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प्रतीकात्मक तसवीर

लॉकडाउन: कोरोना वायरस से डरो ना!

आजकल घर बैठकर वैसा ही एकांत अनुभव हो रहा है, जैसा 60-70 साल पहले हम किन्हीं हिल स्टेशनों के जंगलों में बनी कुटियाओं में किया करते थे। आजकल स्वाध्याय और मौन-साधना का आनंद अनायास ही प्राप्त हो रहा है। लेकिन सभी लोग तो ऐसा आनंद नहीं कर सकते। वे क्या करेंगे? वे डरे नहीं। तालाबंदी खुलने पर वे काम पर जाएँ। भीड़-भड़क्के से बचें। लोगों से दूरी बनाए रखें। सावधान रहें। सरकारें भी कोरोना के राक्षस से निपटने की पूरी तैयारी रखें।
डॉ. वेद प्रताप वैदिक

जनता-कर्फ्यू तो सिर्फ़ इतवार को था, लेकिन आज सोमवार को भी वह सारे देश में लगा हुआ मालूम पड़ रहा है। मेरा घर गुड़गाँव की सबसे व्यस्त सड़क गोल्फ कोर्स रोड पर है लेकिन इस सड़क पर आज भी हवाइयाँ उड़ रही हैं। घर के पास से गुज़रनेवाली रैपिड मेट्रो तो बंद ही है, सड़क पर वाहन दौड़ते हुए भी नहीं दिखाई पड़ रहे हैं। यह ठीक है कि हरियाणा सरकार ने तालाबंदी (लाॅकडाउन) घोषित कर दी है लेकिन यहाँ न तो ताला दिखाई पड़ रहा है और न ही चाबी! 

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सड़क के कोने पर लगनेवाले सब्जी और फलों के ठेले तक नदारद हैं। खाने-पीने की चीजों की दुकानें भी अभी (सोमवार दोपहर 12 बजे) तक बंद हैं। तालाबंदी ने जिन्हें छूट दे रखी है, वे लोग भी घर बैठे हैं। कितने डर गए हैं, हम लोग? जो लोग दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं, यदि रोज़ शाम को उन्हें 200-250 रुपये मज़दूरी न मिले तो वे खाएँगे क्या? ऐसे लगभग 60-70 करोड़ लोगों के लिए 10-15 दिन बाद क्या कोरोना से भी बड़ा संकट खड़ा नहीं हो जाएगा? कारखाने और दुकानें बंद होने से देश में आर्थिक आपातकाल आ धमकेगा। 

केरल और उत्तर प्रदेश की सरकारों ने उससे निपटने के कुछ क़दम उठा लिए हैं लेकिन केंद्रीय तथा अन्य प्रांतीय सरकारें देरी क्यों कर रही हैं? कोरोना के विरुद्ध हम जो सावधानियाँ बरत रहे हैं, वे तो ठीक हैं लेकिन सावधानियों से जो संकट खड़े होनेवाले हैं, उनके प्रति भी हम सावधान हैं या नहीं? खाने-पीने की चीजें एक हफ्ते बाद इतनी महँगी और कम हो जाएँगी कि देश में कहीं लूट-पाट का माहौल न बन जाए? जिन लोगों को पढ़ने-लिखने, टीवी पर सिनेमा देखने, संगीत सुनने और घरेलू खेल खेलने का शौक नहीं है, वे घर बैठे-बैठे कहीं उदासीनता के अवसाद में न डूब जाएँ? कोरोना का डर इतना ज़्यादा फैल गया है कि लोग एक-दूसरे को फ़ोन करने में भी कोताही दिखा रहे हैं। कल मेरे पास मुश्किल से 8-10 फ़ोन आए, जो कि रोज़मर्रा की तुलना में 10 प्रतिशत भी नहीं हैं। आजकल घर बैठकर वैसा ही एकांत अनुभव हो रहा है, जैसा 60-70 साल पहले हम किन्हीं हिल स्टेशनों के जंगलों में बनी कुटियाओं में किया करते थे। 

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आजकल स्वाध्याय और मौन-साधना का आनंद अनायास ही प्राप्त हो रहा है। लेकिन सभी लोग तो ऐसा आनंद नहीं कर सकते। वे क्या करेंगे? वे डरे नहीं। तालाबंदी खुलने पर वे काम पर जाएँ। भीड़-भड़क्के से बचें। लोगों से दूरी बनाए रखें। सावधान रहें। सरकारें भी कोरोना के राक्षस से निपटने की पूरी तैयारी रखें। अब एक साथ खड़े होकर ताली और थाली बजाना बंद करें। कहीं यह देश को महँगा न पड़ जाए।

(23 मार्च को देश के महान विचारक और क्रांतिकारी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया की 110वीं जयंती। उन्हें हार्दिक नमन।)

(डॉ. वेद प्रताप वैदिक के ब्लॉग www.drvaidik.in से साभार)
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डॉ. वेद प्रताप वैदिक
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