महाराष्ट्र सरकार ने विधानसभा में 'धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026' पेश किया है, जिसका उद्देश्य अवैध धर्मांतरणों को रोकना और दंडात्मक कार्रवाई करना है। यह विधेयक राज्य कैबिनेट द्वारा पिछले सप्ताह मंजूर किया गया था और वर्तमान बजट सत्र के दौरान विचार किया जा सकता है। सरकार का दावा है कि राज्य में जबरन, अनैच्छिक या प्रभावित धर्मांतरण बढ़ रहे हैं, जो 'भोले-भाले लोगों' को संगठित तरीके से प्रभावित कर रहे हैं। इससे सार्वजनिक व्यवस्था में बाधा और सामाजिक सद्भाव प्रभावित हो रहा है। मौजूदा कानूनों को अपर्याप्त बताते हुए सरकार ने पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की अध्यक्षता में सात सदस्यीय समिति गठित की, जिसने अन्य राज्यों के कानूनों का अध्ययन कर इस विधेयक की सिफारिश की।

विधेयक के मुख्य प्रावधान

यह विधेयक अवैध धर्मांतरण को परिभाषित करता है, जिसमें प्रलोभन, जबरदस्ती, धोखा, बल, गलत बयानी, धमकी, अनुचित प्रभाव या किसी अन्य धोखाधड़ी वाले कदम शामिल हैं, जैसे शिक्षा के माध्यम से 'ब्रेनवॉशिंग'। सामूहिक धर्मांतरण को दो या अधिक व्यक्तियों का एक साथ जबरन धर्म परिवर्तन माना गया है। लेकिन जिस प्रावधान को विवादित कहा जा रहा है, उसमें कहा गया है कि कोई महिला अगर दूसरे धर्म के शख्स के साथ शादी करती है और वो शादी जबरन धर्म परिवर्तन के बाद हुई हो तो उससे पैदा होने वाली संतान महिला के पुराने धर्म की मानी जाएगी। यानी अगर कोई हिन्दू लड़की मुस्लिम युवक से शादी करती है और वो शादी धर्म परिवर्तन से हुई होगी तो आगे पैदा होने वाली संतान का धर्म उसकी मां के पुराने धर्म पर होगा। आसानी से समझा जा सकता है कि इसमें किस समुदाय को निशाना बनाया जा सकता है।

प्रलोभन की परिभाषा: इसमें उपहार, लाभ, आसान पैसा, रोजगार, धार्मिक संस्थाओं में मुफ्त शिक्षा, शादी का वादा, बेहतर जीवनशैली और दिव्य उपचार जैसी लुभावनी चीजें शामिल हैं। इसमें एक धर्म की महिमा करना या दूसरे धर्म की रीति-रिवाजों को हानिकारक तरीके से चित्रित करना भी शामिल है।
जबरदस्ती: मनोवैज्ञानिक दबाव या शारीरिक बल से व्यक्ति, परिवार या समूह को इच्छा के विरुद्ध कार्य करने के लिए मजबूर करना, जिसमें शारीरिक चोट या जान-माल की धमकी, 'दिव्य असंतोष' या सामाजिक बहिष्कार शामिल है।
विवाह और बच्चों के अधिकार: यदि विवाह केवल अवैध धर्मांतरण के लिए किया गया हो, तो वह अदालत द्वारा अमान्य घोषित किया जा सकता है। ऐसे विवाह से जन्मे बच्चे को मां के विवाह पूर्व धर्म का माना जाएगा। बच्चा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का हकदार होगा, और संरक्षण मां के पास रहेगा जब तक अदालत अन्यथा निर्देश न दे। पीड़ितों को राज्य से पुनर्वास सहायता मिल सकती है।

कानूनी धर्मांतरण की प्रक्रिया: धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति या संस्था को जिला मजिस्ट्रेट को 60 दिन पहले सूचना देनी होगी। मजिस्ट्रेट इसे बोर्ड पर अधिसूचित करेगा और 30 दिनों में आपत्तियां आमंत्रित करेगा। आपत्ति पर पुलिस जांच हो सकती है, जो आपराधिक कार्यवाही का कारण बन सकती है। धर्मांतरण के बाद 21 दिनों में घोषणा पत्र जमा करना अनिवार्य है, अन्यथा वह अमान्य होगा।

शिकायत और दंड की प्रक्रिया

शिकायत धर्मांतरित व्यक्ति, माता-पिता, भाई-बहन या रक्त, विवाह या गोद लेने से संबंधित किसी भी व्यक्ति द्वारा दर्ज की जा सकती है। पुलिस स्टेशन प्रभारी शिकायत दर्ज करेगा, और जांच सब-इंस्पेक्टर से नीचे के अधिकारी द्वारा नहीं की जाएगी। स्वैच्छिक धर्मांतरण साबित करने का बोझ धर्मांतरण कराने वाले पर होगा। अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती हैं।

अवैध धर्मांतरण पर सात साल की कैद और 1 लाख रुपये जुर्माना। यदि पीड़ित मानसिक रूप से अक्षम, नाबालिग, महिला या अनुसूचित जाति/जनजाति का हो, तो सात साल कैद और 5 लाख जुर्माना। सामूहिक धर्मांतरण पर सात साल और 5 लाख। दोहराने पर दस साल और 7 लाख। संगठनों की पंजीकरण रद्द हो सकता है, और उनके प्रभारी को सात साल कैद और 5 लाख जुर्माना। सरकार ऐसी संस्थाओं को वित्तीय सहायता नहीं देगी।

अन्य राज्यों से तुलना

पिछले आठ वर्षों में नौ मुख्य रूप से भाजपा शासित राज्यों ने 'लव जिहाद' रोकने के लिए समान कानून पारित किए हैं। उत्तर प्रदेश में कमजोर वर्गों के लिए 14 साल तक कैद है, जबकि राजस्थान में सामूहिक धर्मांतरण पर 20 साल। महाराष्ट्र का विधेयक प्रलोभन की परिभाषा को विस्तार देता है, जिसमें धर्मों की महिमा और हानिकारक चित्रण शामिल है। हरियाणा में ऐसे विवाहों से बच्चों के उत्तराधिकार अधिकार हैं, लेकिन महाराष्ट्र में बच्चे का धर्म स्पष्ट रूप से मां के पूर्व धर्म से तय होगा।

पिछले आठ वर्षों में नौ बीजेपी शासित राज्यों ने ऐसे कानून बनाए। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल सितंबर में विभिन्न हाईकोर्ट में दायर चुनौतियों को अपने पास स्थानांतरित किया, जो मुस्लिम और ईसाई समूहों द्वारा दायर की गई थीं। गुजरात और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ऐसे कानूनों की कुछ धाराओं को असंवैधानिक ठहराया है।

कई नागरिक समाज संगठन, अल्पसंख्यक, दलित समुदाय और नारीवादी समूहों ने विधेयक का विरोध किया है, इसे व्यक्तिगत और धार्मिक स्वतंत्रता तथा महिलाओं के अधिकारों के विरुद्ध बताया है। विपक्षी विधायकों ने दुरुपयोग की चेतावनी दी है।
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यह विधेयक सामाजिक सद्भाव और सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा का दावा करता है, लेकिन यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है। पूर्व सूचना और घोषणा की आवश्यकता से धर्मांतरण हतोत्साहित हो सकता है, जो संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन हो सकता है। प्रलोभन और जबरदस्ती की विस्तृत परिभाषाएं दुरुपयोग की संभावना बढ़ाती हैं, जैसे अंतर-धार्मिक विवाहों को लक्षित करना, जिसे 'लव जिहाद' के रूप में राजनीतिकरण किया जाता है।
महिलाओं को 'कमजोर' मानना पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण दर्शाता है, जो उनकी स्थिति को कमजोर करता है। अन्य राज्यों में समान कानूनों पर अदालती हस्तक्षेप से पता चलता है कि यह विधेयक भी संवैधानिक चुनौतियों का सामना कर सकता है। जबकि सरकार संगठित धर्मांतरण रोकने का दावा करती है, लेकिन सबूतों की कमी और राजनीतिक मकसद से यह अल्पसंख्यकों को निशाना बना सकता है, सामाजिक विभाजन बढ़ा सकता है। कुल मिलाकर, यह विधेयक आवश्यकता से अधिक सख्त है और स्वतंत्रता पर अतिक्रमण करता है, जबकि वास्तविक जबरदस्ती के मामलों के लिए मौजूदा कानून पर्याप्त हो सकते हैं।