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फडणवीस के बढ़ते क़द से महाराष्ट्र बीजेपी में घमासान, खडसे-पंकजा नाराज

क्या महाराष्ट्र बीजेपी में घमासान जोरों पर है? क्यों पार्टी में वरिष्ठ नेताओं के द्वारा बार-बार विरोध के स्वर बुलंद किए जा रहे हैं? क्या यह विरोध प्रदेश में पार्टी पर पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बढ़ते प्रभाव के कारण हो रहा है? इस बार बीजेपी में विरोध विधान परिषद चुनाव में टिकट बंटवारे को लेकर उठा है और इसे लेकर वरिष्ठ नेता एकनाथ खडसे ने नाराजगी जताई है। 

दरअसल, महाराष्ट्र बीजेपी में फडणवीस का क़द पिछले कुछ सालों में काफी बढ़ा है और यह बात  विधानसभा चुनाव के दौरान स्पष्ट रूप से टिकट बंटवारे में नजर आयी थी। एकनाथ खडसे जैसे नेता का टिकट कटवाकर फडणवीस ने इस बात को साबित भी कर दिया था। 

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इसके अलावा फडणवीस सरकार में मंत्री रहे कई अन्य नेताओं के भी टिकट कटने के पीछे यही चर्चाएं थीं कि उन्हें केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी के नजदीकी होने का खामियाजा भुगतना पड़ा। 

शायद फडणवीस की प्रदेश संगठन में मजबूत पकड़ होने की वजह से गडकरी ने भी अपने आप को केंद्र तक ही सीमित कर लिया है। सरकार बनाने को लेकर जब बीजेपी-शिवसेना में तकरार चल रही थी तब भी गडकरी समझौता कराने से दूर ही रहे थे।

रातों-रात राष्ट्रपति शासन हटवाकर एनसीपी नेता अजीत पवार के साथ तड़के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले लेने से यह साफ था कि पार्टी दरबार में फडणवीस की बात प्रमुखता से सुनी जाती है और शायद यही वजह है कि पार्टी के वरिष्ठ नेता अब संगठन में ख़ुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। 

दरअसल, साल 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के गठन से पहले महाराष्ट्र में गोपीनाथ मुंडे, नितिन गडकरी और एकनाथ खडसे अग्रिम पंक्ति के नेता थे। लेकिन मुंडे और गडकरी केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हो गए थे और खडसे विरोधी पक्ष के नेता थे। लेकिन जैसे ही महाराष्ट्र में सरकार बनी, फडणवीस मुख्यमंत्री बन गए और खडसे को मंत्री पद से ही संतोष करना पड़ा। 

लेकिन कुछ समय बाद खडसे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और फडणवीस ने उनका इस्तीफ़ा ले लिया। इस मामले में खडसे को साल भर के भीतर क्लीन चिट भी मिल गयी लेकिन फडणवीस ने उन्हें मंत्रिमंडल में वापस नहीं लिया। तब भी यह सवाल उठा था कि क्या फडणवीस अपने प्रतिद्वंदियों का क़द कम कर रहे हैं? पंकजा मुंडे पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के समय भी ऐसे ही सवाल उठे थे क्योंकि उन्हें भी मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जाता था। 

विधान परिषद चुनाव में टिकट बंटवारे को लेकर खडसे और पंकजा के अलावा विरोध के स्वर पूर्व मंत्री राम शिंदे, चंद्रशेखर बावनकुले, विनोद तावड़े आदि के भी सुनाई दे रहे हैं जिन्हें शायद यह उम्मीद थी कि पार्टी उन्हें प्रमुखता देगी।

पंकजा मुंडे के विरोध को देख पार्टी ने उन्हीं के बंजारा समाज के रमेश कराड को टिकट दे दिया। बीजेपी के इस दांव को भी पंकजा का क़द कम करने की चाल कहा जा रहा है। कहने को तो कराड पंकजा के क़रीबी हैं और बंजारा समाज से ही आते हैं। लेकिन पार्टी उन्हें आगे बढ़ाकर पंकजा के क़द को कम कर रही है। 

इसी तरह से लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने मुंडे समर्थक भागवत कराड को टिकट दिया था। भागवत भी बंजारा समाज से हैं और वर्तमान में सांसद हैं। आज वह बंजारा समाज में पंकजा के अलावा अपनी अलग ज़मीन तैयार कर चुके हैं। 

खडसे के जाने की थी चर्चा

उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र में सत्ता परिवर्तन के बाद दिसंबर, 2019 में पंकजा मुंडे, एकनाथ खडसे, चंद्रशेखर बावनकुले आदि ने बग़ावती सुर बुलंद किये थे लेकिन बाद में पार्टी के दिल्ली स्तर के नेताओं के दखल के बाद मामला शांत हो गया था। उस समय खडसे के एनसीपी में जाने की चर्चा थी और उन्होंने शरद पवार से दिल्ली में मुलाक़ात भी की थी। 

इस बार एकनाथ खडसे कुछ ज्यादा ही आक्रामक हैं। उन्होंने कहा है कि वह मौक़ा देख रहे हैं और कभी भी अपना निर्णय जाहिर कर देंगे।

खडसे को कांग्रेस से टिकट दिए जाने का प्रस्ताव था और अगर बीजेपी के 7 विधायक पार्टी के ख़िलाफ़ मतदान करते तो उसकी एक सीट चली जाती। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और राजस्व मंत्री बालासाहब थोरात ने खडसे को कांग्रेस में प्रवेश का खुला निमंत्रण दे डाला है। 

नितिन गडकरी ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा है कि आख़िर खडसे को ऐसा कहने की नौबत क्यों आई। उन्होंने कहा कि खडसे ने प्रदेश में पार्टी को मजबूत करने में बहुत योगदान दिया है जिसे भुलाया नहीं जा सकता। 

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मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के मैदान में होने की वजह शिवसेना की यही प्राथमिकता थी कि चुनाव में मतदान की नौबत नहीं आये, लिहाजा उसने कांग्रेस को समझाकर एक प्रत्याशी वापस करा लिया। 

लेकिन लॉकडाउन खुलने के बाद बीजेपी में उभरे विरोध के स्वर उसे कुछ बड़ा राजनीतिक झटका देंगे, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। इस बीच, उद्धव ठाकरे और 8 अन्य उम्मीदवार विधान परिषद के लिए निर्विरोध निर्वाचित हो गए हैं। 

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संजय राय
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