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कई नेताओं ने छोड़ी एनसीपी, पवार के लिए अस्तित्व की लड़ाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने जब लोकसभा चुनाव के दौरान यह कहा था कि शरद पवार को बारामती में हराएँगे तब उस समय राजनीति के बहुत से जानकारों ने इसे हलके में लिया था। लेकिन विधानसभा चुनाव की चौसर पर जिस तरह से राष्ट्रवादी कांग्रेस का हर बड़ा मोहरा बिना लड़े धराशायी हो रहा है उससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह चुनाव शरद पवार की राजनीति के लिए शह और मात का दाँव तो नहीं सिद्ध होने वाला है? यह विधानसभा चुनाव राष्ट्रवादी कांग्रेस के अस्तित्व का सवाल बन गया है। ठाणे, सोलापुर, सातारा, कोल्हापुर ज़िले जो राष्ट्रवादी कांग्रेस के गढ़ के रूप में जाने जाते थे वहाँ चुनाव से पूर्व ही भारी भगदड़ मची हुई है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि इतने बड़े नुक़सान की भरपाई शरद पवार कैसे कर पाएँगे?

क्या शरद पवार इस बाज़ी को लड़ने के लिए कांग्रेस में विलय जैसा क़दम उठाएँगे जिसकी संभावनाएँ लोकसभा परिणामों के बाद राहुल गाँधी और शरद पवार की बैठकों के बाद ज़्यादा दिखने लगी थीं? क्या राजनीति के बदलते स्वरूप में शरद पवार को भी अपनी पार्टी में होने वाली इस भगदड़ का अनुमान नहीं हुआ? महाराष्ट्र की राजनीति की नब्ज़ जानने वाला राजनेता इस चक्रव्यूह से निकल पाएगा या वह विफल साबित होगा, यह बड़ा सवाल बन गया है। 

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पवार की पार्टी के मुंबई प्रदेश अध्यक्ष सचिन अहीर के शिवसेना में जाने के बाद पार्टी की महिला शाखा की प्रदेश अध्यक्ष चित्रा वाघ बीजेपी में चली गयीं। पार्टी के संस्थापक सदस्य मधुकर पिचड़ और अकोला से उनके विधायक पुत्र वैभव पिचड़ भी बीजेपी में चले गए। मुंबई से लगा ठाणे ज़िला, जो राष्ट्रवादी कांग्रेस का साल 2014 तक गढ़ माना जाता था, के सबसे बड़े नेता और 10 साल तक मंत्री और गार्डियन मिनिस्टर रहे गणेश नाईक, उनके विधायक पुत्र संदीप नाईक, ज्येष्ठ पुत्र व पूर्व सांसद संजीव नाईक अपने साथ नवी मुंबई महानगरपालिका के 57 नगरसेवकों के साथ बीजेपी में जा रहे हैं। ठाणे ज़िले के पूर्व विधान परिषद के सभापति के विधायक पुत्र निरंजन डावखरे, विधायक किशन कथोरे, विधायक पांडुरंग बरोरा, विधायक पुंडलिक म्हात्रे, सांसद कपिल पाटिल आदि भी पार्टी छोड़ चुके हैं। सातारा ज़िले से छत्रपति शिवाजी के वंशज व विधायक शिवेंद्रराजे भी बीजेपी में चले गए हैं। उस्मानाबाद ज़िले से पवार के रिश्तेदार पद्मसिंह पाटिल के भी शरद पवार का साथ छोड़ने की ख़बरें हैं। सोलापुर ज़िले से पूर्व मुख्यमंत्री रहे विजय सिंह मोहिते पाटिल व उनके पुत्र रणजीत सिंह मोहिते पाटिल पहले ही बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। अब दो विधायक दिलीप सोलप और बबन शिंदे भी किसी भी समय बीजेपी में प्रवेश कर सकते हैं, बस मुहूर्त का इंतज़ार है।

मोदी के दावपेंच से बच पाएँगे?

शरद पवार के राजनीतिक जीवन में उतार-चढ़ाव का यह दौर कोई पहली बार नहीं आया है, लेकिन क्या वे इस पर मात देकर पहले की तरह विजय हासिल कर पाएँगे? एक दौर में उन्होंने इंदिरा गाँधी को चुनौती देते हुए अपनी पार्टी कांग्रेस (एस) के अस्तित्व को बचाए रखा था लेकिन क्या वह आज नरेंद्र मोदी के दावपेंच से बच पाएँगे। अब जब उनकी पार्टी के विधायकों के टूटने की ख़बरें मीडिया में सुर्खियाँ बनीं तो पवार ने पुणे में पत्रकार परिषद (प्रेस कॉन्फ़्रेंस) बुलाकर अपने संघर्ष के दौर की बातें साझा कीं। उन्होंने कहा कि 60 से 6 और फिर 6 से 60 विधायक खड़े करने का हुनर उन्हें आता है और इसकी पुनरावृत्ति वे फिर से करेंगे। लेकिन तब पवार युवा थे और आज उनकी उम्र ढलान पर है। यह सही है कि उम्र के इस पड़ाव पर भी लोकसभा चुनावों के दौरान महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा सभाएँ या बैठकें पवार ने ही की थीं। लेकिन आज अग्रिम पंक्ति के नेता विरोध में खड़े हैं। ऐसे में पार्टी को फिर से शिखर पर ले जाने का काम मुश्किल दिखता है। 
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पवार की क्या रही कमज़ोरी?

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को बने 20 साल से ज़्यादा का समय हो गया लेकिन पवार जैसे कुशल नेतृत्व के बावजूद पार्टी की प्रदेश में वैसी पकड़ नहीं रही जैसी मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, मायावती या नवीन पटनायक, ममता बनर्जी या जगन रेड्डी जैसे नेताओं की उनके प्रदेशों की राजनीति में है। और इसका सबसे बड़ा कारण यह रहा कि पवार की राजनीति कांग्रेस संस्कृति के इर्द-गिर्द ही घूमती रही। सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के मुद्दे पर उन्होंने कांग्रेस का हाथ छोड़कर नयी पार्टी बनाई लेकिन बाद में उसी हाथ को थामकर 15 साल राज्य की सत्ता व केंद्र की सत्ता में रहे। इसके अलावा जो दूसरा बड़ा कारण है वह यह कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी कुछ घरानों के बीच ही सिमटी रही। 

पवार, मोहिते, भोसले, क्षीरसागर, पाटिल, देशमुख, भुजबल, सोलंके, टोपे, नाईक, निंबालकर और तटकरे इन राजनीतिक घरानों के बीच ही उनकी पार्टी का शक्ति केंद्र सिमट कर रह गया, यह किसी से छुपा नहीं है। लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, ज़िला परिषद, पंचायत समिति, कृषि उत्पन्न बाजार समितियाँ, शक्कर कारख़ाना, दुग्ध उत्पादक संघ सत्ता के अधिकाँश पदों पर इन्हीं परिवारों को मौक़ा मिला। एनसीपी की राजनीति शुगर लॉबी, दूध लॉबी, जो कि उनकी पार्टी के नेताओं के आधिपत्य में थी, के इर्द-गिर्द ही केंद्रित होने लगी। इसका असर राष्ट्रवादी कांग्रेस पर भी पड़ने लगा और पार्टी में दरी और कुर्सी, झंडा, बैनर लगाने वाला कार्यकर्ताओं पर पड़ा और वे अपना भविष्य बीजेपी-शिवसेना और दूसरे छोटे दलों में तलाशने लगे। इन कार्यकर्ताओं ने जब दरी खींची तो स्थापित बड़े नेताओं की चूलें हिल गयीं? 

और अब ये परिवार जिनकी राजनीति को शरद पवार ने परवान चढ़ाया वे भी उनका साथ छोड़कर जाने लगे तो उन्हें दूसरी पंक्ति के नेताओं की याद आने लगी जो कि बहुत कमज़ोर अवस्था में है? ये दूसरी पंक्ति उन धनाढ्य और साधन सम्पन्न नेताओं का कैसे मुक़ाबला कर पाएगी जिन्हें ख़ुद पवार ने 20 साल में बड़ा किया? किसानों की राजनीति करने वाले शरद पवार को अपनी पार्टी की नई दिशा किसानों व प्रदेश के दलित-वंचित समाज के सवालों में ढूँढनी होगी? लेकिन ऐन चुनाव के मौक़े पर वे कैसे इन्हें अपने साथ कर पाएँगे? फर्श से अर्श का चमत्कार पवार ने उस दौर में किया था जब किसान और वंचित समाज उनके साथ खड़ा था।

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कांग्रेस के साथ आएँगे?

1977 में इंदिरा गाँधी और कांग्रेस की हार के बाद महाराष्ट्र में कांग्रेस विभाजित हुई थी और शरद पवार अपने राजनीतिक गुरु यशवंत राव चव्हाण के साथ कांग्रेस (यू ) में शामिल हो गए थे। बाद में पवार ने कांग्रेस (यू) के दो टुकड़े कर दिए और जनता पार्टी की मदद से सबसे कम उम्र के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। लेकिन 1980 में शरद पवार की सरकार गिर गयी। उनकी पार्टी के 60 में से 6 विधायकों को छोड़ सब कांग्रेस में चले गए थे। लेकिन महाराष्ट्र में शिवसेना के राजनीतिक उदय के बाद जब पवार ने प्रदेश में कांग्रेस संस्कृति के ख़तरे की बात की तो राजीव गाँधी ने उन्हें तथा उनकी पार्टी को कांग्रेस में शामिल कर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया। सवाल आज फिर से प्रदेश में कांग्रेस की संस्कृति बचाने का ही है तो क्या आज शरद पवार फिर से कांग्रेस में आएँगे? यह सवाल अब चर्चा में है।

संजय राय
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