कॉकरोच आंदोलन ही मैं इसे कहूँगा। ऐसा आंदोलन जिसकी कल्पना मैंने तो कम से कम नहीं की थी। और न मैंने ये सोचा था कि संसद मार्च के समय ये इतना बड़ा रूख अख्तियार कर लेगा। लेकिन इस आंदोलन ने मुझे पूरी तरह से चौंका दिया है। इसका मतलब साफ़ है कि युवाओं में ग़ुस्सा बढ़ता जा रहा है। उसे लग रहा है कि उससे वादा तो आसमान का किया गया था लेकिन उससे ज़मीन भी छीन ली गई। वो निराश है। वो अपना हक मांग रहा है। वो तकलीफ में है और इंसाफ मांग रहा है। वो बदलाव का आह्वान कर रहा है और उसकी आवाज़ को अनसुना किया जा रहा है। सवाल सिर्फ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े का नहीं है और सवाल सरकार के इक़बाल और उसकी जवाबदेही का हो गया है। ये आंदोलन अब कुछ लोगों के हाथों से निकल कर आम जन का हो गया है और जंतर मंतर से निकलने वाली आवाज दूर तक जायेगी।

राहुल का पीएम आवास पर धरना

इस आवाज़ में अब राहुल गांधी ने अपनी आवाज़ भी मिला दी है। वो छात्रों पर हुए पुलिसिया अत्याचार के विरोध में अचानक प्रधानमंत्री आवास के सामने जाकर धरने पर बैठ गये। वैसे, राहुल नीट पेपर लीक पर लगातार आवाज़ बुलंद करते रहे हैं। वो इस आवाज़ को साधने के लिये कोटा और देहरादून गये और छात्रों से रूबरू हुये। राहुल के हस्तक्षेप ने पूरे मामले को राजनीतिक रंग तो दिया ही, साथ ही सरकार की मुसीबत और बढ़ा दी है। शरद पवार और दूसरे नेता भी इस भीड़ में शामिल हो रहे हैं। हालाँकि राहुल ने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के इस्तीफ़े की मांग कर के आंदोलन के दायरे को बढ़ा दिया है। वो साफ़ तौर पर ये कहने का प्रयास कर रहे हैं कि भले ही धर्मेंद्र प्रधान को सीधे ज़िम्मेदार कहा जा रहा हो, लेकिन अंतिम ज़िम्मेदारी तो प्रधानमंत्री की है, सरकार की है। क्यों नहीं अभी तक सरकार ने छात्रों के मुद्दे को एड्रेस किया जिस वजह से उन्हें अनशन के लिये मजबूर होना पड़ा और वो आक्रोशित हैं।
ताज़ा ख़बरें
जो वादे किये गये थे वो पूरे नहीं हुए, या ये कहा जाये कि उनके साथ धोखा किया गया। ये ग़ुस्सा काफी दिनों से पनप रहा था। हर बार जब पेपर लीक हुआ तो छात्र सड़क पर उतरा और हर बार उसकी बातों को सुना नहीं गया। उसे बदले में मिलीं लाठियाँ। उसका सिर फूटा। वो घायल हुआ। पुलिस केस दर्ज किया गया। ये सब कुछ दिल्ली से बाहर हो रहा था। मुख्यधारा के मीडिया ने उसकी ओर ध्यान नहीं दिया। उसे इग्नोर किया। दिल्ली की सरकार सोती रही। लापरवाह। लेकिन ये ग़ुस्सा धीरे धीरे फैल रहा था।

सीजेआई का कॉकरोच वाला बयान

जब हिंदुस्तान के मुख्य न्यायाधीश ने बेरोजगार युवकों को कॉकरोच कहा और पाँच दिन में दो करोड़ से ज़्यादा लोग कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़ गये तो मैं चौंका। ये असामान्य घटना थी। इसका अर्थ था कि ज़मीन पर कुछ हो रहा था जिसकी हवा हम लोगों को नहीं थी। लेकिन जब जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन का ऐलान हुआ और शुरू में भीड़ नहीं जुटी तो लगा कि ये कोई बुलबुला था जो फट गया। सोनम वांगचुक की एंट्री ने हवा को थोड़ा बदला, आंदोलन को थोड़ी नैतिक आभा दी लेकिन जब 17वें दिन उनकी तबीयत खराब होने की ख़बर आयी तो हवा बदलने की फिर आहट आयी। और विस्फोट हुआ जब उन्हें जबरन उठा लिया गया। संसद मार्च ने सबको ग़लत साबित किया। लेकिन यहां से अब आगे क्या? क्या ये जेपी आंदोलन साबित होगा जिसने इंदिरा गाँधी की सरकार पलट दी या फिर अन्ना का आंदोलन जिसने कांग्रेस की जड़ों में मट्ठा डाल दिया?
हर आंदोलन की अपनी तासीर होती है और उसकी एक सीमा। क्योंकि आंदोलन अपने वक्त से नाराज लोगों का आवेश होता है जो इन्साफ़ की पुकार करता है। इंदिरा गांधी के समय में छात्रों में आवेश था। बेरोजगारी, महंगाई से नाराजगी थी। ये आंदोलन गुजरात से शुरू हुआ था और बाद में भारत छोड़ो आंदोलन के नायक जय प्रकाश नारायण ने बुढ़ापे में इसको लीड किया। इंदिरा गांधी अपने अहंकार और असुरक्षा बोध में इसको नहीं समझ पायीं और उन्होंने आपातकाल लगा कर अपने पैर में कुल्हाड़ी मार ली।

अन्ना आंदोलन कैसा था?

अन्ना का आंदोलन ग़ैर राजनीतिक लोगों का आंदोलन था जो भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा हुआ था। इस आंदोलन में युवाओं ने बड़े पैमाने पर शिरकत की थी लेकिन आंदोलन का नेतृत्व सधे हुए लोगों के हाथों में था। जेपी आंदोलन के विपरीत ये आंदोलन राजनीतिक लोगों की पहुंच से दूर था। जेपी आंदोलन इंदिरा के ख़िलाफ़ एक विद्रोह था तो अन्ना का आंदोलन राजनीति के गिरते स्वरूप का प्रतिकार। अन्ना का आंदोलन राजनीति को ही नकार रहा था। वो राजनीति को बदलने और व्यवस्था परिवर्तन की बात कर रहा था। उसके निशाने पर सिर्फ कांग्रेस नहीं थी, उसके निशाने पर पूरी राजनीतिक जमात थी। 

अन्ना का आंदोलन राजनीति में पारदर्शिता, ईमानदारी और जनता के प्रति जवाबदेही की बात कर रही थी। हालाँकि ये एक त्रासदी है कि जो भ्रष्टाचार से लड़ने आये थे वो खुद राजनीति का शिकार हो गये और भ्रष्टाचार में डूब गये। शीशमहल में रहने लगे।

मैं अन्ना के आंदोलन से उपजी राजनीति का विक्टिम हूँ। लिहाजा कॉकरोच आंदोलन को लेकर बहुत आशा अभी नहीं पाल रहा हूँ। लेकिन इसका ये अर्थ भी नहीं है कि मैं इसको कमतर आँक रहा हूँ ख़ासतौर पर संसद मार्च के बाद जिस तरह से युवा पूरे देश से निकल कर आ रहा है, उसको देखने के बाद तो बिल्कुल ही नहीं। ये आंदोलन मौजूदा सरकार की जड़ों को हिलाने की ताक़त रखता है। और सरकार को बहुत संभल कर चलना होगा वर्ना कांग्रेस का उदाहरण सामने है। हालाँकि, अन्ना आंदोलन की तुलना में कॉकरोच आंदोलन काफ़ी भिन्न है।

एक

अन्ना और जेपी आंदोलन की कमान मज़बूत हाथों में थी। केजरीवाल से लाख नाराज़गी के बाद मैं ये नहीं कह सकता हूँ कि वो कमज़ोर नेता थे। उनके साथ सिविल सोसाइटी के नामी गिरामी लोग थे। जिनकी देश भर में प्रतिष्ठा थी। उनके साथ एक पूरी टीम थी। और एक चेन ऑफ़ कमांड थी। अन्ना चेहरा थे लेकिन केजरीवाल उस आंदोलन के रचयिता थे। ऐसा कॉकरोच आंदोलन के बारे में नहीं कह सकते। इस आंदोलन की नेतृत्वक्षमता पर गहरे सवाल हैं। सोनम की लेट एंट्री ने आंदोलन को एक चेहरा ज़रूर दिया है लेकिन उनकी तुलना अभी केजरीवाल या अन्ना से नहीं की जा सकती है।

दो

कॉकरोच आंदोलन में वैसी तैयारी नहीं दिखती जैसी अन्ना आंदोलन में थी। केजरीवाल ने आंदोलन शुरू करने के पहले काफी होमवर्क किया था। लोकपाल बिल को लेकर काफी सलाह मशविरा किया गया था और इसके साथ ही आंदोलन के पहले कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और सिविल सोसाइटी के लोगों से मिल उन्हें भरोसे में ले आंदोलन शुरू किया गया था। इस आंदोलन में तैयारी की कमी साफ़ दिखती है। लेकिन कॉकरोच आंदोलन अन्ना आंदोलन की तुलना में कहीं ज़्यादा स्वतस्फूर्त है।

तीन

कॉकरोच आंदोलन एक व्यक्ति विशेष को टारगेट कर रहा है। ये शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े पर अड़ा हुआ है, जबकि अन्ना का आंदोलन व्यक्ति की जगह सिस्टम पर हमले कर रहा था। वो व्यवस्था पर सीधे प्रहार कर रहा था। उसको बदलने की बात कर रहा था।

चार

अन्ना के आंदोलन ने सिर्फ सवाल खड़े नहीं किये, बल्कि उसने समाधान देने की भी कोशिश की। उसका तर्क था कि भ्रष्टाचार से निपटने के लिये लोकपाल क़ानून बनना चाहिये और और उसकी जद में प्रधानमंत्री तक को होना चाहिये। लोकपाल बिल अन्ना के आन्दोलन का सबसे विवादास्पद पहलू था। बुद्धिजीवी वर्ग इस मसले पर काफी बंटा हुआ था। उसे लग रहा था कि संसदीय व्यवस्था में एक सुपर व्यवस्था को थोपा जा रहा था। और इस तबके का मानना था कि प्रधानमंत्री के ऊपर एक सुपरमैन को आरोपित किया जा रहा है।
विचार से और

पांच

कॉकरोच आंदोलन एक ऐसे समय में अस्तित्व में आया है जब समाज में विचारधारा के स्तर पर जबरदस्त ध्रुवीकरण है। माहौल ज्यादा विषाक्त और आक्रामक है। अन्ना के समय ऐसा नहीं था। सरकार ज्यादा संवेदनशील थी। वह जंतर मंतर हो या फिर रामलीला मैदान, आंदोलनकारियों से संवाद बना रहा था और उनकी मांगों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार हो रहा था, जरूरी कदम भी उठाये गये थे।

छह, अन्ना आंदोलन को मुख्यधारा के मीडिया, खासतौर पर टीवी ने बहुत बड़ा कर दिया था। ऐसा समर्थन आज अनुपस्थित है। जब लोग सड़कों पर उतर गये, भीड़ बढ़ गई और आंदोलन को कवर करना मजबूरी हो गयी तो कवरेज हो रही है। मीडिया का पूर्ण समर्थन उसे नहीं है। लेकिन डिजिटल और सोशल मीडिया ने इस आंदोलन को लोगों तक पहुँचाने में काफी मशक्कत की है।

लेकिन, इस आंदोलन पर अभी कोई अंतिम निर्णय देना उचित नहीं होगा। लेकिन राहुल के दखल ने इस आंदोलन को नई शक्ल दी है। पूरे आंदोलन को एक ऐतिहासिकता दी है। इतिहास और समय आंदोलन का आकलन खुद करेगा। ऐसे में अभी तो इस आंदोलन को बस समझने की कोशिश करें। इतिहास को अपना फैसला देने दें।