रायपुर में 24 फ़रवरी से होने जा रहे कांग्रेस के 85वें महाधिवेशन के ऐन पहले 20 फ़रवरी की सुबह से पार्टी के कोषाध्यक्ष समेत तमाम नेताओं पर शुरू हुई ईडी की छापेमारी पक्ष-विपक्ष के बीच सदाशयता की इस परंपरा के ध्वस्त होने का सबूत है। विपक्ष को वैचारिक विरोधी की जगह निजी दुश्मन मानने और उसे पूरी तरह बर्बाद करने और इसके लिए साम-दाम-दंड-भेद के हर दाँव का इस्तेमाल करने की यह शैली ‘मोदी युग’ की ख़ासियत है।
ऐसा भी नहीं कि इन ताबड़तोड़ छापों के नतीजे भी निकल रहे हैं। नेशनल हेराल्ड केस में 55 घंटे तक कांग्रेस नेता राहुल गाँधी और तीन दिन तक सोनिया गाँधी से पूछताछ में ईडी को क्या मिला, इसकी जानकारी आज तक सामने नहीं आयी है। हाँ, मीडिया में इसकी सुर्खियाँ बनीं और बीजेपी प्रवक्ताओं को कांग्रेस नेताओं पर अनर्गल आरोप लगाने का मौक़ा मिला। बीजेपी का असल मक़सद भी यही है कि विपक्ष के नेताओं को संदिग्ध बनाया जाये न कि अपराधियों को पकड़ा जाये। वरना गौतम अडानी और प्रधानमंत्री मोदी के रिश्तों को लेकर लोकसभा में पूछे गये राहुल गाँधी के सवालों को कार्यवाही से हटाया न जाता और हिंडनबर्ग रिपोर्ट से खुलासे को लेकर ईडी अडानी के ठिकानों पर छापे मार रही होती।
सरकारी एजेंसियों के इस बेज़ा इस्तेमाल से बेजपी को कुछ फ़ौरी लाभ तो हो सकता है लेकिन लोकतंत्र को इससे मिले आघात से उबरने में लंबा वक़्त लग जाएगा। ज़्यादा दुर्भाग्यपूर्ण मसला तो ये है कि इस योजना के मुख्य शिल्पी ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी हैं जिन पर लोकतंत्र को मज़बूत करने की ज़िम्मेदारी है। उन्होंने संसद के बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई बहस के जवाब मे जिस अहंकारी मुद्रा में कहा कि ‘ईडी ने पूरे विपक्ष को एक कर दिया है’, वह ईडी के बेज़ा इस्तेमाल की खुली स्वीकारोक्ति है। ऐसे मे अगर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने ईडी (इन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट) को ‘एलीमिनेटिंग डेमोक्रेसी’ कहा है तो ग़लत नहीं है।