आम लोगों के बीच यह सवाल जोर-शोर से पूछा जा रहा है कि दिल्ली के दंगों के वक़्त (पहले दो दिन) केजरीवाल क्या कर रहे थे? वह कहाँ ग़ायब थे? इसके बाद से कांग्रेस एक बार फिर यह स्थापित करने में जुट गई है कि केजरीवाल आरएसएस की “बी टीम” हैं। इस घटनाक्रम ने उन संभावनाओं पर तगड़ा ब्रेक लगा दिया है जो तीसरी बार दिल्ली जीत के चलते केजरीवाल के पक्ष में देशभर में एकाएक उपजी थीं।
हालाँकि यह आरोप तथ्य से परे है कि केजरीवाल ने कुछ नहीं किया। पहले पहल तो उनके गुमान में भी नहीं था कि यह मामला इतना बढ़ जाएगा और बाद में यह उनके बूते में नहीं रहा। केजरीवाल इस बीच अपने विधायकों, पार्षदों, कार्यकर्ताओं के संपर्क में थे और प्रशासन के भी।
केजरीवाल या उनके दल के किसी नेता में यह दम नहीं था कि पुलिस के बिना (पुलिस वैसे ही संदिग्ध आचरण कर रही थी) दिल्ली के दंगाग्रस्त इलाक़ों में साबुत पहुँच जायें। इन दंगों को कवर करने के दौरान पत्रकारों की थोक में हुई पिटाई इसका सबूत है।
केजरीवाल के पास अब फिर से सरकार तो है पर तीन दिन के दंगों में ही इक़बाल नहीं बचा। संगठन उन्होंने बनाया नहीं और रातों-रात यह बनता नहीं। क़द्दावर लोग उन्हें सूट नहीं करते और जोकरों का यह काम नहीं है कि वे किसी चुनौती के वक़्त उसका हल खोज सकें या उसका सामना कर सकें!