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दिल्ली दंगा: क्या किसी बड़ी तबाही का छोटा राजनीतिक प्रयोग?

मेरा विश्वास है कि दिल्ली हिंसा देश के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगी। यह मामला यह तय करेगा कि देश संविधान के हिसाब से कितना चलेगा या कितनी दूर तक चलेगा? यह भी तय होगा कि सरकार और पुलिस राजनीतिक आकाओं के इशारों पर किस हद तक नंगा नाच कर सकती हैं?
आशुतोष

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर उम्मीद जगाई है कि दिल्ली दंगे जिन लोगों ने भड़काये हैं या भड़काने में जिनकी भूमिका रही है, उनके  ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई होगी। उन्हे सज़ा मिलेगी। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि नफ़रती भाषणों पर सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट में शुक्रवार को हो।
इस मामले में तब उम्मीद ख़त्म हो गयी थी जब दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को अपनी रिपोर्ट फ़ाइल करने के लिये एक महीने का वक़्त दिया था, जबकि इसी दिल्ली हाईकोर्ट ने इस आदेश से एक दिन पहले ही दंगों में पुलिस की भूमिका पर नाराज़गी जताई थी।
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जज का तबादला, पुलिस को राहत!

अदालत ने कहा था कि वह 1984 वाले हालात नहीं होने देगी। उसने पुलिस को कहा था कि वह भड़काऊ भाषण देने वालों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज करें और न केवल दर्ज करें, बल्कि अगले दिन अदालत को सूचित भी करे। हैरानी वाली बात यह है कि यह आदेश देने वाले जस्टिस मुरलीधर का तबादला उसी रात पंजाब और  हरियाणा हाईकोर्ट कर दिया गया था। अगले दिन हाईकोर्ट की बदली बेंच ने दिल्ली पुलिस को राहत दे दी। 
बीजेपी के तमाम नेताओं ने दिल्ली चुनावों और बाद में ज़हर-बुझे नफ़रत फैलाने वाले भाषण दिये। (कुछ मुसलिम नेताओं ने भी भड़काने वाले बयान दे आग में घी डालने का काम किया था।) अदालत में कपिल मिश्रा, प्रवेश वर्मा, अनुराग ठाकुर के वीडियो भी सुनवाई के दौरान चला कर दिखाये गये थे।अदालत ख़ासी नाराज़ थी।
कपिल मिश्रा का वह वीडियो सब जगह वाइरल हुआ था, जिसमें वह ज़ाफ़राबाद में धरने पर बैठी महिलाओं को धमकाता है कि अगर तीन दिन के अंदर यह जगह ख़ाली नहीं हुई तो कोई उसे रोक नहीं पायेगा। उसका इशारा था कि पुलिस भी उनको नहीं बचा पायेगी। 
इलाक़े के डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस ठीक उनके पीछे खड़े थे। उन्होंने कपिल मिश्रा को रोकने की कोई कोशिश नहीं की, न ही भड़काऊ भाषण देने के लिये एफ़आईआर दर्ज की।
 वहाँ तब दोनों तरफ़ से पत्थरबाज़ी हुई थी। यानी कपिल मिश्रा की वजह से माहौल ख़राब हुआ था। 

दो तरह के क़ानून?

इलाक़े के लोगों का आरोप है कि कपिल मिश्रा की वजह से ही दंगा भड़का था, जिसमें आगे चलकर लगभग चार दर्जन लोगों की जान गयी और सैंकड़ों घायल हुये। बाद में इसी कपिल मिश्रा ने शांति मार्च निकालने का ढोंग रचा।
पुलिस से कोई अनुमति नहीं ली गयी। पर पुलिस, बजाये उसको रोकने या ग़ैरक़ानूनी मार्च के लिये हिरासत में लेने के, मार्च को सुरक्षा देती दिखी। इस मार्च में फिर भड़काऊ नारे लगे - ‘देश के ग़द्दारों को, गोली मारो —-।‘ ये नारे पुलिस की मौजूदगी में लगे। पुलिस फिर ख़ामोश रही।
पश्चिम बंगाल में अमित शाह की रैली में जिन लोगों ने - ‘देश के ग़द्दारों को, गोली मारो ....‘ के नारे लगाये थे, उनकी पहचान कर तीन लोगों को गिरफ़्तार कर लिया गया। तो क्या देश में दो तरह का क़ानून हैं? या देश की पुलिस एक ही क़ानून को अपने राजनीतिक आकाओं के हिसाब से लागू करती है? 

पुलिस कार्रवाई क्यों नहीं?

इसी तरह दिल्ली पुलिस ने आज तक वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर के ख़िलाफ़ ‘गोली मारो …’  का नारा लगवाने के आरोप में केस दर्ज नहीं किया है। उनके इस नारे के बाद शाहीन बाग में गोली चलाने के तीन वाक़ये हुये थे। दो को गिरफ़्तार भी किया गया था।
हैरानी की बात यह है कि दिल्ली पुलिस के अन्नदाता केंद्र सरकार के वकील ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा कि अभी भड़काऊ भाषण देने वालों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करना ठीक नहीं होगा। अब यह किस बिना पर कहा गया, यह समझ के परे है। क्या इस बयान के पीछे कोई धमकी छिपी हुई है? क्या धमकी देने की कोशिश की गयी है?
क्या अब इस देश में यह तय हो गया है कि भड़काऊ भाषण देने वालों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई कभी मत करो, नहीं तो हिंसा भड़क जायेगी?

दिल्ली दंगा, मील का पत्थर

अदालत में तो फ़ैसला होगा। पर मेरा विश्वास है कि दिल्ली हिंसा देश के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगी। यह मामला यह तय करेगा कि देश संविधान के हिसाब से कितना चलेगा या कितनी दूर तक चलेगा? यह भी तय होगा कि सरकार और पुलिस राजनीतिक आकाओं के इशारों पर किस हद तक नंगा नाच कर सकती हैं?
अपने कर्तव्य के निर्वहन में वो कितने विभत्स हो सकती हैं, उनमें कोई लोक लाज बची है या सारी शर्म घोल कर पी गये हैं? यह बात भी जनता के सामने खुलेगी कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता सचाई है या फिर इंसाफ़ का मंदिर भी अपनी भूमिका भूल चुका है? 

दिल्ली दंगा शायद देश के भविष्य का एक खाका भी है, जो हमें डराने के लिये काफी है। यह सवाल भी पूछा जाना चाहिये कि दंगा हुआ था या फिर सांप्रदायिकता की प्रयोगशाला में कोई प्रयोग हो रहा था?
आज के आधुनिक समाज में किसी नयी चीज को बाज़ार में लाने के पहले समझदार लोग, समूह या कंपनी पाइलट प्रोजेक्ट करती हैं, यह देखने के लिये कि जो रसायन उनकी फ़ैक्ट्री में बनाया गया है, वह कितना कारगर है। अगर प्रयोग सफल होता है तो फिर उसी प्रयोग को बड़े पैमाने पर कारगर बनाया जाता है। 

नियोजित दंगा?

दंगे अक्सर किसी भी मामूली बात पर भड़क जाते हैं। अगर प्रशासन चुस्त न हो तो जान-माल का भारी नुक़सान होता है। दंगों में अमूमन जो मौक़े पर उपलब्ध हथियार होते हैं, उसका इस्तेमाल कर शत्रु पक्ष को नुक़सान पहुँचाने की कोशिश होती है।
इसलिये अब तक देश में हुये दंगों में चाकू, तलवार, गंडासा या कुछ दूसरे धारदार हथियार के चोट पाये जाते हैं।
पुलिस के बेहद अनुभवी अफ़सरों ने कहा कि इस दंगे में बंदूक की गोली से इतने अधिक लोगों के घायल होना या मरना, यह साबित करता है कि दंगा सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। तैयारी काफ़ी पहले से थी।

हेलमेट पहन कर दंगा

ज़ाफ़राबाद और करावल नगर में छतों पर थोक में पेट्रोल बम का मिलना, ईंट पत्थरों का ज़ख़ीरा इकठ्ठा करना, बड़े गुलेल और भारी संख्या में गोली चलना, ये साफ़ संकेत हैं कि दोनों समुदाय दंगे के लिये तैयार थे। बस ज़रा सी चिंगारी की ज़रूरत थी।
पहली बार किसी दंगे में हेलमेट पहन के हमलावर आये थे। जैसे जेएनयू में नक़ाब पहन कर हमलावरों ने होस्टलों पर हमले किये और छात्रों के हाथ पैर तोड़े थे। ये हेल्मेट या नक़ाब क्या दर्शाते हैं?
फिर बहुमंज़िली इमारतों की सीधी सपाट दीवारों पर मोटे-मोटे रस्से लटके मिले। जिनके ज़रिये हमलावर या तो हमला करने के लिये ऊपर चढ़े हैं या फिर उतरे हैं। चढ़ने उतरने का ये तरीक़ा कोई आम आदमी नही अपना सकता, इसके लिये सेना या फिर सुरक्षाबलों में विशेष ट्रेनिंग दी जाती है।
मतलब साफ़ है, हमलावरों को किसी फ़ैक्ट्री में तैयार किया गया और ‘दुश्मनों’ को सबक़ सिखाने के लिये दंगों में उतार दिया गया।
अब यह तो असली साज़िशकर्ता ही बता सकते हैं कि यह दंगा महज़ एक संयोग था या फिर कोई प्रयोग? और प्रयोग किस हद तक सफल रहा? और अगर सफल रहा तो फिर बड़े पैमाने पर इस रसायन का प्रयोग कब और कहाँ होगा?

इस संदर्भ में न्यायालय की भूमिका बहुत गंभीर हो जाती है। अगर इस बार अपराधी बच निकले तो फिर इस प्रयोग को नयी जगह पर करने से हिचकिचायेंगे नहीं। अदालत भले ही यह कहे कि वह ‘इतना दबाव नहीं झेल सकती’, पर देश इतिहास के उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ से ख़ौफ़ का ऐसा मंजर दिख रहा है, जो सिर्फ तबाही ही ले कर आयेगा।  

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