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राजेंद्र यादव, कमलेश्वर, मोहन राकेश के 'नई कहानी' आंदोलन जैसी 'सत्य हिंदी'

शुद्ध मन से की गयी कोई भी पहल स्वागत योग्य या आदर के योग्य होती है। बीजेपी और ख़ासतौर पर मोदी के शासन के बाद एक ऐसी ही पहल की ज़रूरत थी। कहना न होगा कि ‘सत्य हिंदी’ की पहल कुछ ऐसी ही सोच के साथ की गयी या होगी। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं कि यह हमारा मात्र अनुमानभर है। लेकिन जब अच्छे और बड़े नाम इससे जुड़े मसलन, अपूर्वानंद, उर्मिलेश आदि और उन्होंने इसकी वेबसाइट पर लिखना शुरू किया तो हमने मान लिया कि तीन-चार लोगों की यह पहल ग़ौरतलब है। इसके चलते साहित्य जगत में 'नई कहानी' का आंदोलन याद हो आया जो राजेंद्र यादव, कमलेश्वर और मोहन राकेश की पहल से शुरू हुआ था।

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'सत्य हिंदी' में आशुतोष हैं। शीतल पी. सिंह हैं। शैलेष हैं और कमर वहीद नकवी, जिनकी पत्नी फ़ेसबुक पर हमारी मित्र भी हैं। 'सत्य हिंदी' के यों तो सभी वीडियो प्रासंगिक हैं, लेकिन दो हल्की-सी खामियाँ हमें लगती हैं। एक तो यह कि ये आवश्यकता से 'कुछ' अधिक लंबे लगते हैं। अक्सर यह लगता है कि बात आधे में ख़तम हो चुकी है, अब व्यर्थ ही आगे खींचा जा रहा है। दूसरा यह कि इन्होंने ठान लिया है कि हर विषय पर कुछ कहना ही है। मसलन, मुंबई में सत्ता के ड्रामे में आशुतोष जी हर रोज़ आ रहे थे। भैया, हर पल स्थितियाँ बदल रही थीं। उनका मिज़ाज बदल रहा था। इसलिए हमने उससे ज़्यादा नीलू व्यास का 'सुनिए सच' सुना। वह हमें कहीं ज़्यादा सटीक लगा। इस तरह से रनिंग कमेंट्री या भेड़चाल में शामिल होना आपकी साख को ही मैला करता है।

आशुतोष स्वभाव से चंचल लगते हैं। ईमानदार तो हैं ही, मेधावी भी हैं। स्पष्ट नज़रिया भी रखते हैं पर साथ ही कम ज़िद्दी नहीं। कभी-कभी ज़रूरत से ज़्यादा उत्साही भी हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति यदि अपने को साध ले तो सबकी पसंद बन जाता है। इसके विपरीत लगता है शीतल पी. सिंह शांत, गम्भीर लेकिन स्पष्ट और बेहद ईमानदार हैं। उनको सुनना अच्छा लगता है। लेकिन अपनी ईमानदारी में वे बोलते-बोलते कब तेज़ आवाज़ में आ जाते हैं, यह वह ख़ुद भी नहीं जान पाते। फिर भी बातूनी अंदाज़ में आपको प्रभावित करते हैं। शैलेष में ईमानदारी और स्पष्टता तो है लेकिन धाराप्रवाह नहीं हो पाते। अटकते हैं। लिहाज़ा आशुतोष और शीतल से उन्नीस ही पड़ते हैं। हाँ, राज्यसभा चैनल से आयीं नीलू व्यास ने एकदम अलग से प्रभावित किया है। उनका 'सुनिए सच' तेज़ी से लोकप्रिय होता दिख रहा है। उनकी स्पीड अनावश्यक तेज़ है और रोज़ाना का यह सब कहना कि '...क्योंकि आपको जानना चाहिए सच...' आदि उसी तरह बोर होता है जैसे आशुतोष मुँह फाड़ कर नमस्कार कर बोर करते हैं। फिर भी नीलू का रोज़नामचा बढ़िया है। इसलिए भी कि अगर कोई दिनभर की महत्वपूर्ण ख़बरों से छूट जाए तो आठ बजे के बाद कभी भी 'सुनिए सच' सुन ले। कह सकते हैं कि उनका यह वीडियो किसी हद तक दूसरे चैनलों की भरपाई करता है। 'सत्य हिंदी' के विषय में यह सब हमने इसलिए लिखा क्योंकि कई मित्रों ने हमसे आग्रह किया था कि जितना हम जानते समझते हैं उतना विस्तार से लिखें। यह हमने केवल उन्हीं मित्रों के लिए लिखा है। क्योंकि कई हैं जो मेरे लिखे के बाद देखना पसंद करते हैं। फ़िल्मों पर मेरी राय के बाद फ़िल्म देखते हैं।

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अरविंद मोहन का भेजा हुआ गाँधी के चंपारण सत्याग्रह पर  राजकुमार शुक्ल की अद्भुत कहानी वाला वीडियो काफ़ी अच्छा लगा। शुक्ल जी तो इसी से अमर हो गये कि वे गाँधी जी को चंपारण लाने में कामयाब हो गये थे। उस वक़्त की ईमानदारी भी देखिए कि शुक्ल के धुर-विरोधी जो उनसे मुक़दमा लड़ रहे थे उनके मरने के बाद उन्हीं के परिवार की कितनी बड़ी आर्थिक मदद करते हैं। अद्भुत है! यह सब स्वप्नमय है आज के कलयुगी समय में।

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बसंत पांडेय
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