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अर्णब मामला: महाराष्ट्र में मीडिया की आज़ादी पर कौन लगा रहा है अंकुश?

महाराष्ट्र में क्या प्रेस की आज़ादी पर कुठाराघात हो रहा है? क्या मीडिया कर्मियों पर उद्धव ठाकरे सरकार नाजायज दबाव डाल रही है? या क्या लोगों की सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति पर भी पहरा लगा दिया गया है? ये सारे सवाल एकाएक उस समय चर्चा में आ गए जब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और विरोधी पक्ष के नेता देवेंद्र फडणवीस ने इस आशय का एक ज्ञापन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को सौंपा और उनसे माँग की कि वे राज्य सरकार को इस बारे में निर्देश दें। फडणवीस के इस ज्ञापन के बाद सत्ताधारी दल के नेताओं की तरफ़ से ही नहीं, मीडिया कर्मियों की भी बयानबाज़ी शुरू हो गयी।

दरअसल, रिपब्लिक टेलीविजन चैनल के मालिक अर्णब गोस्वामी से मुंबई पुलिस द्वारा की गयी पूछताछ को ज्ञापन देने के बाद देवेंद्र फडणवीस ने मीडिया के सामने प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा, ‘महाराष्ट्र सरकार मीडिया पर दबाव बना रही है, लिखने और बोलने पर पाबंदी लगा रही है, एक तरह से प्रदेश में यह अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति है। छोटे से गुनाह के लिए पत्रकार से 12 घंटे पुलिस पूछताछ कर रही है। सोशल मीडिया पर लिखने पर उनके ख़िलाफ़ मुक़दमे दायर किये जा रहे हैं’। 

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‘सत्य हिंदी’ ने इस बारे में राज्यसभा सांसद और लोकसत्ता के पूर्व संपादक कुमार केतकर से जब बात की तो उन्होंने कहा, ‘मीडिया पर दबाव है, लेकिन वह दबाव महाराष्ट्र सरकार का नहीं, केंद्र सरकार और उनके मंत्रियों का है। जितने भी चैनल हैं या समाचार पत्र हैं वे राष्ट्रीय स्वरूप के हैं और उनके मालिक रिलायंस समूह जैसे बड़े औद्योगिक घराने हैं, ऐसे में राज्य सरकार उन पर कैसे दबाव बना सकती है? यह अपने आप में एक बड़ा सवाल है’। केतकर ने आगे कहा कि उद्धव ठाकरे की सरकार आने के बाद, महाराष्ट्र में पत्रकार बहुत आज़ादी का अनुभव कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर लोगों के साथ गाली गलौज लिए भारतीय जनता पार्टी की ट्रोल आर्मी का चेहरा अब किसी से छुपा नहीं है, ऐसे में यह कहना कि उद्धव ठाकरे सोशल मीडिया पर लोगों को लिखने नहीं दे रहे हैं, यह ग़लत होगा। 

दरअसल, इस कोरोना लॉकडाउन के दौरान राज्य सरकार इस प्रयास में लगी है कि कोरोना को लेकर किसी तरह की अफवाहें इस माध्यम से नहीं फैलें और लोगों में भ्रम की स्थिति नहीं बने।

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हेमंत देसाई कहते हैं, ‘सरकार के ख़िलाफ़ बोलने वालों को देशद्रोही ठहराने वाले अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात कर रहे हैं, यह ख़ुशी की बात है’। वहीं वरिष्ठ पत्रकार निखिल वागले ने तो फ़ेसबुक लाइव कर इस पूरे प्रकरण पर ही सवाल उठाये हैं। उन्होंने कहा है, ‘अर्णब गोस्वामी को बचाने के लिए भारतीय जनता पार्टी के नेता इतने परेशान क्यों हैं? अर्णब के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हुई तो उन्हें रद्द करवाने के लिए वे वकील सुप्रीम कोर्ट में खड़े हो गए जो भाजपा के मुक़दमे लड़ते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में अनेकों मामले इस लॉकडाउन के दौरान सुनवाई पर नहीं आ रहे हैं लेकिन अर्णब का मामला एक ही दिन में सुनवाई पर आ गया क्यों और कैसे? इसका जवाब तो अदालत ही दे सकती है।’ 

निखिल वागले का मनाना है कि अर्णब को वह पत्रकार के रूप में नहीं देखते, वह पार्टी विशेष का एजेंडा लेकर और उसका प्रचार करते हैं। 

मंत्रालय पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष प्रवीण पुरो का इस संबंध में कहना है कि यह सिर्फ़ प्रदेश की सरकार को बदनाम करने का खेल है। उन्होंने कहा कि फडणवीस के कार्यकाल के दौरान जलगाँव और रत्नागिरी में पत्रकारों पर हमले हुए थे, वैसे हालात तो इस सरकार के कार्यकाल में नहीं आए हैं। उन्होंने कहा कि पालघर मामले पर जिस तरह से सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का खेल मीडिया के कुछ लोग कर रहे थे उसे कैसे नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। बांद्रा ट्रेन चलने वाली है, इस ख़बर को लेकर जो अफवाहें फैलीं और हज़ारों की संख्या में मज़दूर वहाँ एकत्र हो गए, इस मामले में किसी पत्रकार के ख़िलाफ़ सरकार यदि कार्रवाई करती है तो उसे मीडिया की आज़ादी से कैसे जोड़ा जाए। 

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अर्णब पर हमले पर चुप्पी क्यों?

वरिष्ठ पत्रकार भाऊ तोरसेकर ने इस मामले में अर्णब गोस्वामी पर हुए हमले को लेकर पत्रकार संगठनों, विचारकों, साहित्यकारों और लेखकों की चुप्पी पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने अपने वीडियो ब्लॉग में कहा कि एडिटर्स गिल्ड जैसी संस्था कहाँ है? मुंबई में जब निखिल वागले के समाचार पत्र पर शिव सैनिकों ने हमला किया था उस समय सभी पत्रकार संगठन आवाज़ उठा रहे थे आज वे कहाँ हैं? उन्होंने कहा कि आज प्रदेश के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री कह रहे हैं कि इस मामले में राजनीति नहीं करनी चाहिए लेकिन कोई ओडिशा में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी दंपति स्टेंस की हत्या के प्रकरण शायद ये लोग आज भूल रहे हैं।

तोरसेकर कहते हैं कि उस समय तमाम विचारक, विद्वान और लुटियंस के पत्रकार कैसी पत्रकारिता और बयान दे रहे थे वे ज़रा देख लें। तोरसेकर के अनुसार पालघर की घटना भी वैसी ही है, हम सत्ता में हैं तो दूसरे को राजनीति नहीं करने की सलाह दें या पत्रकारिता सिखाएँ, यह कहाँ तक जायज़ है।

महाराष्ट्र सरकार की सफ़ाई

फडणवीस के बयान पर महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख ने कहा है कि विरोधी पक्ष के नेता होने के नाते देवेंद्र फडणवीस को लोगों की समस्या को लेकर सड़क पर उतरना चाहिए, लेकिन वे हर हफ्ते राजभवन पहुँच जाते हैं। सरकार के किसी विभाग से उन्हें समस्या है तो इसकी शिकायत पहले सरकार के मंत्रियों या मुख्यमंत्री से करने की बजाय वह बार-बार राज्यपाल के पास पहुँचकर किस परंपरा शुरुआत कर रहे हैं।  कांग्रेस के प्रवक्ता सचिन सावंत का भी इस मामले में बयान आया है और उन्होंने कहा कि जिन पत्रकारों की वकालत करने फडणवीस आए हैं उन्हें लोग गोदी मीडिया की श्रेणी में रखते हैं। उन्होंने कहा कि पालघर मामले में क्या किया था इस मीडिया ने, यह सबके सामने है।

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संजय राय
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