मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे
सरकार के लिए, राजनीतिक रूप से विस्फोटक स्थिति बन गई है। क्योंकि प्रमुख ओबीसी समूह अपने आरक्षण में से कुछ भी प्रमुख मराठों को नहीं देना चाहते हैं। किसी भी समूह का विरोध करना सत्तारूढ़ गठबंधन शिवसेना, भाजपा, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार) के लिए बुरी खबर हो सकती है। क्योंकि जिन ओबीसी समूह को महाराष्ट्र में आरक्षण मिला हुआ है, उसने पहले ही साफ कर दिया है कि वे अपना कोटा घटना बर्दाश्त नहीं करेंगे।
महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन कानून व्यवस्था के लिए परेशानी खड़ी करता रहा है। कई मंत्रियों के घरों, वाहनों पर हमले हो चुके हैं। पिछले साल अक्टूबर और नवंबर में काफी हिंसा हुई थी। चार युवकों की इस मुद्दे पर खुदकुशियों के बाद महाराष्ट्र दहल उठा था। उन युवकों ने अपने स्यूसाइड नोट में आत्महत्या की वजह मराठा कोटा लागू नहीं करने को बताया था। बहरहाल, महाराष्ट्र में मराठा समुदाय न सिर्फ तादाद में सबसे बड़ा, बल्कि राजनीतिक रूप से सबसे प्रभावशाली वर्ग है। पिछले कई दशकों से राज्य मंत्रिमंडल में मराठों की हिस्सेदारी 52% से कभी कम नहीं हुई। 1960 में महाराष्ट्र बनने के बाद अधिकांश समय तक, मराठा मुख्यमंत्री रहा है। कई रिपोर्टों के मुताबिक मराठा राज्य के लगभग 50% शैक्षणिक संस्थानों, 70% सहकारी संस्थानों और 70% से अधिक कृषि भूमि को नियंत्रित करता है।