिस के आर्थिक अपराध जाँच विभाग के पुलिस उपायुक्त को सही तरीक़े से काम करते हुए कोर्ट के आगे पेश होने का निर्देश दिया है। 

1961 में स्थापित महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक के निदेशक मंडल और अध्यक्ष ने कुछ कपास मिलों और चीनी कारख़ानों को करोड़ों रुपये के ऋण वितरित किए। इस क़र्ज़ को न चुकाने के कारण बैंक को भारी नुक़सान हुआ है।

निदेशक मंडल में अजित पवार, हसन मुश्रीफ़, मधुकर चव्हाण, कांग्रेस के नेता और राकांपा और शिवसेना के आनंदराव अडसुल शामिल थे। इस संबंध में सुरिंदर अरोड़ा नामक एक आरटीआई कार्यकर्ता ने 2015 में एडवोकेट सतीश तलेकर के माध्यम से उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी। याचिका में माँग की गई कि सीबीआई की जाँच की जाए और संबंधित पर कड़ी कार्रवाई की जाए। हालाँकि, मामले की जाँच जारी है और कोई अपराध दर्ज नहीं किया गया है।

क्लोजर रिपोर्ट की थी तैयारी

इससे पहले सरकारी वकील ने न्यायमूर्ति एससी धर्माधिकारी व न्यायमूर्ति एसके शिंदे की खंडपीठ के सामने कहा कि मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने बैंक से जुड़े मामले की जाँच सरकार के अलग-अलग विभाग से मिली जानकारी के आधार पर पूरी कर ली है। इस रिपोर्ट के अनुसार, चूँकि इस मामले में कोई अपराध नहीं हुआ है, इसलिए अब वह आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 169 के तहत रिपोर्ट दायर करने की तैयारी में है।

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लेकिन याचिकाकर्ता के वकील एस.बी. तलेकर ने कहा कि पुलिस ने इस प्रकरण को लेकर मेरे मुवक्किल का बयान दर्ज किया है लेकिन बैंक घोटाले से जुड़े आरोपों को लेकर एफ़आईआर दर्ज नहीं की है। इस पर खंडपीठ ने कहा कि पुलिस एफ़आईआर दर्ज किए बिना कैसे मामले को बंद करने के लिए रिपोर्ट दायर कर सकती है। वर्ष 1961 में स्थापित महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक के संचालक मंडल व अध्यक्ष ने सात टेक्सटाइल मिल व शक्कर कारख़ानों को करोड़ों रुपए का क़र्ज़ दिया था। पर इस क़र्ज़ की वसूली नहीं की गई जिससे बैंकों की हालत खस्ताहाल हो गई। इसी मामले में फिर घपले के आरोप लगे।
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