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पीने के लिए नहीं तो शराब के कारोबार के लिए कहाँ से आ रहा पानी?

फ़्रांसीसी क्रांति के समय वर्साय के महल पर जमा क्रोधित भीड़ ने राजकुमारी से कहा कि जनता भूखी है। उसके पास खाने को ब्रेड (रोटी) नहीं है, वह क्या करे? राजकुमारी ने कहा कि ‘ब्रेड  नहीं है तो क्या हुआ! जनता से कहो कि वह केक खाए|’ कुछ ऐसा ही संदेश महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र से आता दिख रहा है। इस क्षेत्र में पिछले कई साल से सूखा पड़ा है लेकिन यहाँ बीयर और शराब बनाने के कारखाने बड़े तेज़ी से फल-फूल रहे हैं। 

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महाराष्ट्र की राजनीति में सबसे ज़्यादा दख़ल रखने वाली शुगर लॉबी से जुड़े इस कारोबार की तरफ़ सरकार भी नज़र बंद कर बैठी दिखाई देती है। आलम तो यह है कि तीन साल पहले जब सूखे के हालात पैदा हुए थे और लातूर में पहली बार पानी भरकर 'जलदूत' ट्रेन पहुँची थी तब सरकार का अजीब रवैया दिखा था। उस समय शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा था, ‘सूखा प्रभावित मराठवाड़ा पेयजल की भारी किल्लत से गुज़र रहा है। उससे निबटने के लिए में बीयर बनाने वाली इकाइयों में पानी की आपूर्ति रोक देना चाहिए।' इस पर राज्य सरकार में मंत्री पंकजा मुंडे ने यह बयान दे दिया था कि 'उद्योगों को अपने हिस्से का पानी दिया जा रहा है। शराब और दूसरे कारखानों का पानी रोकने पर रोज़गार की समस्या पैदा होगी, सरकारी राजस्व भी डूबेगा।' उल्लेखनीय है कि पंकजा मुंडे के पिता गोपीनाथ मुंडे जब महाराष्ट्र में पहली बार शिवसेना -बीजेपी की सरकार बनी तो गृहमंत्री थे। उन्होंने उस समय प्रदेश में शुगर लॉबी में सेंध लगाने के लिए प्रयास किये थे और ख़ुद का चीनी का कारखाना भी स्थापित किया। उसके बाद से शुगर लॉबी सत्ता के साथ-साथ अपनी राजनीति का रंग बदलती रहती है। 

शुगर कारखानों को ज़िंदा रखने के लिए गन्ने की खेती को बढ़ावा दिया जाता है जो बहुत बड़ी मात्रा में पानी पी जाती है।  वैसे तो राज्य में गन्ने की खेती की एक सीमा भी सरकार ने तय कर रखी है, लेकिन उससे कई गुना ज़्यादा क्षेत्र में गन्ने की खेती होती है और कोई कार्रवाई नहीं होती। इस शुगर लॉबी का शक्कर के साथ-साथ शराब निर्माण में भी दखल बढ़ रहा है।

पानी की किल्लत बढ़ी, शराब का उत्पादन भी

करोड़ों लीटर पानी खपाकर बीयर बनाने वाले इन कारखानों में इस साल उत्पादन क़रीब 14 फ़ीसदी बढ़ा है। राज्य सरकार ने शराब से साल 2017-18 में 13,449.65 करोड़ रुपये की आय जुटाई थी। मार्च 2018 में बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने साल 2018-19 के लिए 15,343.08 करोड़ रुपये की आय का लक्ष्य रखा था। इसमें भी अप्रैल से दिसंबर 2018 तक 9091.29 करोड़ रुपये की आय का टारगेट था, लेकिन टारगेट से कहीं ज़्यादा 10,546.16 करोड़ रुपये की कमाई हुई है।

पानी की जबर्दस्त किल्लत है, लेकिन आबकारी विभाग के अधिकारी गर्व से कहते हैं कि भले ही बाजार में मंदी हो, लेकिन शराब के उत्पादन और बिक्री में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है। उन्हें चालू वित्त वर्ष में 31 मार्च तक शराब से कमाई में 20 प्रतिशत से ज़्यादा कमाई का भरोसा है।

शराब कंपनियों वाले क्षेत्रों में सूखे की मार

शराब का उत्पादन बढ़ रहा है या उससे सरकार को राजस्व बढ़ रहा है। इससे बड़ा मुद्दा यह है कि जिन क्षेत्रों में ये शराब कंपनियाँ खुल रही हैं या उत्पादन कर रही हैं वहाँ सूखे की मार साल दर साल बढ़ती जा रही है। लोगों के समक्ष खेती और पीने के पानी का संकट है, जबकि करोड़ों लीटर पानी इन कंपनियों को रोजाना दिया जाता है। इसके अलावा इन कंपनियों द्वारा ज़मीन से पानी का बड़ी मात्रा में दोहन भी किया जाता है जिससे ज़मीन का जल स्तर तेज़ी से नीचे गिरता जा रहा है। शराब के उत्पादन के मामले में नासिक, औरंगाबाद, पालघर, अहमद नगर, पुणे तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। 

सरकारी आँकड़े बयाँ कर रहे हैं कि राजस्व प्राप्ति के मामले में औरंगाबाद पहले नंबर पर है। इस ज़िले ने महज नौ महीने में शराब से 3,134 करोड़ रुपये सरकारी तिजोरी को दिए हैं। उल्लेखनीय है कि औरंगाबाद सूखाग्रस्त क्षेत्र मराठवाड़ा का हिस्सा है और मराठवाड़ा में ही किसानों ने बड़ी संख्या में आत्महत्या की है। राजस्व के मामले में दूसरे नंबर पर नासिक रहा जहाँ से 1,871 करोड़ रुपये, तीसरे नंबर पर पुणे 1,195 करोड़ रुपये की कमाई की। अहमद नगर ज़िले से भी सरकार को 1,017 करोड़ रुपये की आय हुई। आबकारी विभाग के अधिकारी कहते हैं कि राज्य में नासिक में वाइन, औरंगाबाद में बीयर और पालघर ज़िले में देशी व अन्य शराब का उत्पादन होता है।

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एक लीटर बीयर पर 6 लीटर पानी बर्बाद

बताया जाता है कि एक लीटर शराब बनाने में औसतन चार लीटर तथा बीयर बनाने में औसतन 6 लीटर पानी लगता है। इस हिसाब से मराठवाड़ा के हिस्से आए पानी में करोड़ों लीटर पानी बीयर और शराब कारखानों में लग जाता है। औरंगाबाद और आसपास के इलाक़ों में जायकवाडी बांध से पानी की सप्लाई होती है। दिनभर में जितना पानी इस बांध से निकलता है, उसमें से क़रीब 60 % पानी इन शराब कारखानों की भेंट चढ़ जाता है। उद्योगों को प्राथमिकता देने के नाम पर बांध से निकलने वाले 54 एमएलडी में से 32 एमएलडी पानी कारखानों के लिए आरक्षित रखा गया है। कुल पानी में से केवल 24 प्रतिशत पानी पीने के लिए रखा गया है। सवाल यह पूछा जा रहा है कि भयावह सूखे की हालत में लोगों के पीने के पानी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, या बीयर और शराब के कारखानों को? सबसे चौंका देने वाला तथ्य यह है कि उद्योगों या बीयर/शराब बनाने वाली कंपनियों को नाममात्र की दर पर पानी की यह आपूर्ति की जाती है।

संजय राय
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