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‘कांग्रेस मुक्त भारत परियोजना’ में राज्यपालों की भी ‘अमर्यादित’ भूमिका!

राज्यपाल एक संवैधानिक पदाधिकारी है। वह राज्य का संवैधानिक मुखिया होता है और संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक़ उसे राज्य सरकार की सलाह से काम करना होता है। वह राज्य सरकार की हर उस सलाह को मानने के लिए बाध्य होता है, जो संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक़ राज्य सरकार उसे देती है। 

लेकिन पिछले कुछ वर्षों से देखने में यह आ रहा है कि कमोबेश सभी ग़ैर बीजेपी शासित राज्यों के राज्यपाल राज्य सरकार की सलाह से नहीं बल्कि खुलेआम केंद्र सरकार की सलाह से काम कर रहे हैं या केंद्र की शह पर अपनी मनमानी करते हुए राज्य सरकारों को परेशान कर रहे हैं। इस सिलसिले में राजस्थान और महाराष्ट्र के उदाहरण तो बिल्कुल ताज़ा हैं। 

पिछले तीन महीने के दौरान यह दूसरा मौक़ा है जब किसी राज्य में राज्यपाल और सरकार के बीच टकराव को ख़त्म करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को परोक्ष रूप से दख़ल देना पड़ा है।

तीन महीने पहले जब महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी की हठधर्मिता और मनमानी के चलते मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की विधानसभा की सदस्यता का मामला उलझ गया था और राज्य में राजनीतिक संकट खड़ा होने के आसार पैदा हो गए थे, तब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बीच में आना पड़ा था। 

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उद्धव ठाकरे ने प्रधानमंत्री से बात की थी और इसके अगले ही दिन राज्यपाल ने चुनाव आयोग को पत्र लिख कर विधान परिषद की रिक्त सीटों के चुनाव कराने के लिए कहा था और उसके अगले दिन ही चुनाव आयोग ने चुनाव कराने का एलान कर दिया था। 

इस बार राजस्थान के मामले में राज्यपाल कलराज मिश्र और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच पैदा हुई टकराव की स्थिति भी प्रधानमंत्री के परोक्ष दख़ल के बाद ही ख़त्म हुई और राज्यपाल ने अंतत: राज्य विधानसभा का सत्र बुलाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी।

कई बार लौटाया सत्र का प्रस्ताव

अन्यथा इससे पहले राज्यपाल तरह-तरह की दलीलें देकर सत्र बुलाने के राज्य सरकार के प्रस्ताव को ठुकरा रहे थे। राज्यपाल के इस रवैये को लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा और फिर खुद उनसे बात की। प्रधानमंत्री से मुख्यमंत्री की बातचीत के बाद राज्यपाल के रवैये में बदलाव आया और उन्होंने सत्र बुलाना मंजूर किया। 

ये दोनों ही मामले अपने आप में अभूतपूर्व हैं, जिनमें प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप करना पड़ा है, जबकि किसी भी दृष्टि से ये मामले ऐसे नहीं थे कि प्रधानमंत्री को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दख़ल देना पड़े। न तो राजस्थान के राज्यपाल और न ही महाराष्ट्र के राज्यपाल के पास राज्य मंत्रिमंडल के प्रस्ताव को ठुकराने का कोई संवैधानिक आधार था। 

न तो राजस्थान में तीन सप्ताह के नोटिस पर विधानसभा सत्र बुलाने से कोई नई मिसाल कायम हो रही थी और न ही मुख्यमंत्री के रूप में उद्धव ठाकरे को विधान परिषद का सदस्य मनोनीत करने से। 

सरकार के इशारे पर काम?

देश के तमाम जाने-माने विधिवेत्ता और संविधान विशेषज्ञों ने भी दोनों ही मौक़ों पर राज्यपाल के रवैये को अनुचित बताया था, लेकिन इसके बावजूद दोनों राज्यपाल संविधान की मनमानी व्याख्या और अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए अपने-अपने सूबे की सरकार को परेशान कर रहे थे। साफ दिखाई दे रहा था कि दोनों ही राज्यपाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ परियोजना के तहत अपने यहां राज्य सरकार को अस्थिर कर केंद्र में सत्तारूढ़ दल की सरकार बनाने का रास्ता साफ कर रहे थे। 

राज्यपालों का केंद्र सरकार के इशारे पर काम करने का यह सिलसिला बहुत पुराना है और करीब चार दशक से चला आ रहा है। 

उदाहरणों की कमी नहीं  

इस संदर्भ में हरियाणा में जीडी तपासे (1982), जम्मू-कश्मीर में जगमोहन (1983), आंध्र प्रदेश में रामलाल (1983), कर्नाटक में वेंकट सुबैया (1989), उत्तर प्रदेश में रोमेश भंडारी (1998), बिहार में विनोद चंद्र पांडे (1998), झारखंड में सैयद सिब्ते रजी (2005) और बिहार में बूटा सिंह (2005) आदि के नाम गिनाए जा सकते हैं। 

कुख्यात राज्यपालों के ये उदाहरण तो मौजूदा सरकार के पहले के हैं, जिन्होंने केंद्र के इशारे पर अपने-अपने राज्यों में असंवैधानिक तख्ता पलट के गंदे खेल को अंजाम दिया है। लेकिन 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद तो यह खेल बहुत ज्यादा ही खुल कर खेला जाने लगा है। 

पिछले छह वर्षों के दौरान राजभवनों और केंद्र में सत्तारूढ़ दल के दफ्तरों में व्यावहारिक तौर पर कोई भेद ही नहीं रहा। 

विपक्ष शासित राज्य सरकारों को अस्थिर करने, गिराने और जनादेश को तोड़-मरोड़ कर विपक्ष को सत्ता से दूर रखने के खेल में राज्यपालों ने सक्रिय भूमिका निभाते हुए संवैधानिक प्रावधानों और लोकतांत्रिक परंपराओं की बेरहमी से धज्जियां उड़ाई हैं।

अरुणाचल से हुई शुरुआत

केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद किसी राज्य सरकार को दल-बदल के जरिए अस्थिर करने और फिर अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की शुरुआत दिसंबर, 2014 में अरुणाचल प्रदेश से हुई। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपने फ़ैसले में राज्यपाल के रवैये पर सख्त टिप्पणियां करते हुए राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश को असंवैधानिक करार देते हुए राज्य की कांग्रेस सरकार को फिर से बहाल करने का आदेश दिया। 

उत्तराखंड में लगा झटका 

ऐसे ही प्रकरण में मोदी सरकार को दूसरा झटका उत्तराखंड के मामले में नैनीताल हाई कोर्ट से लगा। मार्च, 2016 में हरीश रावत की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार उस समय अल्पमत में आ गई थी, जब कांग्रेस के नौ विधायक बाग़ी होकर बीजेपी में शामिल हो गए थे। 

मुख्यमंत्री हरीश रावत को बहुमत साबित करने के लिए पांच दिन का वक्त दिया गया था, लेकिन बहुमत का परीक्षण होने से पहले ही केंद्र सरकार ने राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर राष्ट्रपति से राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश कर दी थी, जिसे तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने स्वीकार भी कर लिया था। 

हरीश रावत ने राष्ट्रपति के फ़ैसले को नैनीताल हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन लगाए जाने को असंवैधानिक करार दिया था। केंद्र सरकार ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी लेकिन वहां से भी उसे निराशा हाथ लगी और हरीश रावत सरकार फिर बहाल हो गई। 

दो-दो बार सुप्रीम कोर्ट में किरकिरी हो जाने के बावजूद 'दिल है कि मानता नहीं’ की तर्ज पर राज्यपालों के जरिए राज्यों में येन-केन प्रकारेण अपनी सरकार बनाने और विपक्षी दलों की सरकार गिराने का खेल थमा नहीं।

गोवा में परंपरा दरकिनार

गोवा विधानसभा के चुनाव में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला था। वहां 40 सदस्यीय विधानसभा में 17 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई थी, जबकि बीजेपी को 13 सीटें हासिल हुई थीं। सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने का न्योता देने की स्थापित परंपरा को नज़रअंदाज करते हुए राज्यपाल मृदुला सिन्हा ने बीजेपी के इस मौखिक दावे को स्वीकार कर लिया कि उसके पास बहुमत है, जिसे वह विधानसभा में साबित कर देगी। 

इसके बाद मनोहर पर्रिकर को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी गई। बाद में बीजेपी ने छोटे-छोटे स्थानीय दलों के विधायकों से दल-बदल कराकर और उन्हें मंत्री पद देकर अपना बहुमत हासित कर लिया। ठीक यही कहानी मणिपुर में भी दोहराई गई थी।

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फैक्स मशीन ख़राब हो गई?

दो साल पहले नवंबर महीने में ही जम्मू-कश्मीर में जब महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने नेशनल कॉन्फ्रेन्स और कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश करने की सूचना फैक्स के जरिए राज्यपाल सत्यपाल मलिक को भेजी तो राज्यपाल ने अपने निवास पर लगी फैक्स मशीन ख़राब होने की हास्यास्पद दलील देते हुए महबूबा की ओर से भेजी गई सूचना मिलने से इनकार कर दिया और विधानसभा भंग कर राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश कर दी। 

कर्नाटक में भी जनता दल (सेक्युलर) और कांग्रेस की साझा सरकार को अपदस्थ कर बीजेपी की सरकार बनाने के लिए वहां के राज्यपाल वजूभाई वाला ने जिस तरह का उतावलापन दिखाया, वह किसी से छिपा नहीं है।

यही नहीं, वजूभाई वाला ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर जनता दल (सेक्युलर) तथा कांग्रेस के दल-बदलू विधायकों को दल-बदल निरोधक क़ानून से बचाने के लिए विधानसभा स्पीकर के अधिकार क्षेत्र में भी अनावश्यक दख़लंदाजी की। 

इस सिलसिले में महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने तो अपनी ‘ऐतिहासिक’ करनी से सभी राज्यपालों को पीछे छोड़ दिया और राजस्थान के राज्यपाल कलराज मिश्र तो कोश्यारी से भी आगे निकलते दिखे।

राज्यपालों की राजनीतिक बयानबाज़ी

पिछले पांच वर्षों के दौरान राज्यपालों ने सिर्फ सरकार बनाने-गिराने के खेल में ही सक्रियता नहीं दिखाई, बल्कि कई राज्यपालों ने तो राजनीतिक और भड़काऊ सांप्रदायिक बयानबाज़ी करने से भी गुरेज़ नहीं किया। कुछ दिनों पहले तक मध्य प्रदेश की और इस समय उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने तो मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले अपने दौरों के दौरान कई जगह लोगों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ मजबूत करने की अपील तक की। 

तथागत रॉय के भड़काऊ भाषण 

राजस्थान के राज्यपाल पद से सेवानिवृत्त हुए कल्याण सिंह ने इस पद पर रहते हुए भी बीजेपी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ रहे अपने बेटे का चुनाव प्रचार किया। त्रिपुरा के राज्यपाल रहे तथागत रॉय तो अपने पूरे कार्यकाल के दौरान भड़काऊ और नफरत फैलाने वाले सांप्रदायिक बयान देते रहे और महात्मा गांधी के ख़िलाफ़ भी उन्होंने कई अपमानजनक टिप्पणियां कीं। 

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि राज्यपाल पद के अवमूल्यन में कांग्रेस शासन के दौरान जो कमियां रह गई थीं, वह पिछले पांच वर्षों के दौरान तमाम राज्यपालों ने पूरी कर दी हैं। राज्यपालों के अमर्यादित, असंवैधानिक और गरिमाहीन आचरण के जो रिकॉर्ड इन पांच वर्षों के दौरान बने हैं, वे अब शायद ही टूटेंगे। 

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अनिल जैन
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