ओडिशाः आदिवासी महिलाओं के आंदोलन ने ज़ोर पकड़ा
रायगड़ा जिले के सिझिमाली के आसपास के गांवों में सैकड़ों आदिवासी महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं। उनके हाथ में नारे नहीं, हथियार नहीं, सिर्फ साहस और संकल्प है। वे अपनी जमीन की रक्षा कर रही हैं। भारी पुलिस तैनाती और बिना सोचे-समझे गिरफ्तारियों ने पुरुषों को गांव छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। घरों में पिता, भाई, बेटे नहीं बचे। अब महिलाएं ही आखिरी मोर्चा संभाल रही हैं। वे उस व्यवस्था के खिलाफ खड़ी हैं जिसे सरकार 'विकास' का नाम दे रही है।
आदिवासी महिलाओं के आंदोलन का मुख्य मुद्दा आदिवासी समुदायों की अस्तित्व की लड़ाई है। वे अपनी पारंपरिक जमीन, जंगलों, पानी के स्रोतों, कृषि और सांस्कृतिक पहचान को बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। सरकार इन पहाड़ियों को बॉक्साइट खनन के लिए निजी और सरकारी कंपनियों को सौंप रही है। इससे हजारों आदिवासियों का विस्थापन, पर्यावरण पर भयानक और उनकी आजीविका का अंत होने का खतरा है।
सिझिमाली में वेदांता ग्रुप को 2023 में नीलामी के जरिए सिझिमाली बॉक्साइट ब्लॉक (लगभग 311 मिलियन टन भंडार) सौंपा गया। यहां पर
खुली-कास्ट माइनिंग से पहाड़ियों का विनाश हो रहा है। आदिवासियों (खासकर कोंध और परोजा समुदाय) के लिए ये पहाड़ियां पवित्र हैं। वे उसकी पूजा करते हैं। इसे वे अपनी सदियों पुरानी परंपरा की पहचान भी मानते हैं। उनकी आजीविका इन्हीं पहाड़ियों पर निर्भर है। आदिवासियों को जमीन और जंगल का नुकसान हो रहा है। आदिवासी खेती, जंगल और वन्य जीवों पर निर्भर हैं। पर्यावरणविद यहां पानी के स्रोतों के सूख जाने की आशंका जता रहे हैं। यहां के बारहमासी झरनों और नदियों पर असर पड़ेगा।
सामाजिक संगठनों का आरोप है कि राज्य में सरकार बदलने के बाद पूरा सरकारी रुख बदला हुआ है। ग्राम सभाओं में जालसाजी, फर्जी हस्ताक्षर के जरिए खनिज वाली जमीनें हासिल की जा रही हैं। विरोध करने वाले गांवों के लोगों पर एफआईआर हो रही है। पुलिस उन पर बराबर नाजायज दबाव बना रही है। यहां पर 3 किमी लंबी सड़क बनाने के विरोध में हाल ही में हिंसक झड़पें हुईं। जिसमें पुलिस और आदिवासियों दोनों के लोग घायल हुए। पुरुषों की गिरफ्तारियों के बाद महिलाओं ने मोर्चा संभाल लिया है।
सेरुबंधा (कोरापुट, पटनागी ब्लॉक) में नाल्को (National Aluminium Company Limited) को पहाड़ियों में बॉक्साइट खनन की अनुमति दी गई। यहां 30 से ज्यादा गांव प्रभावित हैं। जिनमें खेती, जंगल, नदियां और उनके शब्दों में पवित्र पहाड़ियां खतरे में हैं। आदिवासियों की मुख्य चिंता है कि यहां खनन से हजारों एकड़ जंगली पहाड़ी इलाका नष्ट होगा। इससे यहां के प्राकृतिक जल स्रोतों सूख जाएंगे और प्रदूषण बढ़ेगा। यहां के 90% से ज्यादा लोग खेती और वन संपदा पर निर्भर हैं। वो पूरी तरह से नष्ट हो जाएगी। यह इलाका पहले से ही पर्यावरण संरक्षण के लिए पुरस्कृत हो चुका है। लेकिन अब वही पहचान मिटने जा रही है। सड़क निर्माण के विरोध में यहां आदिवासी महिलाएं पहरा दे रही हैं। पुरुनापादर जंक्शन पर महिलाएं और लड़कियां अग्रिम पंक्ति में खड़ी दिखाई दीं।
ओडिशा के तीन प्रमुख राजनीतिक दल बीजेपी, बीजू जनतादल (बीजेडी) और कांग्रेस चुप क्यों हैंः आरोप है कि इन तीनों ही दलों को कॉरपोरेट से जबरदस्त चंदा मिला है। आदिवासी महिलाओं की लड़ाई लड़ने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और संगठन कह रहे हैं कि यह महज़ संयोग नहीं, बल्कि सांठगांठ है। आरोप है कि भाजपा को ₹327 करोड़ से ज्यादा, कांग्रेस को ₹135 करोड़ और बीजेडी को ₹65 करोड़ का चंदा कॉरपोरेट ने दिया है। ये चंदा नहीं, बल्कि उनका निवेश हैं। इतना पैसा आने के बाद राजनीतिक दलों का आक्रोश सेलेक्टिव हो जाता है, जवाबदेही गायब हो जाती है और 'विरोध' सिर्फ प्रदर्शन बनकर रह जाता है। सवाल उठता है ये नेता आखिर किसके प्रतिनिधि हैं? जनता के या पेमेंट मास्टर के?
यह आदिवासी महिलाओं की लड़ाई सिर्फ सिझिमाली या सेरुबंधा की नहीं है। यह उस मॉडल के खिलाफ है जिसमें विकास का नाम लेकर लोगों की जिंदगी, संस्कृति और अस्तित्व को कुचला जा रहा है। वे कह रही हैं- हमारी जमीन हमारी है, हम इसे नहीं छोड़ेंगे। अब सवाल यह है कि सरकार और मुख्यधारा की पार्टियां कब तक इस सच्चाई को नजरअंदाज करती रहेंगी?
आदिवासी महिलाओं का आंदोलन नया नहीं है। इससे पहले नियामगिरि आंदोलन (2003-2014) भी इसी तर्ज पर चला था। नियामगिरि आंदोलन भी बॉक्साइट खनन के खिलाफ आदिवासी समुदायों की अस्तित्व की लड़ाई थी। जिस तरह नियामगिरि पहाड़ियों को डोंगरिया कोंध आदिवासी नियाम राजा (धर्म का राजा) का निवास मानते हैं। उसी तरह सिझिमाली और सेरुबंधा की पहाड़ियां भी स्थानीय कोंध और परोजा समुदायों के लिए पवित्र हैं। खनन को वे अपनी पूजा स्थल और पहचान के विनाश के रूप में देखते हैं। नियामगिरि में भी नाल्को और वेदांता ग्रुप को सरकार ने खनन के पट्टे दिए थे। सिझिमाली में भी इन्हीं दोनों कंपनियों के पास लाइसेंस है।
नियामगिरि आंदोलन के दौरान डोंगरिया कोंध और कुटिया कोंध आदिवासी समुदायों ने वेदांता कंपनी के बॉक्साइट खनन प्रोजेक्ट के खिलाफ कानूनी लड़ाई भी लड़ी। इस आंदोलन की सबसे बड़ी कानूनी जीत 18 अप्रैल 2013 को सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हुई, जिसे भारत के आदिवासी और पर्यावरणीय न्याय के इतिहास में लैंडमार्क जजमेंट माना जाता है।
अदालत ने माना कि नियामगिरि पहाड़ियां डोंगरिया कोंध आदिवासियों के धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अधिकारों का हिस्सा हैं। ये पहाड़ियां उनके लिए "नियाम राजा" (धर्म का राजा) का निवास स्थान हैं।
इसी फैसले में ग्राम सभा को अंतिम फैसला देने का अधिकार दिया गया कि प्रस्तावित खनन परियोजना उनके व्यक्तिगत या सामुदायिक अधिकारों (धार्मिक, सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और आजीविका संबंधी) को प्रभावित करेगी या नहीं। ग्राम सभा की मंजूरी पूर्व शर्त रखी गई। बिना ग्राम सभा की सहमति के खनन नहीं हो सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि ग्राम सभा की बैठकें पूरी तरह स्वतंत्र होनी चाहिए। न तो कंपनी (वेदांता) और न ही सरकार के अधिकारी दबाव डाल सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ओडिशा सरकार ने प्रभावित क्षेत्र की 12 ग्राम सभाओं में विशेष बैठकें (पल्ली सभा) आयोजित कीं। सभी 12 ग्राम सभाओं ने एकमत से (unanimously) वेदांता के बॉक्साइट खनन का विरोध किया। आदिवासियों ने कहा:खनन से उनकी पवित्र पहाड़ियां नष्ट हो जाएंगी। यह भारत का पहला पर्यावरणीय जनमत संग्रह (environmental referendum) माना जाता है। लेकिन सरकार ने बिना कुछ बोले इसे स्वीकार नहीं किया।
ओडिशा के सिझिमाली और अन्य गांवों में उठा मौजूदा आंदोलन दरअसल, मुख्य रूप से सरकार विरोधी आंदोलन है। राज्य में बीजेपी सत्तारूढ़ पार्टी है। नाम के लिए आदिवासी समुदाय से मुख्यमंत्री भी है। लेकिन मुख्यमंत्री को दिल्ली से आए आदेशों को मानना पड़ता है। सरकार ने अब आदिवासियों की ज़मीन लेने के लिए तरीका बदल लिया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले की काट तलाश ली है। अब वहां आदिवासियों की जमीन लेने के लिए ग्राम सभा से फर्जी प्रस्ताव पारित करवा कर ज़मीने हथियाई जा रही है।