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महाराष्ट्र: सरकार नहीं बनी तो क्या दल-बदल का शिकार होगी बीजेपी?

क्या महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी के लिए आने वाले दिन परेशानी भरे होंगे? प्रदेश में चल रही राजनीतिक गतिविधियों को देखकर तो ऐसा ही लगता है। यदि सत्ता का समीकरण बदला और बीजेपी उससे दूर रही तो साफ़ है कि चुनाव पूर्व या उसके पहले अपने 5 साल के कार्यकाल में सत्ता के दम या दबाव में दल-बदल का जो खेल खेला गया था, उसका चक्र उलटा चल सकता है।
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बीजेपी छोड़ने का जुगाड़?

यह एनसीपी के विधायक दल के नवनिर्वाचित नेता अजीत पवार और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जयंत पाटिल के बयानों से स्पष्ट झलकता है। दोनों नेताओं ने कहा है कि जो नेता पार्टी छोड़कर बीजेपी में चले गए थे, वे अब घरवापसी करना चाहते हैं और इसके लिए फ़ोन भी कर रहे हैं। यही नहीं, पिछले कुछ दिनों से यह चर्चा जोरों पर है कि बीजेपी शिवसेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस और कांग्रेस के विधायकों को प्रलोभन देकर या दबाव बनाकर तोड़ने की फिराक में है।
इसका संकेत दो दिन पहले शिवसेना नेता संजय राउत ने प्रेस कांफ्रेंस में दिया था।  उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि बीजेपी सरकारी मशीनरी से लेकर गुंडे तत्वों का इस्तेमाल दल-बदल के लिए कर रही है और उनके पास इस बात के प्रमाण भी हैं।

एनसीपी की चेतावनी

इस कड़ी में एनसीपी अध्यक्ष जयंत पाटिल ने कहा कि शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस का कोई भी विधायक यदि बीजेपी के साथ हाथ मिलाएगा तो उसका परिणाम उसे भुगतना पड़ेगा।
जयंत पाटिल ने कहा यदि कोई विधायक बग़ावत करेगा तो उसके ख़़िलाफ़ चुनाव में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस एक साझा प्रत्याशी मैदान में उतारेंगी और उसे हराकर ही दम लेंगी।
पाटिल का यह बयान इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि भले ही प्रदेश में एनसीपी-शिवसेना और कांग्रेस के सहयोग वाली सरकार का अभी गठन नहीं हुआ है लेकिन इन तीनों दलों में यह वैचारिक समझौता तो हो ही गया है कि बीजेपी को आगे नहीं बढ़ने देना है।

बीजेपी का खेल

इस बार चुनाव से ठीक पहले बीजेपी नेताओं ने बड़े-बड़े दावे और प्रचार का शोर मचाकर एनसीपी-कांग्रेस के 35 विधायकों को अपने दल में मिला लिया था। हालांकि इनमें से कुछ विधायक शिवसेना में भी गए थे। लेकिन चुनाव में सिर्फ 16 ही जीतकर आये और 19 विधायक चुनाव हार गए। अजीत पवार ने विधायक दल का नेता चुने जाने के बाद अपने भाषण में इस बात का उल्लेख किया था कि इतने बड़े पैमाने पर यह दल-बदल नहीं कराया गया होता तो बीजेपी नहीं, कांग्रेस-एनसीपी की सरकार प्रदेश में बनी होती।
2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद से महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर कांग्रेस और एनसीपी के नेता 'अच्छे दिन' की आस में बीजेपी में शामिल हो गए थे। पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को इसका बड़ा लाभ मिला था। शिवसेना ने बाद में इस नीति पर कई बार कटाक्ष भी किया था। उद्धव ठाकरे खुद इस बात को कहते थे कि बीजेपी दल-बदल के दम पर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनने का दम भरती है। 
यदि साल 2014 से हुए दल-बदल पर ध्यान दें तो इस बार बीजेपी के जितने विधायक चुने गए हैं, उनमें से आधे कांग्रेस-एनसीपी से आये हुए हैं। 
महाराष्ट्र की राजनीति में जब से यह समीकरण स्पष्ट होने लगा है कि शिवसेना और एनसीपी मिलकर सत्ता का नया समीकरण लिखने जा रहे हैं, इस बात की चर्चाएं भी जोरों पर हैं कि क्या शरद पवार एनसीपी छोड़कर गए नेताओं को बीजेपी से अपने पाले में खींच लेंगे?
शरद पवार की राजनीति की जो शैली है, उसे देखते हुए इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है। ऐसे में यदि प्रदेश में बीजेपी की सरकार नहीं बनी तो उसे दल-बदल के अपने ही खेल में शह और मात का शिकार होना पड़ सकता है। 
संजय राय
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