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बीजेपी का नारा - 'आ बैल मुझे मार'

देश की राजधानी होने के कारण दिल्ली की राजनीति अन्य राज्यों से हटकर है। शाहीन बाग़ आन्दोलन इसी राजनीति का प्रतीक है। एक सप्ताह बाद वोटर को तुरुप चाल चलनी है और एक पार्टी नेता चुनाव जीतने पर मंदिर और मसजिद एक महीने में तोड़ने की बात करता है। कल कोई दूसरा छुटभैया नेता चर्च और गुरुद्वारा गिराने की बात करेगा। 
राजेश बादल

जीत का नशा सिर चढ़ कर बोलता है। इसे संभाल कर रखना बहुत बड़ी चुनौती है। किसी भी सियासी पार्टी के पाँव बहकने का ख़तरा बना रहता है। 36  बरस पहले राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के साथ ऐसा ही हुआ था। अब नरेंद्र मोदी सरकार के साथ भी यही हो रहा है।
क़दम डगमगाए हुए हैं । एक के बाद एक जल्दबाज़ी में लिए जा रहे फ़ैसले और उनको अमलीजामा पहनाने के तरीक़े में भयंकर भूलें हो रही हैं। अधिनायक संस्कृति पनप चुकी है। संगठन के तमाम स्तरों पर किसी में साहस नहीं कि वह नेतृत्व के सामने सच कह सके। कभी इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के दौर में भी ऐसा ही हुआ था। इतिहास अपने को दोहरा रहा है।

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बौखलाहट की वजह?

दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान संसार के सबसे बड़े राजनीतिक दल की यह अंदरूनी छटपटाहट आसानी से पढ़ी जा सकती है। छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान,महाराष्ट्र और झारखंड में शिकस्त के बाद पार्टी के शिखर पुरुषों के सामने हार की हैट्रिक टालने का दबाव है।
इबारत स्लेट पर साफ़ लिखी दिखाई दे रही है और नीचे से लेकर ऊपर तक बौखलाहट है। नेताओं की ज़बान ज़हर उगल रही है। ज़हर आत्मघाती है। विडंबना यह कि पार्टी सच्चाई स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

कौन है देशद्रोही?

हालिया घटनाक्रम देखें तो स्पष्ट है कि असहमति के सुर देशद्रोही मान लिए गए हैं। भारत के सवा सौ करोड़ लोगों को किसी सियासी प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है। मुल्क का जो चरित्र सैकड़ों साल के अतीत मंथन से विकसित हुआ है, उसे रातों रात जादू की छड़ी घुमाकर बदला नहीं जा सकता। यह तथ्य पार्टी नियंताओं को समझना बेहद ज़रूरी है।
वे इसकी अनदेखी कर रहे हैं कि हिंदुस्तान का मतदाता तुरुप का पत्ता हमेशा अपने पास रखता है। वह किसी पार्टी को शासन करने का पट्टा तो देता है, लेकिन उसकी मियाद ख़त्म होने की तारीख़ पर दस्तख़त बचा कर रखता है।

राजधानी के मतदाता इस मामले में बेहद चतुर हैं। पाँच बरस पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि किसी चक्रवर्ती सम्राट से कम नहीं थी। पर कुछ महीने बाद ही एक अनाम सी स्थानीय पार्टी को 67 सीटें देकर दिल्ली ने तिलिस्म तोड़ दिया था। इसका रहस्य भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव में भी नहीं समझ पा रही है।
पाँच साल बाद इस दल के पास कोई स्थानीय चेहरा नहीं है। जेब से अचानक नया चेहरा निकालकर पेश करने का नुक़सान झारखंड और महाराष्ट्र में देख चुके हैं। हरियाणा में तो उसी दल ने इज्ज़त बचाई, जिससे मुक़ाबला था।

मसजिद तोड़ने की बात क्यों?

देश की राजधानी होने के कारण दिल्ली की राजनीति अन्य राज्यों से हटकर है। शाहीन बाग़ आन्दोलन इसी राजनीति का प्रतीक है। एक सप्ताह बाद वोटर को तुरुप चाल चलनी है और एक पार्टी नेता चुनाव जीतने पर मंदिर और मसजिद एक महीने में तोड़ने की बात करता है। कल कोई दूसरा छुटभैया नेता चर्च और गुरुद्वारा गिराने की बात करेगा। तीसरा नेता दिल्ली के मतदाताओं में पाकिस्तान के चेहरे खोजेगा। चौथा नेता लाखों मतदाताओं वाली बस्तियों को अवैध बताएगा तो सवाल उपजेगा ही कि छह साल की हुक़ूमत में आख़िर केंद्र सरकार क्या कर रही थी?

अगर दिल्ली में मंदिर -मसजिद अवैध हैं, लाखों मतदाताओं वाली कॉलोनियाँ ग़ैर क़ानूनी हैं, यहाँ रहने वाले लोग राष्ट्रद्रोही और ग़द्दार हैं तो अभी तक दल के राजनेता किस नींद में सो रहे थे?
बड़बोले नेता अपने हाथों ही पार्टी की जाजम खींचने का काम क्यों कर रहे हैं, समझ से परे है। बीजेपी का कहना है कि आन्दोलन के पीछे सियासी पार्टियों का हाथ है तो पूछने का हक़ है कि बीजेपी कौन सा कीर्तन करते हुए सत्ता में आईं है?

सीएए का विरोध क्यों?

नागरिक संशोधन क़ानून पर आम आदमी के मन में दौड़ रही शंकाओं का समाधान केंद्र सरकार नहीं कर पाई है। उसके कुछ जायज़ प्रश्न हैं। पहला यह कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से अल्पसंख्यक दशकों से आते रहे हैं। ज़ाहिर है, वहाँ सब कुछ ठीक नहीं था, तभी वे हिन्दुस्तान आ रहे थे। उन्हें धीमी गति से नागरिकता देने का काम भी चल रहा था। शरणार्थियों के लिए इतनी सहानुभूति थी तो प्रक्रिया तेज़ की जा सकती थी।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों ही नहीं,बहुसंख्यक वर्ग की अनेक उप जातियों का उत्पीड़न हो रहा है। अहमदिया, शिया, पठान और मुहाज़िरों तक के अधिकार छीन लिए गए हैं। भारत की सियासी जमात को वे क्यों नहीं दिखाई दिए? अखंड भारत की कल्पना में तो सभी शामिल हैं। 

मामला घुसपैठ का

दूसरा प्रश्न है कि भले ही शरण देना इस देश का आध्यात्मिक और सामाजिक चरित्र रहा हो, लेकिन कोई देश अपने नागरिकों की क़ीमत पर यह काम नहीं करता। निर्वाचित सरकार का पहला फ़र्ज़ तो अपने लोगों को बेहतर रोज़गार ,शिक्षा ,स्वास्थ्य ,पानी, पर्यावरण और घर देना है। इसी पार्टी के नेता आबादी के विस्फ़ोट पर भी सार्वजनिक चिंता कर चुके हैं। ऐसे में फिर चाहे एक ही शरणार्थी क्यों न हो ,उसे इस देश के संसाधनों पर अधिकार नहीं होना चाहिए।
हम ‘आ बैल मुझे मार’ की तरह क्यों व्यवहार कर रहे हैं। नहीं भूलना चाहिए कि विभाजन के सात - आठ साल बाद तक दोनों देशों के नागरिकों को अपनी पसंद का देश चुनने की स्वतंत्रता थी।
इतना ही दुस्साहस आप दिखाना चाहते हैं तो पाक अधिकृत कश्मीर पर अधिकार करें और वहाँ सबको बसा दें - मुल्क़ का एक आदमी विरोध नहीं करेगा।
तीसरा यक्ष प्रश्न यह है कि हिन्दुस्तान के सामने अनेक ताज़ा और ज्वलंत मुद्दे विकराल और विराट आकार में हैं। मसलन, आर्थिक सुस्ती पर काबू पाना, अपने नौजवानों को काम देना, पड़ोसियों के साथ चरमराते रिश्तों को ठीक करना, देश में सांप्रदायिक सद्भाव की वापसी और लोकतान्त्रिक संस्थाओं की मज़बूती आज सर्वोच्च प्राथमिकता माँगते हैं। नागरिकता संशोधन क़ानून चार बरस बाद भी लाया जा सकता था।

क्या भारत सरकार तात्कालिक और आधारभूत कार्यों में अंतर करना भूल गई है? याद रखना होगा कि कई निर्णय उपयोगी होते हुए भी ग़लत समय पर लिए जाने के कारण नकार दिए जाते हैं। सही समय की पहचान और फ़ैसले के क्रियान्वयन का ढंग जन मानस को बता देता है कि होम वर्क ठीक से नहीं किया गया है।

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