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दाभोलकर पर कोर्ट: क्या हत्याएँ होते रहने देना चाहती है सरकार?

डॉ. नरेंद्र दाभोलकर हत्या मामले में बार-बार जाँच एजेंसियों को देरी या निष्क्रियता को लेकर डाँट लगाती रही अदालत ने अब सत्ताधारी दल और सरकार को फटकार लगाई है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि वह जाँच कार्य में सहयोग या सामंजस्य क्यों नहीं स्थापित कर रही है? सुनवाई के दौरान 4 जुलाई को अदालत ने जो बातें कही हैं वह सिर्फ़ जाँच एजेंसियों पर ही नहीं, हमारी सरकारों की भूमिका पर भी सवाल खड़े करती हैं। न्यायाधीश सत्यरंजन धर्माधिकारी व गौतम पटेल की खंडपीठ ने कहा कि यह हत्या गैंगवार, पारिवारिक विवाद या संपत्ति विवाद की वजह से नहीं हुई है। महाराष्ट्र और कर्नाटक में एक के बाद एक चार ऐसे विचारकों की हत्याएँ एक सिलसिलेवार तरीक़े से हुई हैं जिनके विचार बहुसंख्यकों से भिन्न थे। इन हत्याओं के पीछे जो मक़सद नज़र आ रहा है वह है बहुसंख्यकों से हटकर व्यक्त किये गए विचारों को ख़त्म करने या यह बताने का कि इस तरह के विचार रखने वाले लोगों का यही अंजाम होगा। अदालत ने कहा कि चार विचारकों की हत्या का परिणाम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होता है। इसलिए राज्य सरकार को इस ख़तरे को समझना चाहिए। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या राज्य सरकार राज्य में ऐसा ही चलते रहने देना चाहती है? 

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महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या 6 साल पहले हुई थी। पुलिस और सीबीआई इस मामले की जाँच अभी भी पूरी नहीं कर पायी हैं। समय-समय पर इस मामले में गिरफ्तारियाँ हुई भी हैं और पुलिस व सीबीआई ने कुछ अभियुक्तों के ख़िलाफ़ पूरक आरोप पत्र पेश भी किये लेकिन अदालत इस जाँच की रफ़्तार से संतुष्ट नहीं है क्योंकि मामले की न तो जाँच पूरी हुई और न ही एक पूरा आरोप पत्र पेश किया जा सका। 20 अगस्त 2013 में दाभोलकर की हत्या हुई तो जाँच पुलिस ने शुरू की थी। 

पुलिस द्वारा अभियुक्तों को पकड़ने के लिए तांत्रिकों की मदद लेना और तंत्र-मंत्र का इस्तेमाल करने की ख़बर आउटलुक पत्रिका में प्रकाशित की गयी तो तत्कालीन पुलिस कमिश्नर पुणे ने पत्रकार आशीष खेतान व संपादक के ख़िलाफ़ मानहानि का मुक़दमा भी दर्ज कराया। लेकिन दाभोलकर के परिजन पुलिस की जाँच से संतुष्ट नहीं थे तो मामला सीबीआई को दे दिया गया। सीबीआई ने जाँच शुरू की तो सवाल खड़ा होने लगा आपसी सामंजस्य का। आपसी तालमेल बिठाने के लिए अदालत ने कई बार पुलिस को निर्देश भी दिए। बात बनती हुई नहीं दिखी तो राज्य सरकार को भी अदालत ने निर्देश देना शुरू कर दिया। 

सबूत ढूँढने के लिए पर्यावरण विभाग से अनुमति!

अदालत ने जाँच के संबंध में गुरुवार को जब अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह की तरफ़ से पेश रिपोर्ट देखी तो उसे इस बात को लेकर बहुत आश्चर्य हुआ कि सीबीआई और पुलिस को पर्यावरण विभाग और महाराष्ट्र कोस्टल जोन मैनेजमेंट अथॉरिटी (एमसीजेडएमए) से अनुमति नहीं मिल रही कि वह खाड़ी में उतर कर आरोपियों द्वारा हत्या में प्रयुक्त पिस्तौल को ढूंढे। 

पुलिस की दलील पर अदालत ने कहा कि कोई हेलिकॉप्टर या बस या वाहन गिरने पर भी पुलिस या जाँच एजेंसियाँ इसी तरह से अनुमति माँगती हैं या बिना उनके भी अपनी जाँच शुरू कर देती हैं?

पुलिस ने कहा था कि आरोपियों ने हत्या में प्रयुक्त पिस्तौल भाईंदर के पास खाड़ी में टुकड़े -टुकड़े करके फेंक दी है जो वे अब तक बरामद नहीं कर सके हैं। ऐसे तर्क पर अदालत का रुख कड़ा हो गया। पहले भी इस मामले में अदालत ने बार-बार जाँच एजेंसियों से यह जानने की कोशिश भी की कि क्या उन पर किसी का दबाव है? लेकिन जब कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला तो गुरुवार को अदालत ने यह भी आदेश दिए कि ‘इस मुद्दे पर राज्य सरकार के सभी संबंधित अधिकारियों, सभी सीबीआई अधिकारियों की बैठक अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय में उनकी उपस्थिति में कराई जाए। अदालत का यह निर्देश स्वयं इस बात को इंगित करता है कि वह मामले की जाँच से संतुष्ट नहीं है लिहाज़ा वह सॉलिसिटर जनरल के माध्यम से यह जानने की कोशिश कर रहा है कि आख़िर क्या हो रहा है। क्योंकि गुरुवार को जब जाँच एजेंसियों द्वारा टालमटोल का रवैया दिखा तो अदालत ने सख़्ती से इस बात को कहा कि जाँच कार्य में किसी भी ढिलाई के लिए अधिकारी ही अदालत के प्रति जवाबदेह हैं। यदि वे इस बात को नहीं समझ रहे हैं तो अदालत उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने में पीछे नहीं रहेगी।

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तीनों हत्याओं के पीछे एक तरह के लोग

उल्लेखनीय है कि जब इस मामले की जाँच शुरू हुई थी उस समय भी इसी तरह की लेटलतीफी स्कॉटलैंड यार्ड से रिपोर्ट हासिल करने के नाम पर की गयी थी। दरअसल, दाभोलकर और गोविंद पानसरे की हत्या का खुलासा कर्नाटक पुलिस द्वारा कलबुर्गी हत्याकांड की जाँच के दौरान हुआ था। उस समय कर्नाटक पुलिस ने बैंगलोर की प्रयोगशाला की रिपोर्ट के आधार पर यह कहा था कि तीनों हत्याओं के पीछे एक ही तरह के लोगों का हाथ है और यह हत्याकांड में प्रयुक्त की गयी पिस्तौल और उसकी गोलियों के आधार पर कहा गया। लेकिन महाराष्ट्र में जाँच एजेंसियों ने स्कॉटलैंड यार्ड की एजेंसी की जाँच रिपोर्ट का 10 माह इंतज़ार किया और बाद में कहा कि दोनों देशों के बीच इस तरह का समझौता नहीं होने की वजह से यह रिपोर्ट आ नहीं सकेगी। अब सवाल यह उठ रहा है कि इन हत्याकांडों को लेकर जाँच में इस ढिलाई की जवाबदेह क्या सरकार है? वैसे, इस जाँच को लेकर विधानसभा में मुख्यमंत्री ने 17 जून 2019 को तारांकित प्रश्न पर जवाब भी दिया। उन्होंने कहा कि इस मामले में अब तक 12 लोगों की गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं। उन्होंने कहा कि अक्टूबर 2018 में नालासोपारा में जो हथियारों का ज़ख़ीरा पकड़ा गया था उससे संबंधित वैभव राउत का हिंदूवादी संगठन सनातन से सम्बन्ध भी सामने आया है।

संजय राय
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