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हाथरस रेप कांड: जब आप डॉटर्स डे मना रहे थे, वो मौत से लड़ रही थी

तीन दिन पहले जब हम मीडिया और सोशल मीडिया पर डॉटर्स डे मना रहे थे, अलीगढ़ के जेएन अस्पताल में एक बेटी जिंदगी और मौत से लड़ रही थी। फेसबुक की हमारी वॉल बेटियों की तारीफ में कविताओं और कसीदों से उमड़ी पड़ी थी और एक बेटी नृशंस बलात्कार और हिंसा के बाद जिंदगी की जंग हार जाने के मुहाने पर पहुंच रही थी। 

इतना ही नहीं, इस घटना के बाद पिछले 15 दिनों से किसी मेनस्ट्रीम मीडिया में यह खबर चलती दिखाई नहीं दी। प्राइम टाइम डिबेट तब भी सुशांत को न्याय दिलाने में व्यस्त थी। यूपी की सरकार हर संभव कोशिश कर रही थी कि मामला दब जाए।

जीभ काटी, लाठियों से मारा 

ये 14 सितम्बर की घटना है। देश की राजधानी से महज 200 किलोमीटर दूर हाथरस के चंदपा क्षेत्र में 19 साल की लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ। उसी के गांव के ऊंची जाति के चार दबंगों ने बलात्कार के बाद उसे लाठियों से इतना मारा कि उसकी गर्दन, हाथ, पैर और रीढ़ की हड्डियां टूट गईं। वे यही नहीं रुके। उन्हें डर था कि लड़की उनका नाम उगल देगी तो उन्होंने उसकी जीभ काट दी। 

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यह सुबह की घटना है। लड़की अपनी मां के साथ बाजरे के खेत में चारा काटने गई थी। दबंग पीछे से आए और खेत में घसीट लिया। काफी देर बाद घरवालों ने उसे अधमरी हालत में पाया तो लेकर अस्पताल भागे। अलीगढ़ के जेएन अस्पताल में सोमवार को जब उसकी हालत बिगड़ी तो उसे दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल लाया गया, लेकिन अगले ही दिन मंगलवार की सुबह साढ़े पांच बजे वो दुनिया से चली गई। 

अब पुलिस कह रही है, सख्त धाराएं लगाई हैं। अभियुक्त बचेंगे नहीं। लड़की को न्याय मिलेगा। वो न्याय, जिसे देखने के लिए वो दुनिया में नहीं होगी।

एफआईआर में 8 दिन क्यों लगे?

15 दिन तक इस मामले को दबाने की हर संभव कोशिश करने के बाद, पुलिस ये अब भी नहीं बता रही कि एफआईआर दर्ज करने में 8 दिन क्यों लगा दिए। पूछने पर पूरी बेशर्मी से इनकार भी कर रही है। इस घटना के वक्त हाथरस के एसपी वही विक्रांत वीर सिंह हैं, जो दिसंबर, 2019 में चर्चित उन्नाव रेप केस के समय वहां तैनात थे।

कल रात में लिखी और छापी गई होगी वो खबर, जो आज उसकी मौत की खबर के साथ ही अखबारों में छपी है- "आरोपियों के पक्ष में आई सवर्ण परिषद।" और ये सब तब हो रहा है, जब दो महीने बाद निर्भया कांड को 8 साल पूरे होने जा रहे हैं।

बलात्कार तो इस देश में निर्भया कांड से पहले भी होते थे। लेकिन देश के अखबारों ने कभी उस पर इतने पन्ने, इतनी स्याही नहीं खर्च की थी। न संसद में इतनी बार बोला गया था यह शब्द- "महिलाओं की सुरक्षा।"

कभी ऐसा नहीं हुआ कि औरतों की जिंदगी, उनकी सुरक्षा महीनों तक टीवी चैनलों की प्राइम टाइम डिबेट का मुद्दा बनी हो। कमेटी आनन-फानन में बैठी हो कि कानून को और सख्त करो। आईपीसी की धारा 376 में बदलाव करो, रेप केस के लिए अलग से फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाओ, 60 दिनों के अंदर चार्जशीट फाइल करो। 

जेएस वर्मा की अगुआई में बनी कमेटी ने 29 दिनों के भीतर जनवरी, 2013 को 631 पन्नों की रिपोर्ट सौंपी थी। तीन महीने के अंदर अप्रैल, 2013 में कानून भी बन गया।

लेकिन उन कानूनों का हुआ क्या?

एनसीआरबी के पन्नों में दर्ज हो रहे बलात्कार के आंकड़े लगातार बढ़ते गए। 2016-17 में अकेले देश की राजधानी में इन अपराधों में 26.4 फीसदी का इजाफा हो गया। पूरे देश में यह संख्या इससे 55 फीसदी ज्यादा थी। इस देश की फास्ट ट्रैक अदालतें तो अलग से शोध का विषय हैं, जहां 10-10 साल से मुदकमे न्याय की बाट जोह रहे हैं। 

हाथरस दलित रेपकांड पर क्या योगी सरकार लीपापोती कर रही है। देखिए, वीडियो- 

महिला हिंसा के करोड़ों लंबित मामले 

सुप्रीम कोर्ट का नंबर तो बहुत बाद में आता है, इस देश की जिला और तालुका अदालतों में 3 करोड़ 17 लाख 35 हजार मामले लंबित पड़े हैं, जिनमें से दो करोड़, 27 लाख से ज्यादा मामले अकेले औरतों की साथ हुई हिंसा के हैं। यूपी की फास्ट ट्रैक अदालतों में दुष्कर्म व पॉस्को के सबसे ज्यादा 36,008 मामले लंबित हैं। एनसीआरबी का डेटा कहता है कि हमारे देश में हर दिन चार दलित महिलाओं के साथ बलात्कार होता है।

आंकड़े तो इतने हैं कि अभी 50 पन्ने इनसे ही रंगे जा सकते हैं। लेकिन असली सवाल तो फिर भी पीछे छूट जाएगा। मर्दवाद और जातिवाद इस देश का मर्ज है और मर्ज को चाहिए दवा। अगर सख्त कानून ही इस मर्ज की दवा थे तो नतीजा सामने है। आपकी दवा काम ही नहीं कर रही।

रेप के बाद जिंदा जला देना

राजधानी के चमकीले कमरों में बने कानून सेमिनार के पर्चे में तो कोट किए जा सकते हैं, लेकिन इस देश के छोटे शहरों, कस्बों-गांवों में अपनी मर्दानगी और जाति के अहंकार में डूबे मर्द को डराने में नाकाम हैं। वो पूरी दबंगई से न सिर्फ औरतों का रेप कर रहे हैं, उन्हें रेप के बाद जिंदा जलाकर मार भी डाल रहे हैं। वो महिला की हत्या कर शव पेड़ पर लटका दे रहे हैं क्योंकि उसने अपनी मजदूरी 3 रुपया बढ़ाने को कहा था। 

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वो तेजाब से उसका चेहरा जला रहे हैं क्योंकि उसने छेड़खानी का विरोध किया था। वो उसकी जबान काट दे रहे हैं ताकि रेप के बाद वो उनका नाम न उगल दे। दो साल पहले हरियाणा में एक लड़की के साथ इसलिए रेप हुआ था क्योंकि उसके नंबर क्लास के लड़कों से ज्यादा थे। वो सब कर रहे हैं। 2012 से पहले भी कर रहे थे, उसके बाद भी कर रहे हैं।

इस देश का कानून, न्यायिक संस्थाएं, चुने हुए जनप्रतिनिधि, चुनी हुई सरकार सब इस तरह की हैवानियत को रोकने में नाकाम हैं। आखिर क्यों?

इस बात को इस कहानी से समझिए, जो दरअसल कहानी नहीं सच्ची घटना है।

 

कुछ साल पहले मैं हरियाणा के फतेहाबाद जिले के एक गांव में छठी कक्षा में पढ़ने वाली एक लड़की से मिली थी, जिसके साथ गांव के एक ऊंची जाति के आदमी ने रेप किया था। उसके बाद जो-जो घटनाएं हुईं, वो सिलसिलेवार कुछ यूं हैं।

- छोटे से गांव में खबर जंगल की आग की तरह फैली।

- छह दिन बाद जब वो लड़की अपनी छोटी बहन के साथ स्कूल गई तो साथ की लड़कियां उठकर दूसरी बेंच पर बैठ गईं।

- टीचर आया तो उसने भरी क्लास में लड़की से कहा, "तो तुम्ही हो वो लड़की।"

- अगले ही मिनट प्रिंसिपल के कमरे में उसकी पेशी हुई। कहा गया, "अब तुम इस स्कूल में नहीं पढ़ सकती। स्कूल का माहौल खराब होगा।"

- पिता पुलिस के पास गए तो पुलिस ने एफआईआर लिखने से मना कर दिया। आरोपी ऊंची जाति का दबंग था। गांव में सबसे ज्यादा खेत उसी के पास थे।

- लड़की ने बताया कि जांच जैसा कुछ हुआ था, लेकिन जांच करने वाली औरत ने उससे ऐसे बोला, "सलवार खोलकर लेट जा।" जब वो बता रही थी कि उसके साथ क्या हुआ तो जांच वाली मैडम चाय में बिस्कुट डालकर खा रही थीं।

- मैंने एक पूरा दिन उस गांव में गुजारा था। रविवार के दिन प्रिंसिपल अपने घर के सामने हुक्का गुड़गुड़ाते मिले थे और टीचर प्रिंसिपल के पैर दबाते। दोनों ने पूरे यकीन से बताया कि कैसे उन्हें तो पहले ही शक था कि लड़की का चरित्र ठीक नहीं है। 

- बात करते हुए पिता इतने गुस्से में आ गया कि अपनी ही बेटी को मारने दौड़ पड़ा।

- राजधानी की नामी मैगजीन में मेरी रिपोर्ट छपी। उस सुदूर गांव में मामला रफा-दफा हो गया।

- सबसे ज्यादा जमीन वाले दबंग को कोई सजा नहीं हुई।

- दोनों बहनें फिर कभी स्कूल नहीं गईं।  

अब आपको समझ आ रहा होगा कि क्यों सिर्फ सख्त कानून उस मर्दवाद और जातिवाद का इलाज नहीं है, जिसकी शिकार हो रही हैं हमारी बेटियां। वही बेटियां, जिनकी मुस्कुराती हुई मासूम तसवीरें लगाकर आप डॉटर्स डे मना रहे थे।

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मनीषा पांडेय
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