कम लोगों को यह ज्ञात होगा कि अमेरिकी 'डॉलर साम्राज्यवाद' की आहट को स्वामी विवेकानंद यानी नरेन्द्र नाथ दत्त ने 130 साल पहले ही भाँप लिया था। उन्होंने तब यह भविष्यवाणी भी की थी कि पश्चिमी आर्थिक प्रभुत्व को भविष्य में चीन से कड़ी चुनौती मिलेगी। आज 2026 में उसी डॉलर साम्राज्यवाद से उठी तपिश को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और संपूर्ण विश्व महसूस कर रहा है। दिलचस्प यह है कि चुनौती आज भी पूरब से ही उठ रही है। मगर भारत के सामने आज एक 'तिहरी चुनौती' खड़ी है: वह अमेरिकी डॉलर के इस तंत्र का हिस्सा बना रहे, या चीन के वर्चस्व वाले ब्रिक्स यानी BRICS की मुद्रा को सशक्त करे, या फिर अपने गिरते रुपये के 'इकबाल' को संभाले।

कलकत्ता के एक कुलीन कायस्थ परिवार में 12 जनवरी 1863 को जन्मे स्वामी विवेकानन्द ने 1893 में हांगकांग और चीन के व्यस्त बंदरगाह कैंटन (ग्वांगझू) की यात्रा की थी। इस ऐतिहासिक यात्रा का उल्लेख ह्वान शिनचुआन ने 'Proceedings of the Indian History Congress (1979)' में किया है। विवेकानन्द ने तब चीन को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में देखा था जो "फीनिक्स पक्षी की तरह राख से उठ खड़ा होगा" और पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों के बीच शक्ति का संतुलन पैदा करेगा।

डॉलर का इस्तेमाल प्रभुत्व जमाने के लिए?

लेकिन जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका पहुँचे और वहाँ के समाज व अर्थव्यवस्था का सूक्ष्म अवलोकन किया, तो उन्हें अहसास हुआ कि डॉलर की ताकत केवल व्यापार का साधन नहीं, बल्कि 'प्रभुत्व का औज़ार' है। 'Complete Works of Swami Vivekananda (Vol. IV & V)' में संकलित उनके पत्रों में यह टीस साफ़ झलकती है कि अमेरिका ने उन्हें ‘डॉलर साम्राज्यवाद’ के जरिए छला। उनका मंतव्य था कि अमेरिका ने वादा तो आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का किया, लेकिन व्यवहार में अपनी मुद्रा की शक्ति का उपयोग कर दुनिया को आर्थिक जाल में फाँसने का काम किया। यह सांस्कृतिक सहयोग के आवरण में आर्थिक वर्चस्व का खेल था।

विवेकानन्द की दृष्टि केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि आर्थिक-राजनीतिक रूप से भी भविष्यदृष्टा थी। 'Modern India' में उन्होंने लिखा था कि चीन तेजी से श्रमिक वर्ग की ओर बढ़ रहा है और भविष्य में समाजवाद व सामाजिक क्रांतियाँ सत्ता का केंद्र बदल देंगी। 

विवेकानन्द का अटूट विश्वास था कि आने वाले समय में सत्ता का केंद्र पूँजी से श्रम की ओर और 'पश्चिम से पूर्व' की ओर स्थानांतरित होगा।

रुपये, डॉलर के बीच संतुलन साधने की कोशिश

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक, भारत ने हमेशा रुपये और डॉलर के बीच एक संतुलन साधने की कोशिश की। नेहरू ने योजनाबद्ध औद्योगीकरण के जरिए स्थिरता का प्रयास किया, तो शास्त्री के दौर में युद्ध और अकाल ने विनिमय दर पर दबाव डाला। 1966 में इंदिरा गांधी ने निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए रुपये का बड़ा अवमूल्यन किया। राजीव गांधी ने तकनीकी आधुनिकीकरण और उदारीकरण की खिड़की खोली। अंततः 1991 में नरसिंह राव और तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने ऐतिहासिक 'दो-चरणीय अवमूल्यन' के ज़रिए संकटग्रस्त अर्थव्यवस्था को बचाया। 'Economic Survey 1991–92' साक्षी है कि इसी कदम से रुपया बाजार-आधारित विनिमय दर की ओर बढ़ा।

आज, जनवरी 2026 में स्थिति फिर चिंताजनक है। डॉलर के मुकाबले रुपया ₹90 के स्तर को छू रहा है और वैश्विक रेटिंग एजेंसियाँ इसके ₹94 तक गिरने की आशंका जता रही हैं। डॉलर की कठोरता, ऊर्जा आयात और इलेक्ट्रॉनिक्स पर निर्भरता जैसे कारक आज भी अर्थव्यवस्था पर भारी हैं। विपक्ष लगातार हमलावर है कि मोदी सरकार रुपये की साख बचाने में विफल रही है।

मोदी सरकार की चीन नीति

प्रधानमंत्री मोदी की चीन नीति और उनकी यात्राएँ इस विडंबना को और गहरा करती हैं। 2015 में निवेश की उम्मीदें, 2018 की 'वुहान स्पिरिट' और 2019 के महाबलीपुरम का 'सभ्यतागत संवाद'- इन सबके बावजूद डोकलाम, लद्दाख और गलवान के संघर्षों ने रिश्तों में कड़वाहट भर दी। वर्ष 2025 में तियानजिन (SCO शिखर सम्मेलन) में मोदी की शी जिनपिंग और पुतिन से मुलाकात एक 'खट्टा-मीठा' अनुभव रही, जहाँ एक ओर आर्थिक सहयोग की चर्चा थी तो दूसरी ओर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा की कटुता।

यहाँ एक बड़ा विरोधाभास उभरता है। 2013 में मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि "रुपया गिरता है तो देश का इकबाल गिरता है।" लेकिन आँकड़े बताते हैं कि 2014 में जो डॉलर ₹58.58 पर था, वह जनवरी 2026 तक ₹90 तक पहुँच गया है- यानी मोदी शासन के दौरान रुपये में लगभग 34% से अधिक की गिरावट आई है।

अब 2026 में भारत 'ब्रिक्स' (BRICS) की अध्यक्षता कर रहा है। 'Contemporary BRICS Reports (Jan 2026)' के अनुसार, मुख्य एजेंडा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और डॉलर पर निर्भरता कम करना है।

चीन अपनी मुद्रा युआन को वैश्विक विकल्प के रूप में पेश कर रहा है। यह विवेकानन्द की उसी भविष्यवाणी की गूँज है कि पूरब से डॉलर के विरुद्ध प्रतिरोध उठेगा।

ब्रिक्स की मुद्रा लाने की तैयारी

"ब्रिक्स मुद्रा (प्रस्तावित 'R5') वर्तमान में एक डिजिटल 'यूनिट ऑफ अकाउंट' के रूप में अपने अंतिम चरणों में है और 2026 के शिखर सम्मेलन में इसके पायलट लॉन्च की प्रबल संभावना है। लेकिन यहाँ मोदी के लिए कूटनीतिक जोखिम बहुत बड़ा है। यदि वे ब्रिक्स अध्यक्ष के रूप में इस नई मुद्रा को लॉन्च करते हैं तो इसे सीधे तौर पर वॉशिंगटन के वित्तीय प्रभुत्व पर प्रहार माना जाएगा। ऐसी स्थिति में, अमेरिकी बाजारों से पूंजी का पलायन (Capital Outflow) शुरू हो सकता है और डॉलर की आक्रामकता बढ़ सकती है, जो पहले से ही कमजोर चल रहे भारतीय रुपये को और भी गर्त में धकेल सकता है।"

इसलिए आज भारत गहरे दबाव में है। चीन कह रहा है कि अमेरिका भारत को 'बुली' कर रहा है और भारत की खामोशी वाशिंगटन को और मजबूत करेगी। रूस भी भारत को डॉलर से किनारा करने के लिए उकसा रहा है। मोदी सरकार के सामने यह यक्ष प्रश्न है: क्या वे ब्रिक्स की नई मुद्रा प्रणाली को मजबूत कर डॉलर को चुनौती दें, या अपने गिरते रुपये को संभालने के लिए अमेरिकी तंत्र का ही सहारा लें?
वर्तमान में अमेरिका डॉलर की शक्ति का उपयोग SWIFT नेटवर्क से बहिष्कार और प्रतिबंधों के लिए 'हथियार' की तरह कर रहा है। वेनेज़ुएला और रूस इसके उदाहरण हैं। यही वह "डॉलर साम्राज्यवाद" है जिसे विवेकानन्द ने सवा सदी पहले पहचान लिया था।

नरेन्द्रनाथ दत्त की अंतर्दृष्टि और नरेन्द्र मोदी की वर्तमान चुनौतियाँ एक ही सत्य के दो पहलू हैं। वैश्विक शक्ति सदैव गतिशील रहती है। विवेकानन्द ने डॉलर के उदय और उसके संभावित प्रतिरोध को भांप लिया था। आज, प्रधानमंत्री मोदी को एक ऐसी दुनिया में भारत का नेतृत्व करना है जहाँ वह प्रतिरोध हकीकत बन चुका है, लेकिन उसके साथ नए जोखिम भी जुड़े हैं। भारत को अपनी मुद्रा की मजबूती और वैश्विक वित्तीय पुनर्गठन के बीच एक अत्यंत सूक्ष्म संतुलन खोजना होगा। 1863 में जन्मे एक संत ने जिस 'आर्थिक युद्ध' की पहचान की थी, 2026 में उसी मोर्चे पर मौजूदा राजनेता को देश का इकबाल बचाना है।