शिवसेना यूबीटी के छह सांसद आख़िरकार सोमवार को एकनाथ शिंदे की शिवसेना में शामिल हो गए। इस बगावत से शिवसेना यूबीटी प्रमुख उद्धव ठाकरे को बड़ा झटका लगा है। क्योंकि उनकी पार्टी के कुल नौ सांसदों में से छह सांसदों ने एक साथ पाला बदल लिया है। उनकी पार्टी की ताक़त अब संसद में घटकर तीन हो गई है।

इस घटनाक्रम के साथ ही शिवसेना यूबीटी के संसदीय दल में औपचारिक विभाजन हो गया है और एकनाथ शिंदे की पार्टी को लोकसभा में भी बड़ी मजबूती मिल गई है। शिवसेना यूबीटी छोड़कर शिंदे गुट में शामिल होने वाले सांसदों में ओमराजे निंबालकर, संजय दीना पाटील, संजय जाधव, संजय देशमुख, नागेश पाटील आष्टीकर और भाऊसाहेब वाकचौरे शामिल हैं।
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इन छह सांसदों ने पिछले सप्ताह 17 जून को नई दिल्ली में बुलाई गई शिवसेना यूबीटी की संसदीय दल की बैठक में भी हिस्सा नहीं लिया था। उसी समय से उनके बगावत करने की अटकलें तेज हो गई थीं। उस बैठक में पार्टी के केवल तीन सांसद ही पहुंचे थे।

दलबदल कानून से कैसे बचेंगे?

लोकसभा में शिवसेना यूबीटी के कुल नौ सांसद थे। दलबदल विरोधी क़ानून के तहत किसी समूह को विभाजन के बाद अयोग्यता से बचने के लिए कम से कम दो-तिहाई सांसदों का समर्थन चाहिए होता है। छह सांसदों के साथ शिंदे गुट यह संख्या हासिल करने में सफल रहा, जिससे उनकी स्थिति क़ानूनी रूप से मज़बूत मानी जा रही है।

शिंदे बोले- 'मेरे साथ छह बाघ आए हैं'

शिवसेना यूबीटी के सांसदों को शामिल किए जाने को लेकर मुंबई में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में एकनाथ शिंदे ने नए सांसदों का स्वागत करते हुए कहा कि यह उनकी पार्टी के लिए बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कहा, 'आज मेरे साथ एक नहीं, बल्कि छह बाघ मौजूद हैं। इस बार हमने राजनीतिक मैदान में छक्का लगाया है।'
शिंदे ने 2022 में हुई शिवसेना की बगावत का ज़िक्र करते हुए कहा कि उस समय पार्टी की हिंदुत्व विचारधारा और 'धनुष-बाण' चुनाव चिन्ह को बचाने के लिए विद्रोह किया गया था। उन्होंने सांसदों के इस कदम को 'दूसरा विद्रोह' बताया और दावा किया कि इससे उनकी नेतृत्व क्षमता और पार्टी की विचारधारा के प्रति बढ़ते समर्थन का पता चलता है।

शिंदे ने कहा, "ये लोकसभा सदस्य अब उस असली शिवसेना में शामिल हो गए हैं जो स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे की सीख को मानती है। चार साल पहले मैंने एक बड़ा कदम उठाया था और अब मैंने 'छक्का' मारा है।" शिंदे ने कहा, "मैंने पहले ऐसा स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे के सिद्धांतों और शिवसेना को बचाने के लिए किया था। अब, यह कदम शिवसेना के विस्तार का दूसरा चरण है।" 

एकनाथ शिंदे ने 2022 में उनके साथ आए 40 विधायकों की बगावत की याद दिलाते हुए कहा कि अब सांसदों का समर्थन भी उनकी राजनीति को नई ताकत देगा।

'ऑपरेशन टाइगर' सफल: फडणवीस

इस पूरे घटनाक्रम को शिंदे खेमे ने 'ऑपरेशन टाइगर' नाम दिया है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भी इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि 'ऑपरेशन सफल रहा है और मरीज पूरी तरह स्वस्थ है। किसी को चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। जिन्हें आत्मचिंतन करना चाहिए, वे करें।' फडणवीस के इस बयान को उद्धव ठाकरे और उनकी पार्टी पर सीधा राजनीतिक हमला माना जा रहा है।

बागी विधायक क्या बोले?

शिंदे गुट में शामिल हुए सांसदों ने अपने निर्वाचन क्षेत्रों के विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धनराशि नहीं मिलने को भी पाला बदलने का प्रमुख कारण बताया है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए शिंदे ने भरोसा दिलाया कि उनके क्षेत्रों में विकास कार्यों के लिए किसी प्रकार की धन की कमी नहीं होने दी जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार जनता के हितों को प्राथमिकता देगी और सांसदों की मांगों को पूरा किया जाएगा।

संजय राउत का पलटवार

दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे खेमे ने इस घटनाक्रम को विश्वासघात बताया है। राज्यसभा सांसद संजय राउत ने शिंदे पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्होंने 'छह गद्दार' तैयार किए हैं। राउत ने आरोप लगाया कि सत्ता और दबाव के ज़रिए पार्टी को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है।

उद्धव ठाकरे करेंगे राज्यव्यापी दौरा

छह सांसदों के पाला बदलने वाले राजनीतिक झटके के बाद अब शिवसेना यूबीटी प्रमुख उद्धव ठाकरे संगठन को मजबूत करने की तैयारी में जुट गए हैं। बताया जा रहा है कि वे 27 जून से महाराष्ट्र का दौरा शुरू करेंगे और उन लोकसभा क्षेत्रों का दौरा करेंगे जहां से सांसदों ने पार्टी छोड़कर शिंदे गुट का साथ दिया है।
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जानकारों का मानना है कि यह घटनाक्रम 2022 में शुरू हुए शिवसेना विभाजन का नया अध्याय है। उस समय एकनाथ शिंदे ने बड़ी संख्या में विधायकों के साथ उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत की थी, जिसके बाद महाराष्ट्र की राजनीति पूरी तरह बदल गई थी।

अब लोकसभा सांसदों के इस बड़े समूह के शिंदे गुट में शामिल होने से महाराष्ट्र की राजनीति में शक्ति संतुलन और अधिक बदलता दिखाई दे रहा है। एकनाथ शिंदे की शिवसेना को आगामी चुनावों से पहले संगठनात्मक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर मज़बूती मिलने की संभावना है, जबकि उद्धव ठाकरे के सामने पार्टी को एकजुट रखने की चुनौती और बढ़ गई है।