अमेरिका कभी एक सीधी, स्पष्ट और भरोसेमंद कहानी हुआ करता था।
दुनिया उसे एक ऐसे देश के रूप में देखती थी, जो आज़ादी को अपना आधार मानता है, लोकतंत्र को अपना स्वभाव और नैतिकता को अपनी शक्ति। किताबों में उसका चेहरा उजला दिखता था। फिल्मों में उसका आत्मविश्वास चमकता था। वॉशिंगटन और जेफ़रसन की नींव थी। लिंकन की करुणा थी। केनेडी का सपना था। युद्ध के बाद यूरोप को खड़ा करने की इच्छा थी। जापान को फिर से बनाने का संकल्प था। चीन को दुनिया से जोड़ने की दूरदृष्टि थी। विश्वविद्यालयों की प्रतिष्ठा थी। संवाद की गहराई थी। संस्कृति का आकर्षण था। दुनिया मानती थी कि अमेरिका केवल ताक़त नहीं देता, वह एक नैतिक दिशा भी दिखाता है।
यह छवि धीरे-धीरे बदली है। आज दुनिया जिस अमेरिका को देखती है, वह अक्सर अपने ही आदर्शों से उलझा दिखाई देता है। एक ऐसा नेतृत्व उभरा, जो खुलेआम कह सकता था कि वह फिफ्थ एवेन्यू पर किसी को गोली मार दे, तब भी कुछ नहीं होगा। जो कानून को सुविधा की तरह मोड़ता था। जो सत्ता को निजी सौदों का औज़ार बनाता था। जो संस्थाओं को बाधा और सच को दुश्मन मानता था। जो बातें कभी किसी लोकतंत्र को शर्मसार कर देतीं, वे सामान्य व्यवहार बनती चली गईं। नैतिक सीमाएँ धुंधली पड़ती गईं। संस्थाओं की गरिमा कमजोर होती गई। दुनिया ने देखा कि अमेरिका अपने ही बनाए मूल्यों से दूर खिसक रहा है।
यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। इसके बीज बहुत पहले बोए जा चुके थे।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद का अमेरिका
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमेरिका जिस आत्मविश्वास से खड़ा हुआ था, उसकी नींव आर्थिक समृद्धि, सामाजिक गतिशीलता और भविष्य के भरोसे पर टिकी थी। कारखाने चलते थे। शहर फलते-फूलते थे। नौकरियाँ स्थिर थीं। मध्यवर्ग मज़बूत था। पर समय के साथ यह ढाँचा टूटने लगा। फैक्ट्रियाँ बंद हुईं। उत्पादन विदेश गया। नौकरियाँ कम हुईं। असमानता बढ़ती चली गई। अमीर और अमीर होते गए। आम आदमी की ज़िंदगी सिमटती चली गई। छोटे शहर, कस्बे और ग्रामीण इलाके खाली होने लगे। लोग महसूस करने लगे कि देश आगे बढ़ रहा है, लेकिन वे खुद पीछे छूटते जा रहे हैं।
यहीं से भरोसे की दरार शुरू हुई। यह दरार धीरे-धीरे गुस्से में बदली। और गुस्सा राजनीति का सबसे आसान ईंधन होता है।इसी अमेरिका के जिन इलाकों में कभी काम और आत्मसम्मान था, वहाँ अब निराशा और असुरक्षा फैलने लगी। समुदाय बिखरने लगे। भविष्य धुंधला होने लगा। ऐसे माहौल में वह राजनीति पनपी, जो सरल जवाब देती है— कि समस्या बाहर से आई है, कि कोई दुश्मन है, कि दीवारें ही समाधान हैं।
जटिल आर्थिक और सामाजिक संकटों को पहचान और नस्ल के सवालों में बदल दिया गया। जब अवसर घटते हैं, तो भरोसा टूटता है। और जब भरोसा टूटता है, तो लोकतंत्र कमजोर पड़ने लगता है।
बराक ओबामा का चुनाव उजली किरण
2008 में बराक ओबामा का चुनाव इस अंधेरे में एक उजली किरण था। एक अश्वेत राष्ट्रपति, जिसने आर्थिक संकट में देश को संभाला, स्वास्थ्य सुधार लागू किए, और दुनिया से संवाद को फिर जीवित किया। यह अमेरिका के आत्मसुधार की क्षमता का प्रमाण था। पर इसी क्षण से प्रतिक्रिया की राजनीति भी तेज हो गई। नस्ल का पुराना घाव फिर उभर आया। यह डर फैलाया गया कि देश बदल रहा है, कि पहचान खो रही है। झूठे आरोप लगे कि ओबामा अमेरिकी नहीं हैं। यह प्रतिक्रिया जितनी भावनात्मक थी, उतनी ही राजनीतिक भी। इसी दौर में ध्रुवीकरण गहराया, और समझौते की संस्कृति कमजोर होती चली गई।
2010 के बाद टी पार्टी आंदोलन और फिर 2016 में डोनाल्ड ट्रंप का उदय इसी पृष्ठभूमि की उपज था। ट्रंप ने खुद को व्यवस्था-विरोधी बताया, आम लोगों की आवाज़ कहा। लेकिन उनकी नीतियों ने असमानता को और बढ़ाया, संस्थाओं को कमजोर किया और समाज को और विभाजित कर दिया। मीडिया के समानांतर संसार बने। सच और झूठ के बीच की रेखा धुंधली होती चली गई। भरोसा, जो लोकतंत्र की आत्मा है, लगातार क्षरित होता गया।
विदेश नीति में भी यही प्रवृत्ति दिखी।
इराक और लीबिया जैसे युद्धों ने पहले ही वैश्विक भरोसे को कमजोर किया था। फिर “अमेरिका फर्स्ट” का नारा आया — जलवायु समझौतों से दूरी, बहुपक्षीय संस्थाओं से अलगाव, सहयोग की जगह टकराव की भाषा। और अंततः 6 जनवरी 2021 का हमला, जिसने दिखा दिया कि लोकतंत्र केवल बाहर नहीं, भीतर से भी ख़तरे में पड़ सकता है।
नागरिक को उपभोक्ता बनाया
यह सब केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है। यह एक पूरे राजनीतिक और सामाजिक ढांचे की थकान का परिणाम है। संस्थाएँ थक चुकी हैं। राजनीति कठोर हो गई है। धन का प्रभाव बढ़ गया है। चुनावी लाभ लोकतांत्रिक मर्यादाओं से ऊपर चला गया है। नागरिक को उपभोक्ता में बदल दिया गया है। और सार्वजनिक जीवन से नैतिकता धीरे-धीरे बाहर होती चली गई है।
फिर भी, अमेरिका की कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है।
यह देश कई बार अपने अंधेरों से बाहर आया है— गृहयुद्ध के बाद, महामंदी के बाद, नागरिक अधिकार आंदोलन के बाद। उसकी सबसे बड़ी ताकत उसकी संस्थाएँ नहीं, बल्कि उसकी आत्मालोचना की क्षमता रही है। सवाल पूछने की परंपरा। बहस की संस्कृति। सुधार की इच्छा।
आज फिर वही क्षण सामने है।अगर अमेरिका को अपनी दिशा वापस पानी है, तो उसे असमानता से लड़ना होगा। शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश बढ़ाना होगा। काम और सम्मान को फिर जोड़ना होगा। और सबसे ज़रूरी — एक ऐसी साझा कहानी बनानी होगी, जिसमें हर नागरिक खुद को शामिल महसूस करे।
अमेरिका का पेंडुलम आदर्शों से प्रतिक्रिया की ओर झूल चुका है। अब प्रश्न यह है कि क्या वह फिर न्याय, संतुलन और भरोसे की ओर लौट पाएगा।
दुनिया यह प्रश्न इसलिए नहीं पूछ रही कि वह अमेरिका से प्रेम करती है, बल्कि इसलिए कि उसकी दिशा का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है। जब अमेरिका की रोशनी मंद होती है, तो अंधेरा केवल उसके भीतर नहीं फैलता— वह दूर-दूर तक जाता है।