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पश्चिम बंगाल में भी बीजेपी को फ़ायदा पहुँचायेंगे ओवैसी 

मेरी भविष्यवाणी है कि आगामी पश्चिम बंगाल चुनाव में भी बीजेपी बहुमत हासिल करेगी। पश्चिम बंगाल में जाति का अधिक महत्व नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में धर्म महत्वपूर्ण हो गया है। राज्य पहले धर्मनिरपेक्षता का गढ़ था। दोनों प्रमुख दलों, कांग्रेस और सीपीएम धर्मनिरपेक्ष थे लेकिन हाल के वर्षों में राज्य धार्मिक तर्ज पर बड़े पैमाने पर ध्रुवीकृत हो गया है। इसका दोष मुख्य रूप से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जाना चाहिए। 
जस्टिस मार्कंडेय काटजू
बिहार विधानसभा चुनाव समाप्त हो चुके हैं। लगभग सभी जनमत सर्वेक्षणों में तेजस्वी यादव की बढ़त दिखायी गयी थी। तेजस्वी की विशाल रैलियों में भारी बेरोज़गारी, नौकरियों की तलाश में बिहारियों के अन्य राज्यों में पलायन जैसे मुद्दे छाये रहे फिर भी एनडीए ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि बिहार के साथ-साथ अधिकांश अन्य भारतीय राज्यों में भी मतदाता इस बात से चिंतित नहीं हैं कि उनके राज्य में ग़रीबी, बेरोज़गारी, कुपोषण, स्वास्थ्य सेवा, बढ़ती क़ीमतों, भ्रष्टाचार आदि मुद्दे उनके लिये अहम हैं। और इसके मद्देनज़र वो मतदान करें। साफ़ है कि केवल जाति और धर्म ही महत्व रखता है।
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एनडीए को बिहार में उच्च जाति के हिंदुओं (लगभग 16%) और यहाँ तक कि ग़ैर यादव ओबीसी वर्ग का बड़ा समर्थन था। बिहार में कुल ओबीसी की आबादी लगभग 52% है, लेकिन आरजेडी का समर्थन करने वाले यादव केवल 12% हैं। ग़ैर यादव ओबीसी की हमेशा एक शिकायत रही है कि एक यादव मुख्यमंत्री के तहत कलेक्टर, पुलिस स्टेशन अधिकारी (दरोगा) आदि अधिकारियों की मनचाही पोस्टिंग आमतौर पर यादवों के लिए ही होती हैं, जबकि ग़ैर यादव ओबीसी वर्ग को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। इसके अलावा, ओवैसी की एआईएमआईएम (जिसने 5 सीटें जीतीं) ने मुसलिम वोटों को विभाजित किया, परिणामस्वरूप एनडीए के लिए फ़ायदेमंद साबित हुआ।

मेरी भविष्यवाणी है कि आगामी पश्चिम बंगाल चुनाव (अप्रैल-मई 2021 में होने की संभावना है) में भी, बीजेपी बहुमत हासिल करेगी। पश्चिम बंगाल में जाति का अधिक महत्व नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में धर्म महत्वपूर्ण हो गया है। राज्य पहले धर्मनिरपेक्षता का गढ़ था। दोनों प्रमुख दलों, कांग्रेस और सीपीएम धर्मनिरपेक्ष थे लेकिन हाल के वर्षों में राज्य धार्मिक तर्ज पर बड़े पैमाने पर ध्रुवीकृत हो गया है।

इसका दोष मुख्य रूप से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जाना चाहिए। 

चूँकि राज्य की 27% से अधिक आबादी मुसलिम है। ममता ने सोचा कि उसे इस वोट बैंक को सुरक्षित करना चाहिए, और इस उद्देश्य के लिए पश्चिम बंगाल में उन्होंने कुछ क़दम उठाये जिसके कारण वहाँ की 70.5% हिंदू आबादी को बहुत ठेस पहुँची।

उदाहरण के लिए-    

(1) अप्रैल 2012 में उन्होंने मसजिदों में प्रत्येक इमाम को हर महीने 2500 रु और प्रत्येक मुअज़्ज़िन (और पश्चिम बंगाल में उनकी हज़ारों में संख्या है) को 1500 रुपये प्रति माह देने की घोषणा की। इस आदेश को कलकत्ता उच्च न्यायालय ने भेदभावपूर्ण बताया।

(2) अक्टूबर 2016 में उन्होंने 12 अक्टूबर को शाम 4 बजे के बाद दुर्गा पूजा मूर्ति विसर्जन पर रोक लगाने का आदेश पारित किया क्योंकि अगले दिन, 13 अक्टूबर को मोहर्रम था। राज्य सरकार का यह आदेश भी उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया।

(3) उन्होंने कोलकाता में एनआरसी और सीएए के ख़िलाफ़ रैलियाँ निकालीं, जिससे हिंदुओं का एक तबक़ा नाराज़ हुआ जिन्होंने सोचा कि यह क़ानून पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी मुसलमानों की आमद को रोकने के लिए आवश्यक हैं।

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इन सभी क़दमों ने बंगाली हिंदुओं के बीच एक धारणा बनाई कि ममता केवल मुसलमानों की परवाह करती हैं, और हिंदुओं की उपेक्षा करती हैं, जबकि हिन्दू राज्य की आबादी का 70% से अधिक हैं।
इसका परिणाम यह हुआ है कि बंगाली हिंदू, जो पहले धर्मनिरपेक्ष थे, आज बड़े पैमाने पर ध्रुवीकृत हैं, और वे अब बीजेपी के पक्ष में मतदान कर सकते हैं। यह इस तथ्य से स्पष्ट हो जाता है कि जबकि 2016 के पश्चिम बंगाल राज्य के चुनाव में बीजेपी ने 294 सीटों में से केवल 3 सीटें जीती थीं, 2019 के लोकसभा चुनावों में उसे पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 18 सीटें मिलीं। ओवैसी फिर से मुसलिम वोटों को विभाजित करेंगे (जैसा कि वह बिहार में करने में सफल रहे)। ज़ाहिर है इससे ममता के वोट बँटेंगे और बीजेपी को फ़ायदा होगा।
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