एंटी-कंवर्जन बिल को लेकर महाराष्ट्र की महा विकास अघाड़ी में मतभेद उभर आए हैं। उद्धव ठाकरे की शिवसेना समर्थन में है, जबकि कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी विरोध कर रही हैं। क्या गठबंधन में दरार गहराएगी?
शिवसेना यूबीटी, कांग्रेस और एनसीपी एसपी की महाविकास अघाडी में सबकुछ सामान्य है या फिर अंदर के वैचारिक मतभेद अब खुलकर सामने आने लगे हैं? महाराष्ट्र विधानसभा में राज्य सरकार ने 'महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ़ रिलिजन बिल 2026' पास करा लिया। यह क़ानून जबरदस्ती, धोखे, लालच या फर्जी तरीक़े से धर्म परिवर्तन रोकने के लिए बनाया गया है। लेकिन विपक्षी नेता इसे अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने का साधन मानते हैं और इसलिए वे विरोध कर रहे हैं। विपक्षी महाविकास अघाडी में ही इस मुद्दे पर अलग राय हो गई है। शिवसेना यूबीटी ने जहाँ इस विधेयक के मुद्दे पर बीजेपी सरकार का साथ दिया है वहीं कांग्रेस और शरद पवार की एनसीपी ने इसका विरोध किया है।
विधेयक को सत्ताधारी बीजेपी, शिवसेना शिंदे गुट और एनसीपी अजित पवार गुट की महायुति के साथ-साथ विपक्षी महा विकास अघाड़ी यानी एमवीए के एक साथी शिवसेना यूबीटी ने भी समर्थन दिया। लेकिन कांग्रेस, एनसीपी (शरद पवार गुट), समाजवादी पार्टी और सीपीआई (एम) ने इसका कड़ा विरोध किया। विपक्ष ने इसे असंवैधानिक बताया और कहा कि यह किसी खास समुदाय को निशाना बनाता है तथा समाज में दरार डालता है।
विधेयक क्या है और क्यों लाया गया?
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विधानसभा में विधेयक पेश करते हुए कहा कि यह क़ानून किसी खास धर्म के ख़िलाफ़ नहीं है। यह सभी धर्मों पर लागू होगा। इसका मक़सद सिर्फ जबरदस्ती, लालच, धोखे या फर्जी तरीके से होने वाले धर्म परिवर्तन को रोकना है। फडणवीस ने कहा कि अंतरधार्मिक शादियों से जुड़े विवाद अक्सर कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा करते हैं। मौजूदा क़ानूनों में इस तरह के मामलों के लिए साफ़ प्रावधान नहीं हैं, इसलिए नया क़ानून ज़रूरी है।
इस बिल में अवैध धर्मांतरण की सजा 7 साल तक की जेल और 5 लाख रुपये तक जुर्माना हो सकता है। कुछ मामलों में 10 साल तक जेल और 7 लाख जुर्माने का प्रावधान है। नाबालिगों के मामले में सजा और सख्त होगी। जो व्यक्ति या संगठन ऐसा करवाएगा, उसके खिलाफ पुलिस खुद से कार्रवाई कर सकेगी।
धर्मांतरण वाले व्यक्ति को 60 दिन पहले जिला मजिस्ट्रेट को सूचना देनी होगी। यह क़ानून बीजेपी शासित कई अन्य राज्यों में पहले से लागू है। फडणवीस ने कहा कि यह पूरी तरह संवैधानिक है और संविधान के अनुच्छेद 25 यानी धर्म की स्वतंत्रता के अनुरूप है।
शिवसेना यूबीटी का समर्थन - बड़ा उलटफेर
शिवसेना यूबीटी के विधायक भास्कर जाधव ने सदन में विधेयक का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह बिल किसी धर्म को टारगेट नहीं करता, बल्कि ग़लत तरीक़े से होने वाले परिवर्तन रोकता है। सदन के बाहर उद्धव ठाकरे ने कहा, 'धर्म की स्वतंत्रता सबके लिए होनी चाहिए। लेकिन अगर कोई जबरदस्ती, कमजोरी का फायदा उठाकर या झूठे लालच से धर्म बदलवाता है तो हम उसके ख़िलाफ़ हैं। हम इस बिल का पूरा समर्थन करते हैं।'
विपक्ष का विरोध और आरोप
कांग्रेस विधायक असलम शेख ने कहा कि बिल निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला है। उन्होंने कहा, 'धर्म व्यक्तिगत मामला है फिर 60 दिन पहले सार्वजनिक सूचना क्यों? कौन उस व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा?'
एनसीपी (एसपी) विधायक जितेंद्र आव्हाड ने कहा, 'यह धर्म स्वतंत्रता नहीं, धर्म नियंत्रण है।' समाजवादी पार्टी के अबू आजमी और रईस शेख ने इसे 'पिछड़ा' और 'खास समुदाय को निशाना बनाने वाला' बताया। उन्होंने कहा कि सरकार के पास बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन के आंकड़े नहीं हैं। पहले 'लव जिहाद' के 1 लाख शिकायतों का दावा किया गया था, लेकिन सिर्फ 402 दर्ज हुईं। विपक्ष ने मांग की कि बिल को दोनों सदनों की संयुक्त समिति को भेजा जाए, जहां जनता से सुझाव लिए जाएं।
यह मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति में गरमागरम बहस छेड़ रहा है। महायुति सरकार इसे कानून-व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा से जोड़ रही है, जबकि विपक्ष इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताता है। शिवसेना यूबीटी के समर्थन से एमवीए में दरार साफ़ दिख रही है।