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नेताओं को सिर्फ़ चुनाव की चिंता, 27000 गाँव सूखे की चपेट में

लोकसभा चुनाव के नतीजे आये भी नहीं हैं, लेकिन महाराष्ट्र में अगले संघर्ष की बिसात बिछने लगी है। जिस दिन महाराष्ट्र में 17 सीटों पर चौथे चरण का मतदान हो रहा था उस दिन राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रमुख शरद पवार अकाल प्रभावित सोलापुर और उस्मानाबाद का दौरा सड़क मार्ग से कर रहे थे। अब पवार ने अगली रणनीति तय करने के लिए 4 मई को पार्टी के सभी विधायकों, ज़िलाध्यक्षों, लोकसभा का चुनाव लड़े प्रत्याशियों, प्रदेश व राष्ट्रीय कार्यकारिणी के पदाधिकारियों की बैठक बुलाई है। एक बैठक कांग्रेस पार्टी की भी होने की ख़बर है जिसमें राधा कृष्ण विखे पाटिल के इस्तीफ़े के बाद खाली हुए विपक्षी दल के नेता पद पर चुनाव के लिए चर्चा होगी। इसके साथ ही चुनाव की समीक्षा भी होगी। वहीं अब राज ठाकरे ने सूखे को लेकर राज्य सरकार की नीतियों पर सवाल उठाये हैं। इसे देख ऐसा लगता है कि लोकसभा चुनाव परिणाम का भी इंतज़ार नहीं कर पार्टियाँ विधानसभा चुनाव की रणनीति तैयार करने में जुट गयी हैं।

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव अक्टूबर महीने में होने वाले हैं यानी लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद मुश्किल से 5 माह का समय शेष रहेगा।

चुनाव प्रचार के दौरान कई बार दिए गए अपने साक्षात्कारों में भी पवार इस बात का इशारा दे चुके हैं कि सूखे को लेकर किसान बहुत परेशान हैं। चारा छावनियों में चारा नहीं होने के कारण किसान जानवरों को उनके हाल पर छोड़ दे रहे हैं क्योंकि बाजार में चारा इतना महँगा है कि किसान अपना परिवार का पेट भरे या अपने पशुओं का। अब पवार के बाद इस चुनाव में उनके अप्रत्यक्ष सारथी की भूमिका निभाने वाले राज ठाकरे ने भी सूखा पीड़ित क्षेत्रों के दौरे करने की योजना बनायी है। लोकसभा चुनाव में 10 लगातार सभाएँ लेकर महाराष्ट्र में नरेंद्र मोदी और अमित शाह विरोधी माहौल तैयार करने का प्रयास कर चुके राज ठाकरे ने 1 मई को महाराष्ट्र के स्थापना दिवस पर अपने ट्विटर हैंडल से एक अपील ट्वीट की है जिसमें उन्होंने कहा है कि दो सप्ताह चुनाव प्रचार में बीत गया लेकिन न तो मीडिया और न ही सरकार का ध्यान प्रदेश में पड़े सूखे की तरफ़ गया। उन्होंने कहा कि प्रचार सभाओं के चलते प्रदेश में वह जितना घूम चुके हैं उस दौरान यह पता चला कि बेरोज़गारी और अकाल दो बड़ी समस्याएँ हैं जिनसे लोग जूझ रहे हैं। इनको लेकर सरकार जितने दावे करती है, सब खोखले हैं। वह कहते हैं लोग मदद के लिए आगे भी आना चाहते हैं लेकिन सरकारी मशीनरी ही कहीं न कहीं बाधक बन जाती है। इसलिए लोगों को इस सरकार को सबक़ सिखाने के लिए आगे आना होगा। 

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सूखे पर चिंता कितनी?

महाराष्ट्र में सूखा हर साल की कहानी बन गया है। इसको लेकर कई स्तर पर प्रयास किये जाने की बातें भी कही जाती हैं, लेकिन स्थिति ‘ढाक के तीन पात’ सरीखी ही रहती है। सूखे और किसानों की समस्याओं पर विदर्भ क्षेत्र में कार्य कर रहे पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता पी. साईनाथ  ने  ‘Everybody Loves a Good Drought’ नाम की किताब में इस बात का उल्लेख किया है कि सरकारों को इस समस्या से निपटने की बजाय शायद यह बताने में ज़्यादा ख़ुशी महसूस होती है कि उन्होंने इस साल सूखा प्रभावित क्षेत्रों में पिछले साल या पिछली सरकारों के मुक़ाबले कितने अधिक टैंकर पानी की आपूर्ति की है और कितनी अधिक चारा छावनियाँ खुलवायी हैं। वे इसे सूखा प्रभावित क्षेत्र में तीसरी फ़सल का नाम देते हैं कि कैसे कुछ लोगों को सरकारी मदद का इंतज़ार रहता है और सरकारी मशीनरी को मदद पहुँचाने में भ्रष्टाचार करने का। 

सूखे की स्थिति भयावह

पिछले विधानसभा चुनाव में सिंचाई बड़ा मुद्दा बना था। सरकार बनी तो मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने नरेंद्र मोदी सरकार के आदर्श गाँव योजना की तर्ज पर जल युक्त शिवार योजना बनायी। इस योजना में पहले से चल रही 14 योजनाओं का समावेश कर दिया गया और लक्ष्य रखा गया कि हर साल 5000 हज़ार गाँवों को सूखा मुक्त करेंगे। कहा गया था कि इससे पाँच साल में अक्सर सूखा पड़ने वाले 25000 गाँवों के साथ पूरा प्रदेश सूखा मुक्त हो जायेगा, लेकिन हक़ीकत यह है कि क़रीब 27000 गाँव इस साल सूखे की चपेट में आ गए हैं। 

सरकार की तरफ़ से कहा जाता है कि उसने क़रीब एक लाख कुएँ खुदवाये हैं, लेकिन राज ठाकरे ने अपनी हर चुनावी सभा में इस बात पर सवाल उठाया था कि वे कुएँ हैं कहाँ?

एक और सवाल है जो महाराष्ट्र में सूखे के दिनों में उठता है, वह है पानी के दुरुपयोग का। महाराष्ट्र में अधिकाँश सिंचाई के लिए बनाये गए जलाशयों का पानी शहरों की प्यास बुझाने में ही ख़त्म हो जाता है। सबसे कड़वा सच यह है कि ये जलाशय जिन क्षेत्रों में बनाये गए हैं वहाँ के लोग ही प्यासे रह जाते हैं और पानी मुंबई, पुणे जैसे शहरों में चला जाता है जहाँ वह पाँच सितारा होटल, वाटर पार्क, गोल्फ़ कोर्स, क्रिकेट स्टेडियम आदि में व्यर्थ होता है।

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शूगर लॉबी का दबदबा

जब सूखे की बात आती है तो गन्ने की खेती पर भी सवाल उठते हैं जो ज़्यादा पानी पी जाती है। यही नहीं, महाराष्ट्र सरकार ने कागजों में गन्ना खेती की एक सीमा निर्धारित की है, लेकिन उससे भी चार गुना अधिक रकबे पर यह खेती होती है। सरकार इस पर कार्रवाई कैसे करे, जबकि सरकारों में शुगर लॉबी के ही लोगों का दबदबा है और वे ही मंत्री बने बैठे हैं। ऐसे में महाराष्ट्र सूखा मुक्त कैसे होगा, यह बड़ा सवाल है? फ़िलहाल महाराष्ट्र के लिए यह चुनावी साल है और इसमें सूखा मुद्दा तो बनेगा ही और इसके नाम पर वोट भी माँगे ही जाएँगे।

संजय राय
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