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अख़बार मरेंगे तो क्या लोकतंत्र बचेगा? 

हम गाज़ियाबाद की पत्रकारों की एक सोसायटी में रहते हैं। वहाँ कई बड़े संपादकों और पत्रकारों (अपन के अलावा) के आवास हैं। इस सोसायटी में एक बड़े पत्र प्रतिष्ठान के ही पूर्व कर्मचारी अख़बार सप्लाई करते हैं। वह बताते हैं कि कोरोना से पहले लोग तीन-तीन अख़बार लेते थे। अब कुछ ने अख़बार एकदम बंद कर दिया है और कुछ ने घर में लड़ाई-झगड़े के बाद एक अख़बार पर समझौता किया है। एक दिन पहले एक बड़े अख़बार के बड़े पत्रकार ने बताया कि उनका वेतन एक तिहाई काट दिया गया है। यूरोप की फरलो (छुट्टी पर भेज दिए जाने) वाली कहानी यहाँ भी दोहराई जा रही है।

यह धीरे-धीरे मरते हुए अख़बारों की एक अवस्था है जिसे कोरोना महामारी और उससे उपजी मंदी ने तेज़ कर दिया है। पूरी दुनिया में इस बात पर चर्चा हो रही है कि क्या कोरोना के बाद अख़बार बच पाएँगे या पूरी तरह समाप्त हो जाएँगे? हिंदी हृदय प्रदेशों में अख़बारों की धूम पर `हेडलाइन्स फ्राम हार्टलैंड’ जैसी किताब लिखने वाली शेवंती नाइनन ने द टेलीग्राफ़ में बहुत सारी जानकारियों से भरा हुआ लेख लिख कर बताया है कि किस तरह से पूरी दुनिया में प्रिंट मीडिया संकट में है। इस टिप्पणीकार को इंतज़ार है ऑस्ट्रेलिया के मीडिया विशेषज्ञ राबिन जैफ्री के किसी लेख का, जिन्होंने `इंडियाज न्यूज़ पेपर्स रिवॉल्यूशन’ जैसी चर्चित किताब लिखी थी।

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जैफ्री ने नब्बे के दशक में भारत में उदारीकरण और वैश्वीकरण रूपी पूंजीवाद के विकास के साथ ही अख़बार उद्योग की क्रांति देखी थी। जैफ्री भी बेनेडिक्ट एंडरसन की `इमैजिन्ड कम्युनिटी’ वाली सोच को भारत में लागू करते हैं और देखते हैं कि किस तरह से इन नए क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अख़बारों के विकास के साथ एक नए क़िस्म का लोकतंत्र और राष्ट्रवाद विकसित हुआ है। लेकिन आज वे अख़बार लगातार दुबले होते जा रहे हैं। ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के विकास पर न्यूयॉर्कर में `सिटीजन्स जैन’ जैसा शोधपरक लेख लिखने वाले केन औलेटा भी शायद यह देख कर हैरान होंगे कि इस बड़े पत्र से उनका स्थानीय पुलआउट ग़ायब हो गया है। जबकि वही उनके प्रसार का मुख्य हथियार था।

अख़बारों के इस संकट के बारे में द गार्जियन टिप्पणी करते हुए लिखता है, ‘प्रिंट मीडिया दो दशक से बंद होने की आशंका से ग्रसित था। आज कोरोना ने पूरे ब्रिटेन में 380 साल पुराने अख़बार उद्योग को नष्ट कर दिया है। लगता नहीं कि अब अख़बार बच पाएँगे।’ अख़बारों के मौजूदा संकट के पीछे एक प्रमुख कारण विज्ञापनों का बंद होते जाना और दूसरा व तात्कालिक कारण उसके कागज और स्याही पर लगा संक्रमण का आरोप है। पहला कारण लंबे समय से चल रहा था और दूसरे कारण ने उसके साथ मिलकर कोढ़ में खाज पैदा कर दी है। 

हालाँकि मौजूदा स्थिति आने में प्रौद्योगिकी की भी बड़ी भूमिका है और डिजिटल टेक्नोलॉजी धीरे-धीरे अख़बारों को कागज और स्याही की दुनिया से निकालकर साइबर दुनिया में ढकेल रही थी। इस बीच गूगल और फ़ेसबुक जैसे डिजिटल मंचों ने अख़बारों की सामग्री का मुफ्त में इस्तेमाल करके उनके प्रति लोगों का आकर्षण भी कम कर दिया है। इसीलिए कहा जा रहा है कि जिस गूगल ने अख़बारों को मारा है अब उसे ही उन्हें जीवन दान देने के लिए मदद देनी चाहिए। वे कुछ हद तक तैयार भी हैं क्योंकि नई सामग्री गूगल पैदा नहीं कर रही। संक्रमण का आरोप उसके पाठकों के जीवन और अस्तित्व से जुड़ा है और उसे मिटा पाना आसान नहीं है। 

संक्रमण के आरोप को सैनेटाइज करने के लिए अख़बार उद्योग ने एक साथ मिलकर बहुत सारे जतन किए।

पहली बार सभी अख़बार समूहों ने मिलकर पूरे-पूरे पेज के विज्ञापन दिए। ज़ाहिर सी बात है कि इस विज्ञापन से कोई कमाई नहीं हुई होगी। उसमें अख़बार को व्यक्ति के चेहरे पर मास्क की तरह लगाकर कहा गया था कि अगर झूठी ख़बरों के संक्रमण से बचना है तो अख़बारों के मास्क का सहारा लीजिए।

उसी के साथ यह भी कहा गया था कि अख़बार की छपाई पूरी तरह मशीनीकृत है और उसमें किसी का हाथ नहीं लगता। यहाँ तक कि बिक्री केंद्रों पर भी दस्ताने लगाकर ही हॉकर अख़बार उठाते हैं। भारत के सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने ट्वीट करके कहा — अफवाहों पर विश्वास न करें। समाचार पढ़ने से # CORONA नहीं होता। समाचार पत्र पढ़ने और कोई भी काम करने के बाद साबुन से हाथ धोना है। समाचार पत्रों से हमें सही ख़बरें मिलती हैं।

देश के बड़े वकीलों से भी बयान दिलवाए गए कि अख़बार का प्रसार रोकना ग़ैर-क़ानूनी है। डॉक्टरों की भी राय छापी गई कि अख़बार निरापद हैं। डब्ल्यूएचओ की भी टिप्पणी का उल्लेख करके अख़बारों को सुरक्षित सिद्ध करने का प्रयास हुआ। लेकिन लोग हैं कि अख़बार को छोड़ते ही जा रहे हैं। इस बीच इंडियन न्यूजपेपर्स सोसायटी (आईएनएस) के पदाधिकारी शैलेश गुप्ता ने सूचना प्रसारण मंत्री को पत्र लिखकर अख़बार उद्योग को संकट से बचाने के लिए आर्थिक मदद की माँग की है। उनका कहना है कि सरकार विज्ञापन की दरें 50 फ़ीसदी बढ़ा दे। न्यूज़ प्रिंट पर लगने वाला सीमा शुल्क पाँच फ़ीसदी घटाए। न्यूज़ प्रिंट पर दो साल का टैक्स हॉली डे घोषित करे।

भारत में की जाने वाली ये सारी तदवीरें पूरी दुनिया में चल रही हैं। लेकिन लगता नहीं कि दवा काम करने वाली है।

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कागज, स्याही से रिश्ता तोड़ें अख़बार

अख़बारों को कागज और स्याही से रिश्ता तोड़ना ही होगा और डिजिटल दुनिया में जाना ही होगा। इसके अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है। अख़बारों ने विज्ञापन के बूते पर अपना मूल्य काफ़ी घटा रखा था। वे विज्ञापन से मुनाफ़ा कमाते थे, उससे कागज, स्याही, टेक्नोलॉजी और वितरण का ख़र्च निकलता था और कर्मचारियों को मोटी तनख्वाहें भी देते थे। इस तरह कौड़ियों के दाम में बँटने वाले अख़बारों ने अपनी सामग्री के बूते पर अपनी कमाई का कोई ढाँचा नहीं बनाया था। यह विज्ञापन पर टिका परजीवी ढाँचा था जो विज्ञापन के टेलीविजन और डिजिटल की ओर खिसकते जाने से लड़खड़ाने लगा।

अख़बारों के इस संकट को दुनिया भर के विशेषज्ञ पहले से आते हुए देख रहे थे। ऑस्ट्रेलिया के भविष्यवादी लेखक रास डाउसन ने 2011 में अख़बारों के मरने की चेतावनी देते हुए पूरी दुनिया के लिए एक समय सारणी बना दी थी। 

रास डाउसन का कहना था कि अमेरिका में 2018 में, ब्रिटेन में 2019 में, कनाडा और नार्वे में 2020 में, ऑस्ट्रेलिया में 2022 में अख़बार मर जाएँगे। हाँ, फ्रांस में सरकार की मदद से 2029 तक और जर्मनी में 2030 तक अख़बार रह सकते हैं।

जहाँ तक एशिया और अफ़्रीका के विकासशील देशों की बात है तो वहाँ वे कुछ और दिनों तक अख़बारों का भविष्य देखते हैं।

अख़बारों की मृत्यु का यह टाइम टेबल कुछ विद्वानों के लिए एक बेवजह का हौवा लगता रहा है। मार्क एज ने तो `ग्रेटली एक्जजरेटेडः द मिथ ऑफ़ डेथ ऑफ़ न्यूज़पेपर्स’ लिखकर इसे खारिज भी किया था। लेकिन जो चीज हम अपनी आँख के सामने देख रहे हैं उसे कैसे खारिज कर सकते हैं। अब सवाल यह है कि अख़बार कैसे बचेंगे। एक मॉडल सरकार से आर्थिक सहायता लेकर अख़बार चलाने का है। इसकी अपील करने वाले अख़बार को दूसरे उद्योगों की तरह एक उद्योग मानते हैं और उन्हीं की तरह सरकार से सहायता माँग रहे हैं। उनके लिए उसमें छपने वाले शब्द निष्प्राण क़िस्म के केमिकल हैं। वे मानव जीवन और प्रकृति के सत्य से संवाद नहीं एक केमिकल लोचा पैदा करते हैं जो धंधे में कारगर होता है। दूसरा मॉडल `सेविंग द मीडियाः क्राउड फंडिंग एंड डेमोक्रेसी’ जैसी किताब लिखकर जूलिया केज ने प्रस्तुत किया है। केज का कहना है कि मीडिया ज्ञान उद्योग यानी नालेज इंडस्ट्री का हिस्सा है। लोकतंत्र के कुशल संचालन के लिए इसका रहना ज़रूरी है।

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सरकारी सहायता वाला मीडिया कैसा होगा?

सवाल यह है कि सरकार से सहायता लेकर चलने वाला मीडिया किस तरह सरकार की ग़लत नीतियों और ग़लत निर्णयों पर सवाल उठाएगा और अगर नहीं उठाएगा तो उसका मक़सद तो कम्युनिस्ट और तानाशाही वाले देशों की तरह सरकार की नीतियों का प्रचार बन रह जाएगा। ऐसे में या तो पार्टियों के मुखपत्र निकलेंगे या अख़बार पार्टियों और सरकारों के मुखपत्र बन जाएँगे। हालाँकि काफ़ी कुछ वैसा हो भी गया है। जहाँ तक क्राउडफंडिंग का मामला है तो वह मॉडल अभी तक बहुत सफल नहीं हुआ है। 

जूलिया इस आर्थिक ढांचे में सरकार की सहायता को भी रखती हैं लेकिन उनकी कल्पना में वे लोकतांत्रिक देश हैं जहाँ की सरकारें सहायता देने के बाद उन संस्थानों में हस्तक्षेप नहीं करतीं। 

महात्मा गाँधी का मॉडल

इन मॉडलों से अलग तीसरा और बहुत पुराना मॉडल महात्मा गाँधी ने प्रस्तुत करने का प्रयास किया था। उनका कहना था कि अख़बार अपने ग्राहकों के ख़र्च से चलने चाहिए। अगर वे लोग अख़बार का ख़र्च नहीं उठा सकते जिनके लिए अख़बार निकाला जाता है तो अख़बार को निकालने की ज़रूरत क्या है? वे अपने ‘इंडियन ओपीनियन’ में इसी मॉडल को लागू कर रहे थे और 1915 में दक्षिण अफ़्रीका से चले आने के बाद भी वहाँ रह गए अपने बेटे को इसी प्रकार की सलाह दे रहे थे। इसी के साथ एक चौथा मॉडल रामनाथ गोयनका ने बड़े शहरों में बड़ी इमारतें खड़ी करके प्रस्तुत किया था। उनका सिद्धांत था कि चौथे खंभे की ताक़त इमारत के मज़बूत खंभों पर टिकी होती है (पावर ऑफ़ फोर्थ स्टेट कैन बी सेव्ड बाइ द पावर ऑफ़ रियल एस्टेट)। यानी इमारत के एक फ्लोर पर अख़बार चलेगा और बाक़ी किराए पर उठेंगे। किराए के पैसे से अख़बार की छपाई का ख़र्च और कर्मचारियों का वेतन आएगा और अख़बार सरकार या विज्ञापन पर कम से कम निर्भर रहेगा। लेकिन यह मॉडल उनके यहाँ भी टूट रहा है। एक और मॉडल है सहकारिता या ट्रस्ट का। उस आधार पर अभी भी कुछ अख़बार निकल रहे हैं जो कम विज्ञापन में गुज़ारा करते हैं।

सवाल यह है कि अख़बार मरेंगे तो क्या टेलीविजन और डिजिटल मीडिया उस पूरी ज़िम्मेदारी को उठा पाएगा जो लोकतंत्र के जीवन के लिए ज़रूरी है। शायद उठा भी रहे हैं या नहीं उठा पा रहे हैं। उनकी चीख चिल्लाहट और चाटुकारिता देखकर तो लगता नहीं।

वे ज़्यादा से ज़्यादा लोकतांत्रिक प्रोपेगंडा या मनोरंजन उद्योग के हिस्से हैं। टीवी चैनलों की दिक्कत यह है कि वहाँ ख़बरों के विस्तार या विचार के लिए जगह है ही नहीं। बड़े से बड़े टीवी एंकरों की विचार क्षमता सीमित है और वे विचार पर जाने लगेंगे तो कोई चैनल नाम की नौटंकी को देखेगा ही नहीं। आज के सात साल पहले द इकॉनमिस्ट ने टाम स्टैंडेज द्वारा लिखी कहानी `बुलेटिन्स फ्राम फ्यूचर’ को कवर स्टोरी बनाया था। उसमें इस बात का वर्णन था कि आने वाले समय में समाचारों की दुनिया किस प्रकार की होगी। उस स्टोरी में अख़बारों के मरने के साथ यह भविष्यवाणी की गई थी कि समाचारों की पारिस्थितिकी पूरी तौर पर बदल रही है। ख़बरों की संरचना धीरे-धीरे मास मीडिया के आगमन से पहले वाली स्थिति में पहुँच जाएगी। किसी ख़बर पर बड़े संस्थानों की मोनोपोली रह नहीं जाएगी। हर कोई ख़बर दाता होगा और हर कोई उपभोक्ता। बहुत सारी चीजें गप की शक्ल में होंगी। गप से ही ख़बर निकलेगी और ख़बर बाद में गप बन जाएगी।

निश्चित तौर पर आने वाला समय बड़े बदलाव का है और यह बदलाव लोकतंत्र को भी बदलेगा और हमारे ज्ञान के संसार को भी। बदलाव चल रहा था लेकिन कोरोना ने उसे बहुत तेज़ कर दिया है। लेनिन ने कहा था कि कभी ऐसे दशक गुज़रते हैं जब कुछ नहीं होता और कभी कुछ हफ्तों में ही कई दशक गुज़र जाते हैं। इसी बात को एक साल पहले भाषाविद और नृतत्वशास्त्री गणेश देवी ने इस स्तंभकार से एक इंटरव्यू में कहा था कि अब दुनिया बहुत तेज़ हो गई है और पता नहीं किस कोने से कौन सी बयार बहे और सब कुछ बदल जाए। संभव है आने वाले समय में अख़बार डिजिटल के रूप में नया जन्म लें और अपनी विरासत को बचाए रखें और लोकतंत्र को भी नया रूप दें, क्योंकि आख़िर में लोकतंत्र और तानाशाही कुछ और नहीं सिर्फ़ डाटा प्रणाली की अलग-अलग वितरण व्यवस्था ही तो है। लेकिन उसके पहले बहुत कुछ घटित होना है।

(अरुण कुमार त्रिपाठी के फ़ेसबुक वाल से साभार)

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