हिंदी पत्रकारिता जब अपने उद्भव के दो सौ वर्ष पूरा करके विकास की ऐसी अवस्था में पहुंच गई है जब उसके चीखने और उछलने वाले एंकर, संवाददाता और संपादक अपनी कामयाबी इस बात में मानते हैं कि वे समाज में नफरती कहानियां और बहसें चलाते हुए सत्ता के कितने क़रीब पहुंच जाएं और कितनी जल्दी सूचना आयुक्त या राज्यसभा के सदस्य बन जाएं। वे सत्ताधीशों के साथ कितनी विदेश यात्राएँ करें या कितने धार्मिक आयोजनों में मंच पर रहें, या फिर वे अपने निरंतर बढ़ते हुए लाखों के पैकेज का अनंत काल तक आनंद लेते रहें और बार-बार परदे पर किसी विपक्षी नेता को डांटते हुए अपना ग्लैमर बिखेरते रहें। ऐसे समय में कोई पत्रकार हाल में शहीद हुई लेबनान की पत्रकार अमल खलील पर क्यों कुछ लिखना और उनसे कुछ सीखना चाहेगा। लेकिन इस स्तंभकार को लगता है कि अमल खलील की पत्रकारिता और उनके छोटे से जीवन से सीखने और उससे पश्चिम एशिया और उसकी जोखिम भरी पत्रकारिता को समझने में बहुत मदद मिल सकती है। उनका जीवन हमारी दो सौ वर्षीय हिंदी पत्रकारिता को आइना दिखाने का साहस भी रखती है।

 इसराइली सेना ने की हत्या

बयालीस वर्षीय अमल खलील(1984-2026) बेरूत के अरबी अखबार अल-अखबार की पत्रकार थीं। जिन्हें पिछले हफ्ते दक्षिणी लेबनान में इसराइली सेना ने निशाना लगाकर मार डाला। हिंदी के ग्लमैर वाले पत्रकारों के मुकाबले सत्रह साल के अनुभव वाले इस पत्रकार का सैलेरी पैकेज भी बहुत मामूली था। उन्हें पहले से ही धमकियां दी गई थीं कि संभल जाएं नहीं तो मार दी जाएंगी। लेकिन पत्रकारिता उनका जुनून था। वे जिस मलबे में दबी हुई थीं वहां से उन्हें निकाले जाते समय भी उस पर इसराइली सेना मिसाइलें बरसा रही थी ताकि उन्हें किसी भी कीमत पर बचाया न जा सके। इस बात को रेडक्रॉस के कर्मचारियों ने कहा है, जिसका इसराइली सेना ने खंडन किया है। वे उस दक्षिणी लेबनान की विशेषज्ञ थीं जिस पर इसराइल लगातार हमले कर रहा है और तमाम शांति वार्ताओं के बाद भी वहां से हटने को तैयार नहीं है।
यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या अमल खलील युद्ध संवाददाता थीं। वे स्वयं एक इंटरव्यू में इस बात से इंकार करती हैं। उनका कहना है कि उनके पास वैसा कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं था जो युद्ध संवाददाता के पास होता है। वे अपने को फील्ड करेसपांडेंट (क्षेत्र संवाददाता) बताती हैं। इसराइली हमले और लेबनानी प्रतिरोध के बीच उन्होंने जिस तरह की खबरें कीं वे अपने में एक मिसाल हैं। विशेषकर आज अपने परदे पर सनसनीखेज तरीके से मिसाइलों और युद्धों को दर्शाने वाली टीवी पत्रकारिता और युद्ध पर रंग बिरंगे पन्ने सजाने वाले अखबारों को सिखाने के लिए अमल खलील के पास बहुत कुछ है। 

लेबनान में रिपोर्टिंग पर खलील की राय

खलील ने कहा था कि ज्यादातर पत्रकार आग लगाऊ रिपोर्टिंग करते हैं। वे लोग भी जो इसराइली हमले की ओर से कर रहे हैं और वे भी जो लेबनान और फिलस्तीनी जनता की ओर से उनके हमले से होने वाले विनाश को दर्शाते हैं। खलील के अनुसार ऐसे पत्रकार जो लेबनान की ओर से रिपोर्टिंग करते हैं वे एक जवाबी प्रोपेगैंडा चलाते हैं। वे इसराइली हमले से हुए नुकसान को कम करके दर्शाते हैं और प्रतिरोध को बड़ी उपलब्धि के तौर पर बढ़ा-चढ़ा कर दिखाते हैं। उसके विपरीत अमल खलील ने वस्तुगत रिपोर्ट दिखाने की कोशिश की ताकि पाठक या दर्शक इसराइली हमले के प्रति सावधान रहें। उनकी रिपोर्टिंग के दो पक्ष थे। एक लेबनानी और फिलस्तीनी प्रतिरोध की ख़बर देना और दूसरा सामान्य नागरिकों के जीवन की सच्चाई बताना।

अमल का कहना था कि वे इसराइली हमलों और उसके बाद की स्थितियों का दस्तावेजीकरण करती थीं। इसमें उनके दो उद्देश्य थे। एक तो साम्यवादी विचार और दूसरा प्रतिरोध। उन्होंने 2006 और 2023 के हमलों को भी विस्तार से कवर किया था। उन्हें अपना गांव छोड़कर भागना भी पड़ा था। फिर भी वे दक्षिणी लेबनान में कवरेज के लिए जाया करती थीं।

अखबार में खबरें लिखने के कारण उन्हें कम लोग ही जानते थे। लेकिन उनकी रिपोर्ट को लोग पढ़ते थे। बल्कि उनके संपादक का कहना था कि उन्हें बहुत कुछ सिखाने और बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि उनमें एक स्वाभाविक किस्म का पत्रकार है। अमल ने 2020 से अपना वीडियो बनाना शुरू किया लेकिन उन्होंने अपने वीडियो में खुद को कभी नहीं प्रस्तुत किया। वे कहती भी थीं कि मैं कहानी कहने के लिए हूं न कि खुद कहानी बनने के लिए। उनकी यह बात आज के हिंदी पत्रकारों के एकदम विपरीत है जो बिना कुछ किए धरे हमेशा कहानी बनने को लालायित रहते हैं।

अमल खलील खुद कहानी बन गईं

लेकिन आखिर में अमल खलील खुद कहानी बन गईं क्योंकि अपनी उत्पीड़ित जनता की कहानी कहने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, घर, परिवार, करियर और जीवन भी। अमल जानती थीं कि उनके साथ क्या होने वाला है। उन्हें मालूम था कि पिछले दो सालों में गजा में कितने पत्रकार मारे गए। यहां तक कि उनके अखबार के वरिष्ठ संवाददाता असफ अबू रहल कुछ साल पहले जब दक्षिणी लेबनान के कवरेज के लिए आए थे तो उन्हीं के सामने उन्हें इसराइली सैनिकों ने मार डाला था। थोड़ी देर बाद एक इसराइली सैनिक ने अमल से पूछा था कि क्या वे अल-अखबार की पत्रकार हैं, जब उन्होंने हां कहा तो इसराइली सैनिक ने उन्हें खून से सना हुआ उनका परिचय पत्र पेश किया और कहा कि अब यही बचा है।
अमल खलील के जीवन और उनकी पत्रकारिता के बहाने यह सवाल लाजिमी है कि वे युद्ध संवाददाता थीं या शांति संवाददाता। यहां हम नार्वे के मशहूर समाजशास्त्री और शांति अध्येता जोहान गाल्तुंग के हवाले से कह सकते हैं कि अमल ने शांति की पत्रकारिता की। वैसे जैसे भारत में तमाम पत्रकार नफ़रत के ख़िलाफ़ अपनी जान जोखिम में डालकर दंगों में कूदते रहे हैं। जिनमें सबसे बड़ा नाम है गणेश शंकर विद्यार्थी का। उन्हीं की परंपरा के कई पत्रकार रहे हैं जिन्होंने अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को अपनी जान जोखिम में डालकर भीड़ के उन्माद और उसे भड़काने वालों की सच्चाई दर्शाने की कोशिश की थी।

युद्ध बनाम शांति की पत्रकारिता

युद्ध की पत्रकारिता और शांति की पत्रकारिता का अंतर साफ़ करते हुए गाल्तुंग कहते हैं कि आमतौर पर पारंपरिक पत्रकारिता युद्ध की पत्रकारिता है। वह एक तरफ़ के विनाशकारी हथियारों के जखीरों और सैन्य शक्ति का गौरवगान करती है और विनाश का प्रचार करती है। वह नेताओं और सैनिक अधिकारियों के चुनौती देने वाले और भड़काने वाले बयानों को बढ़ाचढ़ाकर पेश करती है। उसके वर्णनों में आमजन के दुखों और तकलीफों के लिए बहुत कम जगह होती है और न ही उनके शांति प्रयासों को स्थान दिया जाता है।
 
जबकि शांति की पत्रकारिता में आमजन के दुखों और तकलीफों को जगह दी जाती है। उनके शांति प्रयासों को रिपोर्ट किया जाता है और विवाद के वास्तविक इतिहास को पेश करते हुए उसे हल करने के उपाय चर्चा में लाए जाते हैं। शांति की पत्रकारिता सच का अन्वेषण करती है और हिंसा संरचनागत और सांस्कृतिक कारणों को उजागर करती है। जहां युद्ध की पत्रकारिता हिंसा और उसके माध्यम से मिलने वाली हार जीत के प्रति झुकाव और पूर्वग्रह प्रदर्शित करती है वहीं शांति की पत्रकारिता एक तरफ विवाद के प्रति अपनी संवेदनशीलता दर्शाती है और दूसरी ओर उसके समाधान के प्रति बेचैन रहती है।
युद्ध की पत्रकारिता दोनों पक्षों के बीच मौजूद मतभेदों को बढ़ाते रहने और उनकी वजह से शांति वार्ताओं की विफलता का प्रचार करती है। जबकि शांति की पत्रकारिता दोनों पक्षों के बीच की समानताओं को रिपोर्ट करती है। पहले के समझौतों का उल्लेख करती है और साझापन की दिशा में होने वाली प्रगति का वर्णन करती है। युद्ध की पत्रकारिता मानती है कि हिंसा की वजह हिंसा ही है जबकि शांति की पत्रकारिता हिंसा के पीछे के ठोस कारणों को ढूंढती है। युद्ध की पत्रकारिता एक पक्ष को विजय दिलाने और दूसरे पक्ष को पराजित करने के अभियान में लगी रहती है और मानती है कि बिना हार जीत के शांति और समाधान संभव नहीं होता। जबकि शांति की पत्रकारिता बीच का रास्ता निकालने में लगी रहती है।

अमल खलील अपने को अगर युद्ध संवाददाता नहीं मानती थीं तो ठीक ही था। हालांकि उन्होंने लेबनान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध को ही एक क्षेत्र संवाददाता के रूप में कवर किया। पता नहीं उन्होंने जोहान गाल्तुंग की शांति पत्रकारिता के सिद्धांतों का अध्ययन किया था या नहीं, लेकिन यह तय है कि आज के मुख्य धारा के मीडिया के विपरीत उनकी पत्रकारिता देश और दुनिया को शांति की ओर ही ले जाने वाली थी। उनकी शहादत उन्हें पत्रकारिता के उसूलों के प्रति समर्पित संवाददाता के रूप में प्रमाणित करती है। ऐसे ही लोगों के लिए फैज ने कहा हैः—
जिस धज से कोई मकतल को गया,
वो शान सलामत रहती है।
ये जान तो आनी जानी है,
इस जान की कोई बात नहीं।